10 घंटा पहलेED Joint Director Swapan Bose का लंबी बीमारी के बाद निधन, ED में 33 साल तक निभाई अहम जिम्मेदारी
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प्रवर्तन निदेशालय (ED) के जॉइंट डायरेक्टर स्वपन बोस का 6 अक्टूबर 2026 को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उनके निधन पर ED ने गहरा शोक व्यक्त किया।
नई दिल्ली: प्रवर्तन निदेशालय (ED) के जॉइंट डायरेक्टर स्वपन बोस का 6 अक्टूबर 2026 को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उनके निधन की खबर सामने आने के बाद प्रवर्तन निदेशालय में शोक की लहर है। विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने स्वपन बोस के निधन पर गहरा दुख जताते हुए उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की है।
ED ने स्वपन बोस को एक अनुभवी, ईमानदार और कर्तव्य के प्रति समर्पित अधिकारी के रूप में याद किया। विभाग के अनुसार, सार्वजनिक सेवा के दौरान उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा और पेशेवर क्षमता के साथ निभाया। उनके निधन को संगठन के लिए एक बड़ी और अपूरणीय क्षति बताया गया है।
लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे थे स्वपन बोस
स्वपन बोस लंबे समय से स्वास्थ्य संबंधी परेशानी से जूझ रहे थे। बीमारी के बाद मंगलवार, 6 अक्टूबर को उनका निधन हो गया। उनके निधन की जानकारी मिलने के बाद ED मुख्यालय सहित विभिन्न कार्यालयों में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों ने शोक व्यक्त किया। प्रवर्तन निदेशालय भारत सरकार की प्रमुख आर्थिक कानून प्रवर्तन एजेंसियों में से एक है। ऐसे संस्थान में लंबे समय तक सेवा देने वाले अधिकारी के तौर पर स्वपन बोस ने विभागीय जिम्मेदारियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ED में तीन दशक से ज्यादा का करियर
स्वपन बोस का प्रवर्तन निदेशालय के साथ करीब 33 वर्षों का लंबा कार्यकाल रहा। इतने लंबे करियर के दौरान उन्होंने संगठन में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं और विभिन्न स्तरों पर काम किया। विभाग की ओर से उन्हें ऐसे अधिकारी के तौर पर याद किया गया, जिन्होंने अपने दायित्वों को संस्थागत प्रतिबद्धता और अनुशासन के साथ पूरा किया। ED के मुताबिक, उनके काम में पेशेवर रवैये के साथ-साथ ईमानदारी और जिम्मेदारी की भावना प्रमुख रही।
तीन दशक से अधिक समय तक एक ही संस्थान में सेवा देना उनके अनुभव और संगठन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उनके सहकर्मियों के लिए भी उनका जाना एक व्यक्तिगत और पेशेवर क्षति के रूप में देखा जा रहा है।
विभाग ने बताया अपूरणीय क्षति
स्वपन बोस के निधन पर प्रवर्तन निदेशालय ने आधिकारिक रूप से शोक व्यक्त किया। विभाग ने कहा कि उनका निधन संगठन के लिए एक बड़ी क्षति है। उनके लंबे कार्यकाल और योगदान को देखते हुए उनकी सेवाओं को सम्मान के साथ याद किया गया। ED के मुख्यालय के अलावा अलग-अलग जोनल और सब-जोनल कार्यालयों में काम करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों ने भी उनके निधन पर शोक जताया। सहकर्मियों ने उनके साथ काम करने के अनुभव और उनके पेशेवर योगदान को याद किया।
परिवार के प्रति जताई गहरी संवेदना
स्वपन बोस के निधन पर ED के निदेशक समेत विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने उनके परिवार, रिश्तेदारों और सहयोगियों के प्रति संवेदना व्यक्त की। विभाग ने कहा कि दुख की इस घड़ी में वह शोक संतप्त परिवार के साथ खड़ा है। ED की ओर से परिवार को हर संभव समर्थन और एकजुटता का भरोसा भी दिया गया है। विभाग ने दिवंगत अधिकारी की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हुए उनके परिवार को इस कठिन समय में धैर्य और शक्ति मिलने की कामना की।
14 घंटा पहलेचुनाव आयोग तक विपक्ष का मार्च रोका गया, राहुल-प्रियंका धरने पर बैठे; अखिलेश और अभिषेक हिरासत में
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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनावी पारदर्शिता की मांग को लेकर 19 विपक्षी दलों ने दिल्ली में मार्च निकाला। पुलिस ने प्रदर्शन रोका और कई नेताओं को हिरासत में लिया। राहुल-प्रियंका आकाशवाणी परिसर में धरने पर बैठ गए।
नई दिल्ली: नई दिल्ली में मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता की मांग को लेकर विपक्षी दलों का प्रदर्शन तेज हो गया। 19 विपक्षी पार्टियों के सांसदों और नेताओं ने नई संसद से चुनाव आयोग तक मार्च निकालने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने रास्ते में बैरिकेड लगाकर मार्च रोक दिया। मार्च रुकने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा को पुलिस ने हिरासत में लिया और उन्हें बस में बैठाया। दोनों बाद में बस से उतरकर आकाशवाणी परिसर में पहुंच गए और वहीं धरने पर बैठ गए। विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग के कार्यालय तक जाने की अनुमति देने की मांग की।
आकाशवाणी परिसर से चुनाव आयोग का कार्यालय करीब 270 मीटर की दूरी पर बताया गया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उनका उद्देश्य चुनाव आयोग के अधिकारियों से मिलकर अपनी मांगें रखना है।
विपक्ष का यह प्रदर्शन पिछले पांच दिनों में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सातवां बड़ा विरोध प्रदर्शन बताया जा रहा है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े हालिया फैसलों में पारदर्शिता की कमी है। हालांकि, इन आरोपों को चुनाव आयोग या सरकार की ओर से स्वीकार नहीं किया गया है।
संसद से चुनाव आयोग तक मार्च की कोशिश
विपक्षी सांसदों ने सुबह नई संसद परिसर से चुनाव आयोग के कार्यालय की ओर मार्च शुरू किया। मार्च में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी नेता शामिल हुए।
प्रदर्शनकारियों के आगे बढ़ने पर पुलिस ने कई स्थानों पर बैरिकेड लगाए। विपक्षी नेताओं और पुलिस के बीच रास्ता खोलने को लेकर गतिरोध बना रहा। प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी बैरिकेड पर चढ़ते भी नजर आए।
विपक्षी सांसदों को पुलिस ने अलग-अलग चरणों में रोकने की कोशिश की। इसके बाद राहुल और प्रियंका को हिरासत में लेकर बस में बैठाया गया। दोनों के आकाशवाणी परिसर पहुंचने के बाद वहां धरना शुरू हो गया।
विपक्षी नेताओं ने स्पष्ट किया कि वे चुनाव आयोग तक पहुंचकर अपनी मांगें सीधे अधिकारियों के सामने रखना चाहते हैं।
राहुल गांधी का 'ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो' पोस्टर चर्चा में
प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी के हाथ में 'ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो' लिखा पोस्टर भी दिखाई दिया। कांग्रेस की ओर से इसे युवा मतदाताओं, खासकर Gen-Z तक राजनीतिक संदेश पहुंचाने की कोशिश के रूप में पेश किया गया।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 के लोकसभा चुनाव में 18 से 29 वर्ष की आयु के मतदाताओं की हिस्सेदारी कुल मतदाता संख्या में करीब 22.78 प्रतिशत थी। इस लिहाज से युवा मतदाता भारतीय चुनावों में एक महत्वपूर्ण समूह हैं।
पोस्टर के जरिए विपक्ष ने चुनावी पारदर्शिता और निर्वाचन प्रक्रिया को लेकर युवाओं के बीच अपनी चिंताओं को पहुंचाने की कोशिश की। हालांकि, विपक्ष के आरोपों और चुनाव आयोग की स्थिति के बीच राजनीतिक विवाद अभी जारी है।
मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार पर लगाए आरोप
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रदर्शन के दौरान कहा कि यह आंदोलन युवाओं, महिलाओं, किसानों और गरीबों के अधिकारों से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र की भाजपा सरकार सत्ता में बने रहने के लिए लोगों के अधिकारों को प्रभावित कर रही है और चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया जा रहा है।
खड़गे ने चुनावी प्रक्रिया और सत्ता हासिल करने के तरीके पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि विपक्ष लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही और चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग कर रहा है।
कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के इन आरोपों को राजनीतिक दावे के रूप में देखा जाना चाहिए। चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर अपने संवैधानिक और प्रशासनिक अधिकारों के तहत फैसले लिए जाते हैं।
अखिलेश यादव ने निष्पक्षता पर उठाए सवाल
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त निष्पक्ष हैं तो उन्हें विपक्षी दलों की बात सुननी चाहिए। उन्होंने इसे लोकतंत्र से जुड़ा मुद्दा बताया और प्रदर्शनकारियों को रोकने के पुलिस के तरीके पर भी सवाल उठाया।
अखिलेश ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए। समाजवादी पार्टी लगातार SIR यानी Special Intensive Revision को लेकर आपत्ति जताती रही है।
SIR के तहत मतदाता सूची के सत्यापन और संशोधन को लेकर विपक्षी दलों की मुख्य चिंता यह है कि कहीं पात्र मतदाताओं के नाम सूची से बाहर न हो जाएं। चुनाव आयोग और संबंधित प्रशासनिक संस्थाओं के लिए चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची शुद्ध करने की प्रक्रिया में वास्तविक मतदाताओं के अधिकार प्रभावित न हों।
विपक्ष की पांच प्रमुख मांगें क्या हैं?
विपक्षी गठबंधन ने प्रदर्शन के दौरान चुनाव प्रक्रिया से जुड़े पांच प्रमुख मुद्दे उठाए।
1. मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग
विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। साथ ही मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं की जांच में पारदर्शिता की मांग रखी।
2. मतदाता सूची में पूरी पारदर्शिता
विपक्ष चाहता है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन से जुड़ी पूरी जानकारी बूथ और विधानसभा स्तर पर उपलब्ध कराई जाए। किसी वैध मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे सूचना और अपील का अवसर देने की मांग भी की गई है।
3. SIR और मतदाता नाम हटाने पर सवाल
विपक्षी दलों ने SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसके कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटने का खतरा हो सकता है। उन्होंने भविष्य के चुनावों में SIR से पहले की मतदाता सूची को आधार बनाने की मांग की।
4. EVM के बजाय बैलेट पेपर की मांग
विपक्ष ने चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM की जगह फिर से बैलेट पेपर इस्तेमाल करने की मांग दोहराई। इसके अलावा पहली बार मतदान करने वाले युवाओं के लिए पंजीकरण प्रक्रिया सरल बनाने की मांग भी सामने रखी गई।
5. विपक्षी दलों से एकजुट रहने की अपील
विपक्षी नेताओं ने चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही के मुद्दे पर एकजुट रहने की अपील की। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम अधिकार मतदाताओं का होना चाहिए।
अखिलेश और अभिषेक बनर्जी हिरासत में
मार्च के दौरान समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने भी सक्रिय भागीदारी की। अखिलेश यादव और टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी समेत कई विपक्षी नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया।
प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ने के साथ सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी की गई। पुलिस ने बैरिकेडिंग के जरिए मार्च को चुनाव आयोग के कार्यालय तक पहुंचने से रोकने की कोशिश की।
इस घटनाक्रम ने दिल्ली में विपक्ष और प्रशासन के बीच राजनीतिक टकराव को और बढ़ा दिया है।
जया बच्चन और PDA का मुद्दा भी उठा
प्रदर्शन में समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन PDA से जुड़े पोस्टर के साथ पहुंचीं। PDA का अर्थ पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समूहों से लिया जाता है। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस सामाजिक गठजोड़ को लगातार प्रमुखता देती रही है।
2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 37 सीटें जीती थीं। इसके बाद पार्टी ने अपने सामाजिक आधार को यादव और मुस्लिम मतदाताओं से आगे बढ़ाकर अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित मतदाताओं तक विस्तारित करने पर जोर दिया है।
हालांकि, मौजूदा प्रदर्शन का मुख्य मुद्दा चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी विपक्ष की मांगें हैं।
शिवराज सिंह चौहान ने विपक्ष पर साधा निशाना
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विपक्ष के प्रदर्शन की आलोचना की। उन्होंने इसे जनादेश का अपमान बताते हुए कहा कि यह लोकतंत्र की चिंता से ज्यादा चुनावी हार की प्रतिक्रिया है।
सत्तारूढ़ पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप से साफ है कि चुनाव प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक विवाद आने वाले दिनों में और तीखा हो सकता है।
प्रदर्शन का व्यापक राजनीतिक महत्व
मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग और SIR, मतदाता सूची तथा EVM को लेकर विपक्ष का विरोध भारतीय चुनाव व्यवस्था पर चल रही व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा है।
विपक्ष जहां अधिक पारदर्शिता और निगरानी की मांग कर रहा है, वहीं सरकार और उसके समर्थक विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखते हैं। ऐसे में आने वाले समय में चुनाव आयोग के फैसले, मतदाता सूची से जुड़े कदम और अदालतों में संभावित कानूनी चुनौती इस विवाद की दिशा तय कर सकते हैं।
आकाशवाणी परिसर में राहुल और प्रियंका गांधी का धरना इस प्रदर्शन को प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण बनाता है। चुनाव आयोग का कार्यालय कुछ ही दूरी पर होने के बावजूद प्रदर्शनकारियों को वहां तक जाने की अनुमति नहीं मिली। अब देखना होगा कि विपक्ष अपनी मांगों को आगे किस संस्थागत या कानूनी मंच पर ले जाता है।
15 घंटा पहलेHarmanpreet Kaur ने छोड़ी भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तानी, तीनों फॉर्मेट में अब खिलाड़ी के रूप में जारी रखेंगी सफर
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भारतीय महिला क्रिकेट टीम की विश्व कप विजेता कप्तान हरमनप्रीत कौर ने मंगलवार को बड़ा फैसला लेते हुए तीनों फॉर्मेट की कप्तानी छोड़ने का ऐलान किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक भावुक संदेश साझा करते हुए कहा कि कप्तानी छोड़ने का फैसला उनके लिए आसान नहीं था।
स्पोर्ट्स न्यूज़: भारतीय महिला क्रिकेट टीम की विश्व कप विजेता कप्तान हरमनप्रीत कौर ने तीनों फॉर्मेट की कप्तानी छोड़ने का फैसला किया है। 37 वर्षीय क्रिकेटर ने भावुक संदेश के जरिए अपने फैसले की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कप्तानी की जिम्मेदारी निभाते हुए उन्होंने टीम और भारतीय महिला क्रिकेट को अपना खून, पसीना और समय दिया।
हालांकि, कप्तानी से हटने के बावजूद उनका क्रिकेट करियर जारी रहेगा और अब वह बिना नेतृत्व की जिम्मेदारी के खेल के प्रति अपने जुनून के साथ मैदान पर उतरना चाहती हैं।
हरमनप्रीत कौर ने क्यों छोड़ी कप्तानी?
हरमनप्रीत ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर साझा किए संदेश में बताया कि भारतीय टीम की कप्तानी छोड़ना उनके लिए आसान फैसला नहीं था। उनके नेतृत्व के दौरान भारतीय महिला क्रिकेट ने कई महत्वपूर्ण पड़ाव देखे और उन्होंने लंबे समय तक टीम की कमान संभाली। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि कप्तानी के सफर में उन्हें कई ऐसी यादें, भावनाएं और चुनौतियां मिलीं, जो हमेशा उनके साथ रहेंगी। हरमनप्रीत के मुताबिक, उन्होंने टीम को प्राथमिकता देते हुए कई बार अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और क्रिकेट से जुड़े लक्ष्यों को पीछे रखा।
उनका मानना था कि टीम की जरूरत व्यक्तिगत उपलब्धियों से ऊपर है। कप्तान रहते हुए लिए गए कई फैसलों की आलोचना भी हुई, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य हमेशा टीम को मजबूत बनाना और नई खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का अवसर देना था।
कप्तान के तौर पर हरमनप्रीत का शानदार सफर
हरमनप्रीत कौर भारतीय महिला क्रिकेट की सबसे अनुभवी खिलाड़ियों में शामिल हैं। उन्होंने भारत के लिए 5 टेस्ट, 51 वनडे और 155 टी20 अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में कप्तानी की है। लंबे समय तक वह भारतीय टीम के नेतृत्व समूह का प्रमुख चेहरा रही हैं। कप्तान के रूप में उनका हालिया बड़ा अभियान एशियन गेम्स में रहा, जहां भारतीय महिला टीम ने लगातार दूसरी बार स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इस उपलब्धि के साथ हरमनप्रीत ने कप्तान के रूप में अपने कार्यकाल का एक और महत्वपूर्ण अध्याय पूरा किया।
उनके नेतृत्व में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत किया और कई युवा खिलाड़ियों को बड़े मंच पर खुद को साबित करने का मौका मिला।
कप्तानी छोड़ने से पहले हुई अहम बैठक
हरमनप्रीत के फैसले की घोषणा से एक दिन पहले भारतीय महिला क्रिकेट के भविष्य को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक भी हुई थी। गुवाहाटी में हुई इस बैठक में हरमनप्रीत, उपकप्तान स्मृति मंधाना और मुख्य कोच अमोल मजूमदार ने बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया से मुलाकात की थी। बैठक में टीम के भविष्य और आने वाले वर्षों के रोडमैप पर चर्चा हुई।
इसके अगले दिन हरमनप्रीत ने तीनों फॉर्मेट की कप्तानी छोड़ने का ऐलान कर दिया। हालांकि, उन्होंने अपने बयान में यह स्पष्ट नहीं किया कि कप्तानी से हटने का फैसला किसी एक घटना का परिणाम था।
'मैंने अपनी ड्यूटी पूरी कर दी'
हरमनप्रीत ने कहा कि कप्तानी छोड़ते समय वह भावुक जरूर हैं, लेकिन उन्हें अपने फैसले को लेकर संतोष और शांति महसूस हो रही है। उनका मानना है कि भारतीय महिला क्रिकेट के पास आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त प्रतिभा और मजबूत आधार मौजूद है। उन्होंने अपने कार्यकाल को पीछे मुड़कर देखते हुए कहा कि उन्होंने नेतृत्व की जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी और गर्व के साथ निभाई। भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तानी करना उनके लिए सम्मान की बात रही और इसके लिए वह हमेशा आभारी रहेंगी।
17 घंटा पहलेAssam Earthquake: असम के नगांव में 4.5 तीव्रता का भूकंप, 33 किमी गहराई में था केंद्र
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असम के नगांव जिले में मंगलवार तड़के भूकंप के झटके महसूस किए गए। राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) के मुताबिक, भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 4.5 रही। यह भूकंप सुबह 4 बजकर 23 मिनट 47 सेकंड पर आया, जिसका केंद्र जमीन के भीतर करीब 33 किलोमीटर की गहराई में स्थित था।
Earthquake: असम के नगांव जिले में मंगलवार तड़के भूकंप के झटके महसूस किए गए। राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) के अनुसार, भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 4.5 मापी गई। भूकंप का केंद्र जमीन की सतह से करीब 33 किलोमीटर नीचे था। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, भूकंप के कारण किसी बड़े नुकसान की खबर नहीं है।
NCS के अनुसार, यह भूकंपीय गतिविधि मंगलवार सुबह करीब 4 बजकर 23 मिनट 47 सेकंड पर दर्ज की गई। तड़के भूकंप आने के कारण कई लोगों को झटके महसूस हुए और कुछ इलाकों में लोगों के बीच डर का माहौल बन गया। हालांकि, अभी तक किसी व्यक्ति के घायल होने, मौत या संपत्ति को नुकसान पहुंचने की आधिकारिक सूचना सामने नहीं आई है।
नगांव में सुबह-सुबह महसूस हुए झटके
भूकंप के झटके ऐसे समय आए जब ज्यादातर लोग अपने घरों में सो रहे थे। अचानक धरती हिलने से लोगों में अफरा-तफरी की स्थिति बन सकती है, खासकर भूकंप के लिहाज से संवेदनशील इलाकों में रहने वाले लोगों के बीच। स्थानीय प्रशासन और संबंधित एजेंसियां स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। फिलहाल किसी बड़े नुकसान की जानकारी नहीं मिलने से राहत की स्थिति है। हालांकि, भूकंप के बाद स्थानीय स्तर पर किसी भी तरह की क्षति का आकलन किया जा सकता है।
पूर्वोत्तर भारत में पहले भी महसूस हुए भूकंप
असम और पूर्वोत्तर भारत के अन्य हिस्सों में भूकंप के झटके समय-समय पर महसूस किए जाते हैं। इससे पहले शनिवार शाम को भी पूर्वोत्तर भारत के कुछ इलाकों में 4.9 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया था। राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के मुताबिक, उस भूकंप का केंद्र भूटान के ग्याल्पोझिंग से करीब तीन किलोमीटर दूर था और यह पृथ्वी की सतह से लगभग पांच किलोमीटर की गहराई में आया था। उस दौरान असम के अलावा गुवाहाटी समेत आसपास के कुछ क्षेत्रों में भी कंपन महसूस किया गया था।
शनिवार को आया भूकंप शाम करीब 4 बजकर 1 मिनट पर दर्ज किया गया था। उस घटना में भी किसी बड़े जान-माल के नुकसान की जानकारी सामने नहीं आई थी।
भूकंप के लिहाज से संवेदनशील है पूर्वोत्तर भारत
पूर्वोत्तर भारत को देश के सबसे अधिक भूकंपीय गतिविधि वाले क्षेत्रों में शामिल किया जाता है। असम, मणिपुर, मेघालय, नागालैंड और आसपास के क्षेत्रों में समय-समय पर भूकंप के झटके महसूस होते रहते हैं। क्षेत्र की भौगोलिक संरचना और सक्रिय टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधियों को इसकी प्रमुख वजहों में गिना जाता है।
भूकंप की स्थिति में केवल उसकी तीव्रता ही यह तय नहीं करती कि नुकसान कितना होगा। भूकंप का केंद्र कितनी गहराई में है, उसका स्थान आबादी वाले इलाके से कितना दूर है और वहां की इमारतें कितनी मजबूत हैं, जैसे कई कारक इसके प्रभाव को निर्धारित करते हैं।
17 घंटा पहलेमुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष का मार्च: 19 दल दिल्ली में EC कार्यालय तक जाएंगे, SIR और EVM पर उठाए सवाल
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SIR के विरोध और CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर INDIA ब्लॉक के 19 दल दिल्ली में ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’ निकालेंगे। विपक्ष संसद से चुनाव आयोग तक मार्च कर मतदाता सूची, EVM और चुनावी पारदर्शिता के मुद्दे उठाएगा।
नई दिल्ली: दिल्ली में चुनावी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच टकराव एक बार फिर तेज हो गया है। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरोध और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर INDIA ब्लॉक के 19 विपक्षी दल संसद से चुनाव आयोग के मुख्यालय तक मार्च निकालने की तैयारी में हैं। विपक्ष ने इसे ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’ नाम दिया है।
प्रस्तावित मार्च संसद परिसर से शुरू होकर चुनाव आयोग के कार्यालय तक जाएगा। विपक्षी सांसद करीब 3 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करेंगे। इस प्रदर्शन के केंद्र में मतदाता सूची में बदलाव, SIR की प्रक्रिया, चुनाव आयोग की पारदर्शिता और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) के इस्तेमाल से जुड़े सवाल हैं।
CEC के इस्तीफे की मांग पर अड़ा विपक्ष
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक दिन पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर विपक्ष की प्रमुख मांगों को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के लिए तीन मांगें गैर-समझौतावादी हैं। इनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा, SIR को समाप्त करना और चुनाव में बैलेट पेपर की वापसी शामिल है।
विपक्ष का आरोप है कि SIR की प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। खड़गे ने दावा किया कि इस प्रक्रिया में करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं। हालांकि, यह विपक्ष का राजनीतिक दावा है और अलग-अलग राज्यों में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के आंकड़े निर्वाचन अधिकारियों की प्रक्रिया और रिकॉर्ड के अनुसार अलग हो सकते हैं।
19 विपक्षी दलों की एकजुटता
इस मार्च में INDIA ब्लॉक के 19 दल शामिल होने वाले हैं। इन पार्टियों के पास लोकसभा में कुल 178 और राज्यसभा में 62 सांसद होने का दावा किया गया है।
मार्च में शामिल होने वाले दलों में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, NCP (SP), शिवसेना (UBT), राष्ट्रीय जनता दल, CPI(M), CPI, नेशनल कॉन्फ्रेंस, PDP, झारखंड मुक्ति मोर्चा, CPI(ML), IUML, KC(M), MDMK, VCK, RSP, AIFB और KC(J) शामिल हैं।
विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए मतदाता सूची तैयार करने से लेकर मतदान और मतगणना तक हर चरण में पारदर्शिता जरूरी है।
पहले भी चुनाव आयोग तक मार्च कर चुका है विपक्ष
यह पहली बार नहीं है जब विपक्ष ने चुनाव आयोग के खिलाफ सड़क पर उतरने का फैसला किया है। इससे पहले 11 अगस्त 2025 को INDIA गठबंधन के सांसद संसद भवन से चुनाव आयोग के कार्यालय तक मार्च कर चुके हैं।
उस प्रदर्शन में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, शरद पवार समेत कई विपक्षी नेताओं ने हिस्सा लिया था। उस समय भी विपक्ष ने मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता से जुड़े सवाल उठाए थे।
अब एक बार फिर विपक्ष ने इसी मुद्दे को लेकर संयुक्त प्रदर्शन की घोषणा की है। इससे चुनाव आयोग और विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है।
SIR को लेकर चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों का मुद्दा
विपक्ष की मांगों को उस रिपोर्ट के बाद भी बल मिला है, जिसमें चुनाव आयोग के भीतर SIR से संबंधित निर्णयों पर कथित मतभेदों का उल्लेख किया गया था।
द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर रिकॉर्ड में कम से कम 14 बार आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि कुछ निर्णय दोनों चुनाव आयुक्तों की जानकारी या सिफारिश के बिना जारी किए गए।
इन दावों को लेकर विपक्ष ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और CEC की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, ऐसे आरोपों और रिपोर्ट में किए गए दावों पर चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष अंतिम रूप से महत्वपूर्ण रहेगा।
मतदाता सूची में पारदर्शिता की मांग
विपक्षी दलों की प्रमुख मांग मतदाता सूची को लेकर है। उनका कहना है कि वोटर लिस्ट में किसी व्यक्ति का नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए।
विपक्ष चाहता है कि बूथ और विधानसभा स्तर पर मतदाता सूची में हुए बदलावों की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक की जाए। इसके साथ ही किसी वैध मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे पर्याप्त सूचना देने और आपत्ति या अपील का अवसर देने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
विपक्ष का तर्क है कि मतदाता सूची लोकतांत्रिक चुनाव की बुनियादी आधारशिला है। इसलिए इसमें होने वाला कोई भी बदलाव स्पष्ट नियमों और सार्वजनिक निगरानी के तहत होना चाहिए।
SIR प्रक्रिया पर विपक्ष के गंभीर सवाल
SIR को लेकर विपक्ष का सबसे बड़ा आरोप यह है कि व्यापक स्तर पर मतदाता सूची के पुनरीक्षण से बड़ी संख्या में पात्र मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं। विपक्षी दल चाहते हैं कि भविष्य के चुनावों में SIR से पहले मौजूद मतदाता सूची को भी संदर्भ के तौर पर सुरक्षित रखा जाए।
विपक्ष का कहना है कि किसी मतदाता का नाम सूची से हटने के कारण उसे चुनाव में मतदान के संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, मतदाता सूची को अपडेट करना और अपात्र या डुप्लीकेट प्रविष्टियों को हटाना निर्वाचन प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है। इसलिए विवाद का मुख्य मुद्दा प्रक्रिया, सत्यापन और पारदर्शिता को लेकर है।
EVM के बजाय बैलेट पेपर की मांग
विपक्षी दलों ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल को लेकर भी अपनी पुरानी मांग दोहराई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की ओर से बताई गई मांगों में EVM की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराने की बात शामिल है।
विपक्ष का तर्क है कि बैलेट पेपर के इस्तेमाल से चुनाव प्रक्रिया को लेकर जनता का भरोसा बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, भारत में EVM के इस्तेमाल को लेकर चुनाव आयोग लगातार इसकी सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया में इसके इस्तेमाल का बचाव करता रहा है।
विपक्ष ने पहली बार मतदान करने वाले युवाओं के लिए मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया को आसान बनाने की मांग भी उठाई है।
विपक्षी दलों से एकजुट रहने की अपील
विपक्षी दलों ने INDIA ब्लॉक के घटक दलों से चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही के मुद्दे पर एकजुट रहने की अपील की है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में चुनावी संस्थाओं पर जनता का विश्वास सबसे महत्वपूर्ण है।
विपक्ष का दावा है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर किसी भी तरह का संदेह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर विषय है। इसी वजह से वे CEC के इस्तीफे, SIR की समीक्षा और चुनाव प्रणाली में बदलाव की मांग कर रहे हैं।
आगे बढ़ सकता है राजनीतिक टकराव
19 दलों के एक साथ सड़क पर उतरने से चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक विवाद और गहरा सकता है। एक ओर विपक्ष मतदाता सूची और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है, वहीं चुनाव आयोग की ओर से SIR और चुनावी प्रक्रिया को नियमों के तहत संचालित किए जाने की बात कही जाती रही है।
अब सभी की नजर विपक्ष के मार्च और उसके बाद होने वाली राजनीतिक प्रतिक्रिया पर है। यह प्रदर्शन केवल SIR के खिलाफ विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनावी संस्थाओं में भरोसा, मतदाता सूची की पारदर्शिता और भारत में चुनाव कराने की प्रक्रिया को लेकर चल रही व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।
18 घंटा पहलेतमिलनाडु उपचुनाव: मदुरांतकम और धारापुरम में मतदान जारी, कड़ी सुरक्षा के बीच 4.37 लाख मतदाता डालेंगे वोट
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तमिलनाडु की मदुरांतकम और धारापुरम विधानसभा सीटों पर मंगलवार सुबह 7 बजे उपचुनाव के लिए मतदान शुरू हुआ। दोनों सीटों पर 4.37 लाख से अधिक मतदाता वोट डालेंगे। मतदान शाम 6 बजे तक चलेगा और मतगणना 9 अक्टूबर को होगी।
चेन्नई: तमिलनाडु की मदुरांतकम और धारापुरम विधानसभा सीटों पर मंगलवार सुबह 7 बजे से उपचुनाव के लिए मतदान शुरू हो गया। दोनों क्षेत्रों में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। मतदान शाम 6 बजे तक चलेगा, जबकि मतगणना 9 अक्टूबर को होगी। दोनों सीटों पर मुकाबला सत्तारूढ़ दल समेत प्रमुख राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के बीच है।
285 और 320 मतदान केंद्रों पर हो रही वोटिंग
मदुरांतकम विधानसभा क्षेत्र में कुल 285 मतदान केंद्र बनाए गए हैं, जबकि धारापुरम में 320 केंद्रों पर मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं। चुनाव अधिकारियों ने मतदान से पहले ईवीएम, कंट्रोल यूनिट और वीवीपैट समेत सभी आवश्यक चुनावी सामग्री मतदान केंद्रों तक पहुंचा दी थी।
मदुरांतकम चेंगलपट्टू जिले में आता है, जबकि धारापुरम तिरुप्पुर जिले का हिस्सा है। दोनों सीटों पर मतदान को शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने के लिए प्रशासन ने सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई है।
दोनों सीटों पर 4.37 लाख से ज्यादा मतदाता
निर्वाचन क्षेत्र के आंकड़ों के अनुसार, मदुरांतकम में 2,13,788 पंजीकृत मतदाता हैं। वहीं धारापुरम में 2,23,306 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए पात्र हैं। इस तरह दोनों विधानसभा क्षेत्रों को मिलाकर कुल 4,37,094 मतदाता उपचुनाव में मतदान करेंगे।
चुनाव प्रचार समाप्त होने के बाद प्रशासन ने मतदान प्रक्रिया के लिए अंतिम तैयारियां पूरी कर ली थीं। मतदान केंद्रों पर जरूरी सुविधाओं के साथ सुरक्षा व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई है।
पूर्व AIADMK विधायकों के इस्तीफे से हुआ उपचुनाव
इन दोनों सीटों पर उपचुनाव की जरूरत तब पड़ी, जब AIADMK की विधायक मरगथम कुमारवेल और सत्यबामा ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया। बाद में दोनों नेता मुख्यमंत्री विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) में शामिल हो गईं।
अब दोनों नेता TVK के टिकट पर अपने-अपने पुराने विधानसभा क्षेत्रों से दोबारा चुनाव मैदान में हैं। इस वजह से दोनों सीटों का उपचुनाव राज्य की राजनीति में खास महत्व रखता है।
मदुरांतकम में 27 उम्मीदवार मैदान में
मदुरांतकम विधानसभा सीट पर कुल 27 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। इनमें TVK की ओर से मरगथम कुमारवेल, DMK के परंथामन, AIADMK के गणिता संपत, CPI(M) की सुगंधी और नाम तमिलर काची के जानकीरमन प्रमुख उम्मीदवारों में शामिल हैं।
बहुकोणीय मुकाबले के कारण इस सीट पर राजनीतिक दलों ने प्रचार अभियान के दौरान मतदाताओं तक पहुंचने के लिए पूरी ताकत लगाई। चुनाव परिणाम से यह भी संकेत मिलेगा कि क्षेत्र के मतदाताओं का समर्थन किस राजनीतिक धड़े की ओर जाता है।
धारापुरम में 22 प्रत्याशियों के बीच मुकाबला
धारापुरम विधानसभा सीट पर कुल 22 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। यहां TVK की सत्यबामा, AIADMK की भानुमति, DMK की सुकन्या, नाम तमिलर काची की कार्तिका और CPI के लक्ष्मणन प्रमुख दावेदारों में शामिल हैं।
स्वतंत्र उम्मीदवार भी चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। अलग-अलग दलों के उम्मीदवारों के बीच मुकाबले के कारण धारापुरम में भी मतदान को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज रही हैं।
मदुरांतकम में 3 हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात
मदुरांतकम में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत रखने के लिए 2,614 पुलिसकर्मियों के साथ 480 केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के जवानों की तैनाती की गई है। प्रशासन ने संवेदनशील क्षेत्रों और मतदान केंद्रों पर विशेष निगरानी की व्यवस्था की है।
धारापुरम में करीब 1,000 पुलिसकर्मी सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। चुनाव अधिकारियों का लक्ष्य मतदान प्रक्रिया को बिना किसी व्यवधान के पूरा कराना है।
मतदान सामग्री की सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित
मतदान से एक दिन पहले सोमवार को दोनों विधानसभा क्षेत्रों के मतदान केंद्रों के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन और अन्य चुनावी उपकरण भेजे गए। मदुरांतकम में कृषि विभाग के कार्यालय से मतदान सामग्री रवाना की गई। प्रत्येक वाहन के साथ सशस्त्र पुलिसकर्मी भी तैनात किए गए थे।
धारापुरम में भी ईवीएम, कंट्रोल यूनिट और वीवीपैट मशीनों को निर्धारित मतदान केंद्रों तक पहुंचाया गया। चुनाव ड्यूटी के लिए इस विधानसभा क्षेत्र में मतदान अधिकारियों और पर्यवेक्षकों समेत कुल 1,486 कर्मचारी लगाए गए हैं।
महिलाओं के लिए विशेष मतदान केंद्र
मदुरांतकम के कल्लापिरानपुरम स्थित सरकारी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के मतदान केंद्र संख्या 72 को विशेष रूप से महिला मतदाताओं के लिए निर्धारित किया गया है। ऐसे विशेष मतदान केंद्रों का उद्देश्य महिला मतदाताओं को सुविधाजनक और सुरक्षित मतदान वातावरण उपलब्ध कराना है।
बड़े नेताओं ने किया था प्रचार
उपचुनाव के लिए प्रचार अभियान में तमिलनाडु की राजनीति के कई प्रमुख चेहरे सक्रिय रहे। मुख्यमंत्री विजय ने TVK उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार किया। वहीं DMK अध्यक्ष एम.के. स्टालिन और पार्टी नेता उदयनिधि स्टालिन ने अपने उम्मीदवारों के लिए मतदाताओं से समर्थन मांगा।
AIADMK महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी ने पार्टी उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार किया। नाम तमिलर काची के मुख्य समन्वयक सीमन ने भी अपने प्रत्याशियों के लिए चुनाव प्रचार किया।
प्रचार अभियान समाप्त होने के बाद अब सभी दलों की नजर मतदान प्रतिशत और अंतिम चुनाव परिणाम पर है। 9 अक्टूबर को होने वाली मतगणना के बाद तस्वीर साफ होगी कि इन दोनों सीटों पर मतदाताओं ने किस राजनीतिक दल को अपना समर्थन दिया है।
पुडुचेरी की सीट पर भी मतदान
तमिलनाडु की इन दो सीटों के अलावा मंगलवार को पुडुचेरी की थट्टनचावडी विधानसभा सीट पर भी उपचुनाव के लिए मतदान हो रहा है। इस सीट पर डाले गए वोटों की गिनती भी 9 अक्टूबर को होगी।
इस तरह तमिलनाडु और पुडुचेरी की कुल तीन विधानसभा सीटों के उपचुनाव के परिणाम एक ही दिन घोषित किए जाएंगे। इन नतीजों पर राजनीतिक दलों के साथ-साथ देशभर की नजर रहेगी, क्योंकि परिणाम संबंधित क्षेत्रों में मतदाताओं के मौजूदा राजनीतिक रुझान का संकेत दे सकते हैं।
18 घंटा पहलेबंगाल उपचुनाव में बवाल: हुमायूं कबीर हिरासत में, नंदीग्राम में कांग्रेस ने लगाए गंभीर आरोप
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पश्चिम बंगाल समेत चार राज्यों की छह विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के दौरान सियासी हलचल तेज है। मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर को पुलिस ने हिरासत में लिया, जबकि नंदीग्राम में कांग्रेस ने पोलिंग एजेंट्स को धमकाने और जबरन हटाने का आरोप लगाया है।
नंदीग्राम: देश के चार राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी में छह विधानसभा सीटों पर मंगलवार को उपचुनाव के लिए मतदान हो रहा है। मतदान के बीच पश्चिम बंगाल की दो अहम सीटों नंदीग्राम और रेजीनगर से राजनीतिक तनाव और आरोप-प्रत्यारोप की खबरें सामने आई हैं। मुर्शिदाबाद में आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के प्रमुख और विधायक हुमायूं कबीर को पुलिस ने उनके पार्टी कार्यालय से हिरासत में लिया है। पुलिस की ओर से फिलहाल हिरासत में लिए जाने की वजह स्पष्ट नहीं की गई है।
दूसरी ओर, नंदीग्राम से कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान ने आरोप लगाया है कि उनके पोलिंग एजेंट्स को कथित तौर पर जबरन हटाया जा रहा है, धमकाया जा रहा है और उनके दस्तावेज भी छीने गए हैं। BJP ने इन आरोपों के बीच नंदीग्राम में अपनी जीत का अंतर पिछली बार की तुलना में कई गुना बढ़ने का दावा किया है।
मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर हिरासत में
रेजीनगर विधानसभा सीट से चुनावी मुकाबले के बीच AJUP प्रमुख हुमायूं कबीर को पुलिस ने मुर्शिदाबाद स्थित उनके पार्टी कार्यालय से हिरासत में लिया। हालांकि, पुलिस ने अभी तक यह नहीं बताया है कि उन्हें किस मामले या किस वजह से हिरासत में लिया गया है।
हुमायूं कबीर के बेटे गोलाम नबी आजाद रेजीनगर से चुनाव मैदान में हैं। हुमायूं कबीर ने मतदान प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि इलाके में वोटिंग सही तरीके से नहीं हो रही है और पुलिस आम मतदाताओं को परेशान कर रही है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि पिछले कुछ समय से मुस्लिम मतदाताओं को कथित तौर पर परेशान किया जा रहा है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
नंदीग्राम में कांग्रेस का पोलिंग एजेंट्स को लेकर आरोप
नंदीग्राम से कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान ने मतदान के दौरान गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि हर मतदाता को बिना किसी दबाव के मतदान करने का अधिकार मिलना चाहिए, लेकिन क्षेत्र में कथित तौर पर डर और दबाव का माहौल बनाया जा रहा है।
मिलन प्रधान के अनुसार, उनके पोलिंग एजेंट्स को मतदान से पहले ही कथित रूप से जबरन हटाया गया और धमकाया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ एजेंट्स के जरूरी कागजात छीन लिए गए।
कांग्रेस उम्मीदवार ने इन घटनाओं को चुनावी प्रक्रिया के लिए गंभीर बताते हुए निष्पक्ष मतदान की मांग की है। इन आरोपों पर संबंधित प्रशासन और पुलिस की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है।
BJP का दावा- नंदीग्राम में बढ़ेगा जीत का अंतर
उपचुनाव को लेकर BJP ने नंदीग्राम में बड़ी जीत का दावा किया है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा कि BJP इस बार नंदीग्राम में पिछली जीत की तुलना में करीब पांच गुना बड़े अंतर से जीत दर्ज कर सकती है।
BJP नेताओं का दावा है कि क्षेत्र में पार्टी का समर्थन मजबूत है। रेजीनगर को लेकर भी BJP का कहना है कि इस बार चुनाव परिणाम राजनीतिक समीकरणों में बदलाव का संकेत दे सकते हैं।
बंगाल सरकार में मंत्री दिलीप घोष ने भी नंदीग्राम में BJP की स्थिति मजबूत होने का दावा किया। उन्होंने कहा कि नंदीग्राम पहले से BJP के प्रभाव वाली सीट है और इस बार जीत का अंतर और बढ़ सकता है।
रेजीनगर में बहुकोणीय मुकाबला
रेजीनगर विधानसभा सीट पर इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प माना जा रहा है। यहां BJP, कांग्रेस, TMC के अलग-अलग राजनीतिक धड़ों, CPI(M) और हुमायूं कबीर की AJUP के उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं।
रेजीनगर मुस्लिम बहुल क्षेत्र है और यहां BJP उम्मीदवार शंकराव सरकार को छोड़कर प्रमुख दलों के कई उम्मीदवार मुस्लिम समुदाय से आते हैं। कांग्रेस ने मोहम्मद अब्दुल्लाहिल काफी, TMC ने रबीउल आलम चौधरी, जबकि AJUP ने हुमायूं कबीर के बेटे गोलाम नबी आजाद को मैदान में उतारा है।
इस सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसी वजह से BJP और विपक्षी दलों के बीच चुनावी रणनीति को लेकर मुकाबला काफी अहम हो गया है।
नंदीग्राम में मतदान से पहले थाना प्रभारी बदला गया
नंदीग्राम उपचुनाव में मतदान से ठीक एक दिन पहले चुनाव आयोग ने स्थानीय थाने के प्रभारी को बदल दिया था। मौजूदा अधिकारी अजय कुमार मिश्रा को हटाकर देबाशीष सरकार को नया प्रभारी नियुक्त किया गया।
यह बदलाव विपक्षी दलों की शिकायतों के बाद हुआ। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन थाना प्रभारी सत्ताधारी पक्ष के करीबी थे। चुनाव आयोग की कार्रवाई को निष्पक्ष चुनाव कराने की दिशा में उठाया गया कदम माना गया। हालांकि, पुलिस अधिकारी को बदलने के फैसले और उससे जुड़े आरोपों पर संबंधित पक्षों के अलग-अलग दावे हैं।
ममता बनर्जी की गैरमौजूदगी ने बढ़ाई नंदीग्राम की दिलचस्पी
इस उपचुनाव में पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक बड़ा पहलू यह भी है कि लंबे समय बाद ममता बनर्जी न तो मुख्यमंत्री हैं, न विधायक और न ही किसी सीट से उम्मीदवार हैं।
मई 2026 में हुए विधानसभा चुनाव में TMC सत्ता से बाहर हो गई थी और ममता बनर्जी को भी चुनावी हार का सामना करना पड़ा था। नंदीग्राम को लेकर शुरुआत में ऐसी अटकलें थीं कि ममता बनर्जी इस सीट से उपचुनाव लड़ सकती हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
TMC की ओर से नामित उम्मीदवार संचिता प्रधान ने बाद में अपना नामांकन वापस ले लिया। इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने का रुख अपनाया।
नंदीग्राम में BJP और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला
नंदीग्राम लंबे समय से पश्चिम बंगाल की राजनीति का प्रमुख केंद्र रहा है। 2007 का भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन इस क्षेत्र की राजनीति में निर्णायक मोड़ माना जाता है। इसी आंदोलन ने ममता बनर्जी और TMC को राज्य की सत्ता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
2021 में ममता बनर्जी ने नंदीग्राम से चुनाव लड़ा था, लेकिन BJP के शुभेंदु अधिकारी से हार गई थीं। इसके बाद से नंदीग्राम TMC और BJP के बीच राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक बन गया। 2026 के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम के अलावा भवानीपुर से भी चुनाव लड़ा और दोनों सीटों पर जीत हासिल की। भवानीपुर में उन्होंने ममता बनर्जी को 15,105 वोटों के अंतर से हराया था।
चंद्रनाथ रथ की हत्या के बाद चुनाव और संवेदनशील
नंदीग्राम उपचुनाव में BJP ने शुभेंदु अधिकारी के पूर्व सहयोगी रहे चंद्रनाथ रथ की मां को उम्मीदवार बनाया है। चंद्रनाथ रथ की 6 मई 2026 को हत्या कर दी गई थी। इस घटना के बाद नंदीग्राम का चुनाव और अधिक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बन गया है।
कांग्रेस और BJP दोनों इस सीट पर अपनी-अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हैं। वहीं, TMC की प्रत्यक्ष चुनावी मौजूदगी कमजोर होने के बावजूद ममता बनर्जी का कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन मुकाबले को अलग राजनीतिक दिशा दे रहा है।
उपचुनाव में निष्पक्ष मतदान पर नजर
पश्चिम बंगाल की दोनों सीटों पर मतदान के दौरान सामने आए आरोपों ने चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर बहस तेज कर दी है। कांग्रेस ने जहां अपने पोलिंग एजेंट्स को कथित तौर पर धमकाने का आरोप लगाया है, वहीं हुमायूं कबीर ने पुलिस पर पक्षपात और मतदाताओं को परेशान करने के आरोप लगाए हैं।
दूसरी ओर, BJP ने इन राजनीतिक आरोपों के बीच नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों में बेहतर प्रदर्शन का दावा किया है। अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मतदान का वास्तविक प्रतिशत कितना रहता है और मतदाताओं का रुझान किस दल के पक्ष में जाता है। चुनाव परिणाम ही यह तय करेंगे कि नंदीग्राम और रेजीनगर में मौजूदा राजनीतिक समीकरण कितने बदले हैं।
1 दिन पहलेसुप्रीम कोर्ट ने CEC ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड करने से किया इनकार, SIR पर चुनाव आयोग से मांगा जवाब
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सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तत्काल सस्पेंड करने से इनकार करते हुए SIR से जुड़े कथित एकतरफा फैसलों पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से उल्लंघन साबित होने पर संबंधित फैसलों पर कार्रवाई की जा सकती है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तत्काल सस्पेंड करने की मांग पर अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने उन याचिकाओं पर नोटिस जारी किया है, जिनमें आरोप लगाया गया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े कई फैसले अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। अदालत ने चुनाव आयोग से मामले पर स्पष्ट और पारदर्शी जवाब मांगा है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की। याचिकाकर्ताओं ने ज्ञानेश कुमार को पद के कामकाज से अलग करने, SIR से जुड़े कथित एकतरफा फैसलों को रद्द करने और मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की थी।
SIR के 14 फैसलों को लेकर विवाद
मामले की पृष्ठभूमि में SIR प्रक्रिया से जुड़े चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर उठे सवाल हैं। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि SIR से संबंधित करीब 14 फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए।
रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों को लेकर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं। याचिकाओं में इन्हीं आरोपों के आधार पर चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया की न्यायिक जांच की मांग की गई है।
याचिकाकर्ताओं ने क्या मांग की
याचिकाकर्ताओं ने कथित तौर पर एकतरफा तरीके से लिए गए फैसलों को रद्द करने की मांग की है। इसके साथ ही ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई और SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग भी की गई है।
एक याचिका में स्वतंत्र न्यायिक जांच आयोग या विशेष जांच दल गठित करने की मांग की गई है। इसमें चुनाव आयोग के रिकॉर्ड और संबंधित इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की जांच की मांग भी शामिल है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी मांग की गई कि अंतिम फैसला आने तक CEC को उनके पद की शक्तियों के इस्तेमाल से अलग रखा जाए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल निलंबन का आदेश देने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने कहा- पहले रिकॉर्ड सामने आने दें
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील ने CEC को तत्काल सस्पेंड करने या उनकी शक्तियों को सीमित करने की मांग की। इस पर पीठ ने सवाल किया कि अगर CEC को सस्पेंड कर दिया जाता है तो चुनाव कौन कराएगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर यह मानकर नहीं चल सकती कि चुनाव आयोग के सभी संबंधित फैसले एकतरफा लिए गए थे। कोर्ट ने चुनाव आयोग और संबंधित पक्षों से जवाब मांगते हुए कहा कि रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही यह तय किया जा सकता है कि कानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं।
CJI ने संकेत दिया कि यदि रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि कोई फैसला निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप नहीं लिया गया, तो अदालत उस फैसले को रद्द या निष्प्रभावी कर सकती है।
CEC को तत्काल सस्पेंड करने की मांग क्यों उठी
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को लेकर चिंता जताई। उनका तर्क था कि SIR जैसे महत्वपूर्ण चुनावी अभ्यास से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता और बहुसदस्यीय आयोग की प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि मामले में तत्काल अंतरिम कदम उठाना जरूरी है। सुनवाई के दौरान वकील ने स्थिति की गंभीरता बताते हुए कहा कि अदालत को कुछ अंतरिम आदेश देने चाहिए।
अदालत ने हालांकि तत्काल निलंबन के बजाय पहले संबंधित पक्षों का जवाब लेना उचित समझा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर रिकॉर्ड में निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन सामने आता है तो उसके पास संबंधित फैसलों पर कार्रवाई करने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों को लेकर क्या स्थिति है
CEC को हटाने और उनके खिलाफ कार्रवाई का संवैधानिक ढांचा अलग है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को चुनाव कराने और उनकी निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संविधान में विशेष प्रक्रिया निर्धारित है। अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह संसद की प्रक्रिया के माध्यम से हटाया जा सकता है।
हालांकि, चुनाव आयोग के फैसले न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर नहीं हैं। यदि कोई फैसला कानून या संविधान के अनुरूप नहीं पाया जाता है, तो अदालत उसके खिलाफ उचित न्यायिक आदेश पारित कर सकती है।
विवाद की शुरुआत इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से
ज्ञानेश कुमार को लेकर मौजूदा विवाद की पृष्ठभूमि में इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट भी है। रिपोर्ट में SIR प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों का जिक्र किया गया था।
रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR से संबंधित प्रक्रिया और फैसलों पर कई बार आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में पिछले 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 ऐसी आपत्तियों का उल्लेख किया गया।
याचिकाओं में इन्हीं रिपोर्टेड आपत्तियों को आधार बनाकर चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
विपक्ष की महाभियोग की तैयारी
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ राजनीतिक स्तर पर भी दबाव बढ़ रहा है। विपक्ष उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। इससे पहले अप्रैल 2026 में भी विपक्ष ने उनके खिलाफ महाभियोग नोटिस दिया था।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उस समय लोकसभा में प्रस्ताव खारिज हो गया था, जबकि राज्यसभा में मामला लंबित बताया गया था। अब विपक्ष एक बार फिर इस मुद्दे को संसद में उठाने की तैयारी कर रहा है।
कांग्रेस इस पहल का नेतृत्व कर रही है और उसने इस मुद्दे पर अन्य विपक्षी दलों के साथ चर्चा की है। प्रस्ताव को अगले दो सप्ताह के भीतर पेश किए जाने की संभावना बताई गई है।
ज्ञानेश कुमार को कानूनी सुरक्षा भी हासिल
CEC के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई को लेकर भी कानूनी सवाल उठ रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 के तहत आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए कार्यों या लिए गए फैसलों को लेकर सुरक्षा का प्रावधान है।
यानी आधिकारिक जिम्मेदारियों के निर्वहन में किए गए कार्यों के लिए CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों के खिलाफ दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू करने पर कानूनी सुरक्षा लागू होती है। इस प्रावधान के कारण केवल पुलिस कार्रवाई या गिरफ्तारी के जरिए CEC के खिलाफ कार्रवाई करना कानूनी रूप से जटिल हो सकता है।
भाजपा ने आरोपों को बताया आधारहीन
सत्तारूढ़ भाजपा ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज किया है। पार्टी का रुख है कि चुनाव आयुक्तों के बीच दर्ज की गई आपत्तियों को अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
भाजपा की ओर से यह भी तर्क दिया गया है कि संस्थागत बहस और अलग-अलग राय किसी लोकतांत्रिक संस्था की कार्यप्रणाली का हिस्सा हो सकती हैं।
महाभियोग सबसे बड़ा संवैधानिक रास्ता
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक रास्ता महाभियोग की प्रक्रिया है। अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को हटाने के लिए संसद की निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है।
महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के लिए लोकसभा में 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है। इसके बाद संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी को प्रस्ताव को स्वीकार करने पर निर्णय लेना होता है।
प्रस्ताव पारित कराने के लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में विपक्ष के लिए इस स्तर का समर्थन हासिल करना चुनौतीपूर्ण है।
1 दिन पहलेSwiss President Guy Parmelin India Visit: राष्ट्रपति भवन में भव्य स्वागत, पीएम मोदी से होगी अहम मुलाकात
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स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाई पार्मेलिन सोमवार को तीन दिवसीय भारत दौरे पर पहुंचे। राष्ट्रपति भवन में उनका भव्य स्वागत किया गया और उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया।
Swiss President Guy Parmelin: स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाय पार्मेलिन सोमवार को तीन दिवसीय भारत दौरे पर नई दिल्ली पहुंचे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर भारत आए स्विस राष्ट्रपति का राष्ट्रपति भवन में औपचारिक स्वागत किया गया। इस दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद रहे। स्वागत समारोह के दौरान गाय पार्मेलिन को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया।
यह दौरा भारत और स्विट्जरलैंड के बीच द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, विज्ञान एवं तकनीक, नवाचार, संस्कृति और लोगों के बीच संपर्क जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा होने की उम्मीद है।
राष्ट्रपति भवन में हुआ औपचारिक स्वागत
भारत पहुंचने के बाद स्विस राष्ट्रपति गाय पार्मेलिन का राष्ट्रपति भवन में भव्य स्वागत किया गया। यहां उन्हें औपचारिक सम्मान देते हुए गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया गया। इस अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उपस्थित रहे। तीन दिवसीय यात्रा के दौरान पार्मेलिन भारत के शीर्ष नेतृत्व के साथ विभिन्न द्विपक्षीय और वैश्विक मुद्दों पर बातचीत करेंगे। उनकी यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब भारत और यूरोपीय देशों के बीच व्यापार एवं आर्थिक संबंधों को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
पीएम मोदी के साथ होगी अहम बैठक
स्विस राष्ट्रपति अपनी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे। दोनों नेता भारत और स्विट्जरलैंड के बीच द्विपक्षीय सहयोग की प्रगति की समीक्षा करेंगे। बातचीत में व्यापार और निवेश के अलावा विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर ध्यान रहने की संभावना है। इसके साथ ही दोनों पक्ष लोगों की आवाजाही, संस्कृति और जनसंपर्क को बढ़ावा देने से जुड़े विषयों पर भी चर्चा करेंगे। भारत और स्विट्जरलैंड के बीच लंबे समय से आर्थिक और मानवीय संपर्क रहे हैं, ऐसे में उच्चस्तरीय वार्ता से इन क्षेत्रों में सहयोग को नई दिशा मिल सकती है।
बैठक में क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रमों पर भी विचारों का आदान-प्रदान होगा। दोनों नेता बहुपक्षीय मंचों पर भारत और स्विट्जरलैंड के बीच सहयोग को मजबूत करने के अवसरों पर भी चर्चा कर सकते हैं।
7 अक्टूबर को ईएफटीए समृद्धि शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे
स्विस राष्ट्रपति की भारत यात्रा का एक प्रमुख कार्यक्रम 7 अक्टूबर को आयोजित होने वाला दूसरा भारत-ईएफटीए समृद्धि शिखर सम्मेलन है। यह सम्मेलन भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के बीच व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते यानी TEPA के लागू होने की पहली वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित किया जा रहा है।
EFTA में स्विट्जरलैंड के साथ आइसलैंड, लिकटेंस्टीन और नॉर्वे शामिल हैं। भारत और EFTA के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने के लिए TEPA को महत्वपूर्ण समझौते के रूप में देखा जाता है। इस समझौते का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच व्यापार और निवेश के अवसरों को बढ़ाना है।
EFTA में स्विट्जरलैंड भारत का प्रमुख आर्थिक साझेदार
भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, EFTA देशों में स्विट्जरलैंड भारत का सबसे बड़ा व्यापार और निवेश साझेदार है। दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों के साथ-साथ शिक्षा, अनुसंधान, विज्ञान, तकनीक और लोगों के बीच संपर्क के क्षेत्र में भी सहयोग रहा है। भारत और स्विट्जरलैंड के संबंधों में नियमित उच्चस्तरीय यात्राओं और संवाद की अहम भूमिका रही है। स्विस राष्ट्रपति का मौजूदा दौरा भी इसी कड़ी का हिस्सा है। दोनों देशों के बीच बढ़ता आर्थिक सहयोग वैश्विक व्यापार के बदलते माहौल में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
1 दिन पहलेCJP का दावा- नेताओं की गिरफ्तारी की तैयारी, अभिजीत दीपके बोले- UAPA-NSA से नहीं डरेंगे
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कॉकरोच जनता पार्टी ने दावा किया है कि सरकार उसके नेताओं की गिरफ्तारी की तैयारी कर रही है। CJP नेता अभिजीत दीपके ने कहा कि UAPA और NSA की कार्रवाई से आंदोलन नहीं रुकेगा। पार्टी ने SIR और CEC के इस्तीफे की मांग को लेकर 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन का ऐलान किया है।
नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने दावा किया है कि सरकार उसके नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी की कार्रवाई की तैयारी कर रही है। पार्टी प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि अभिजीत दीपके, आशुतोष, रत्ना और पार्टी के अन्य नेताओं को गिरफ्तार किए जाने की संभावना है। हालांकि, यह दावा पार्टी की ओर से किया गया है और उपलब्ध जानकारी में सरकार या संबंधित एजेंसियों की ओर से इस कथित गिरफ्तारी योजना की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। पार्टी ने कहा है कि वह ऐसी किसी भी कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगी और उसका आंदोलन जारी रहेगा। CJP ने चुनाव आयोग के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन करने की घोषणा की है।
CJP ने गिरफ्तारी की तैयारी का किया दावा
CJP प्रवक्ता सौरव दास ने आरोप लगाया कि सरकार पार्टी के प्रमुख नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने की तैयारी कर रही है। उनके मुताबिक, अभिजीत दीपके, आशुतोष, रत्ना और अन्य नेताओं को गिरफ्तार किया जा सकता है।
दास ने कहा कि युवा अब अपने अधिकारों को लेकर पहले की तुलना में अधिक जागरूक हैं और वे ऐसी कार्रवाई को स्वीकार नहीं करेंगे, जिसे पार्टी तानाशाहीपूर्ण कदम के रूप में देखती है। उन्होंने दावा किया कि अगर सरकार नेताओं को गिरफ्तार करती है, तब भी आंदोलन जारी रहेगा।
पार्टी की ओर से लगाए गए इन आरोपों पर सरकार की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है।
अभिजीत दीपके ने अमित शाह से पूछा सवाल
CJP नेता अभिजीत दीपके ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को संबोधित करते हुए सोशल मीडिया पोस्ट में गिरफ्तारी को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि आखिर कितने लोगों को गिरफ्तार किया जाएगा।
दीपके ने दावा किया कि 10 अक्टूबर को देशभर से लोग दिल्ली पहुंचेंगे। उन्होंने कहा कि अगर सरकार को लगता है कि UAPA या NSA के तहत कार्रवाई अथवा जेल की सजा से आंदोलनकारी डर जाएंगे, तो ऐसा नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि पार्टी और उसके समर्थक किसी भी कार्रवाई का सामना करने के लिए तैयार हैं। दीपके ने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर वे महीनों या वर्षों तक जेल में रहने के लिए तैयार हैं, लेकिन लोकतंत्र बचाने की लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगे।
यह बयान अभिजीत दीपके का राजनीतिक वक्तव्य है। UAPA यानी गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और NSA यानी राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम अलग-अलग कानूनी प्रावधानों से संबंधित हैं।
10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन का ऐलान
CJP ने चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर अपना विरोध जारी रखने की बात कही है। पार्टी का कहना है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
इसी मुद्दे को लेकर CJP ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन का कार्यक्रम घोषित किया है। पार्टी की दूसरी प्रमुख मांग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से जुड़ी है।
CJP का कहना है कि प्रदर्शन के जरिए SIR को लेकर अपनी आपत्तियां सामने रखी जाएंगी और चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए जाएंगे।
SIR को लेकर राजनीतिक विवाद
मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को लेकर देश में राजनीतिक बहस चल रही है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची की जांच और उसे अपडेट करना है। चुनाव आयोग का कहना रहा है कि मतदाता सूची को सही और अद्यतन रखना स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी है।
विपक्षी दल और कुछ राजनीतिक समूह SIR की प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग आपत्तियां उठा रहे हैं। उनका कहना है कि प्रक्रिया के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम हटने की आशंका पर पर्याप्त सुरक्षा उपाय होने चाहिए।
इसी व्यापक विवाद के बीच CJP ने भी SIR को अपने राजनीतिक अभियान का प्रमुख मुद्दा बनाया है।
पार्टी का दावा- कार्रवाई से नहीं रुकेगा आंदोलन
CJP प्रवक्ता सौरव दास के मुताबिक, संभावित गिरफ्तारी पार्टी के आंदोलन को प्रभावित नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि युवा अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हो चुके हैं और किसी भी दबाव के कारण पीछे नहीं हटेंगे।
पार्टी का दावा है कि उसके नेता और कार्यकर्ता लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगों को उठाते रहेंगे। CJP ने कहा है कि यदि उसके नेताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होती है, तब भी 10 अक्टूबर का प्रदर्शन और उससे जुड़ा अभियान जारी रहेगा।
हालांकि, किसी भी संभावित गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई के संबंध में अंतिम स्थिति संबंधित सरकारी एजेंसियों या अदालतों की आधिकारिक कार्रवाई से ही स्पष्ट होगी।
UAPA और NSA का जिक्र क्यों?
अभिजीत दीपके ने अपने बयान में UAPA और NSA दोनों का उल्लेख किया है। उन्होंने कहा कि इन कानूनों के तहत संभावित कार्रवाई से पार्टी के नेता डरने वाले नहीं हैं।
UAPA का इस्तेमाल गैरकानूनी गतिविधियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कुछ मामलों में किया जाता है, जबकि NSA राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित परिस्थितियों में निवारक हिरासत से जुड़ा कानून है। किसी व्यक्ति पर इन कानूनों के तहत कार्रवाई होने के लिए संबंधित कानूनी प्रक्रिया और निर्धारित प्रावधान लागू होते हैं।
इस मामले में CJP ने केवल संभावित कार्रवाई की आशंका जताई है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना संभव नहीं है कि पार्टी के नेताओं के खिलाफ वास्तव में UAPA या NSA के तहत कोई मामला दर्ज किया गया है या गिरफ्तारी का आधिकारिक आदेश जारी हुआ है।
लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों का मुद्दा उठाया
CJP अपने अभियान को लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों से जोड़कर पेश कर रही है। अभिजीत दीपके ने कहा कि पार्टी किसी भी दबाव के सामने नहीं झुकेगी और लोकतंत्र से जुड़े मुद्दों पर अपना आंदोलन जारी रखेगी।
पार्टी के अनुसार, SIR और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दे सीधे नागरिकों के मतदान के अधिकार से जुड़े हैं। इसी वजह से CJP ने इस मुद्दे पर दिल्ली में प्रदर्शन करने का निर्णय लिया है।
वहीं, चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं को लेकर अंतिम स्थिति संबंधित आधिकारिक आदेशों और न्यायिक फैसलों से तय होगी।
10 अक्टूबर के प्रदर्शन पर नजर
CJP के ऐलान के बाद अब 10 अक्टूबर को दिल्ली में होने वाले प्रदर्शन पर नजर रहेगी। पार्टी ने दावा किया है कि बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल होंगे। प्रदर्शन के दौरान SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग प्रमुख मुद्दे रहेंगे।
सरकार की ओर से CJP के नेताओं की कथित गिरफ्तारी की तैयारी को लेकर आधिकारिक पुष्टि सामने आने तक इसे पार्टी का दावा ही माना जाएगा।






