श्रीकृष्ण के अंतिम संस्कार, उनके दिव्य हृदय और पुरी के जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी सदियों पुरानी मान्यता आज भी लोगों को आश्चर्य में डालती है। आइए जानते हैं इस रहस्य की पूरी कहानी।
मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर अपना अवतार पूर्ण करने के बाद देह त्याग दी। उनके अंतिम संस्कार से जुड़ी एक रहस्यमयी कथा आज भी प्रचलित है।
पौराणिक मान्यता कहती है कि अंतिम संस्कार में भगवान श्रीकृष्ण का शरीर अग्नि में विलीन हो गया, लेकिन उनका दिव्य हृदय अग्नि से अप्रभावित रहा।
कथा के अनुसार पांडवों ने दिव्य हृदय को समुद्र में प्रवाहित कर दिया। बहते हुए यह पुरी के समुद्र तट तक पहुंचा, जहां से आगे की कहानी शुरू होती है।
मान्यता है कि राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में भगवान का संदेश मिला। इसके बाद भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा में उस दिव्य तत्व को स्थापित किया गया।
हर 12 से 19 वर्ष में नवकलेवर परंपरा के दौरान नई प्रतिमाओं में ब्रह्म पदार्थ स्थापित किया जाता है। यह अनुष्ठान अत्यंत गोपनीय और विशेष नियमों के साथ संपन्न होता है।
भक्तों की मान्यता है कि यह दिव्य तत्व आज भी भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा में सुरक्षित है। हालांकि इस विश्वास की ऐतिहासिक या वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है और इसे धार्मिक आस्था के रूप में देखा जाता है।