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भगवती मां अंबा को क्यों कहा जाता है देवी दुर्गा? जानें पौराणिक कथा और असुर दुर्गम का रहस्य

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भगवती मां अंबा को देवी दुर्गा क्यों कहा जाता है? पौराणिक कथाओं में इसका जिक्र दुर्गम विजय के तौर पर मिलता है। ऐसा कहा जाता है कि मां अंबा ने दुर्गम नाम के एक असुर का वध किया था और फिर उसी असुर पर विजय के बाद देवी दुर्गा कहलाईं। देवी भागवत पुराण में इस कथा का वर्णन विस्तार से मिलता है।

हिंदू धर्म में मां दुर्गा को शक्ति, साहस और विजय का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि में देवी दुर्गा की पूजा और आराधना की जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मां अंबा को देवी दुर्गा क्यों कहा जाता है? इस नाम के पीछे एक पौराणिक कथा है, जो दुर्गम नाम के एक असुर से जुड़ी है।

दुर्गम विजय: एक असुर से जुड़ी कहानी

पौराणिक कथाओं के अनुसार, असुर हिरण्याक्ष के वंश में रुरु नाम का एक दैत्य उत्पन्न हुआ था। इसी रुरु का पुत्र था दुर्गम। राजा बनने के बाद दुर्गम ने स्वर्ग विजय का सपना देखा और इसके लिए उसने एक कुटिल योजना बनाई। दुर्गम ने ब्रह्माजी की तपस्या कर उनसे वेदों को मांग लिया। वेदों के छिन जाने से संसार में अज्ञानता और अराजकता फैल गई। दुर्गम ने वेदों को छिपा दिया, जिससे पाप और अधर्म का साम्राज्य स्थापित हो गया।

शाकुंभरी और शताक्षी अवतार

जब संसार में अकाल और अशांति फैलने लगी, तब भगवान विष्णु और देवताओं के आह्वान पर देवी अंबा प्रकट हुईं। करुणा से भरी हुई देवी ने अपने शरीर पर असंख्य आंखें प्रकट कर लीं और उन आंखों से जल प्रवाहित होने लगा। इस जल से नदियां फिर से बहने लगीं, जिससे संसार में हरियाली और जीवन लौट आया। इस स्वरूप को शताक्षी कहा गया। इसके बाद देवी ने शाक-सब्जियों का प्रकट करके लोगों को भोजन उपलब्ध कराया और शाकुंभरी नाम से पूजी जाने लगीं।

दुर्गमासुर से भीषण युद्ध

देवी के इस करुणामयी स्वरूप को देखकर दुर्गम क्रोधित हो गया और अपनी सेना के साथ पृथ्वी पर आक्रमण कर दिया। देवी ने अपनी शक्तियों से एक सुरक्षा चक्र बनाकर मनुष्यों की रक्षा की। दुर्गम ने मोहिनी अस्त्र का प्रयोग किया, जिससे देवता भ्रमित हो गए। लेकिन देवी ने चंडिका स्वरूप धारण कर सिंह पर सवार होकर दुर्गम और उसकी सेना से भयंकर युद्ध किया। देवी के 64 योगिनी स्वरूप प्रकट हुए, जिन्होंने राक्षस सेना का नाश कर दिया।

दुर्गमासुर का अंत

अंततः देवी ने दुर्गमासुर का वध त्रिशूल से कर दिया। पराजित होने के बाद दुर्गम ने देवी के कल्याणी स्वरूप के दर्शन की इच्छा जताई। देवी ने उसे अष्टभुजा रूप में दर्शन दिए। भगवान विष्णु ने घोषणा की कि मां अंबा ने दुर्गम नामक असुर का नाश कर कठिन कार्य को सिद्ध किया है, इसलिए वे दुर्गमनाशिनी कहलाईं और उनके नाम से देवी दुर्गा के रूप में पूजा होगी।

नवरात्र में मां दुर्गा की महत्ता

नवरात्र के नौ दिन केवल पूजा-अर्चना के नहीं होते, बल्कि ये आत्मिक और शारीरिक शुद्धि का समय भी है। इन दिनों मां दुर्गा की आराधना से नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मकता का संचार होता है। मां दुर्गा का नाम ही इस बात का प्रतीक है कि उन्होंने नकारात्मक शक्तियों को हराकर संसार में विजय का संदेश दिया।

उपसंहार

मां दुर्गा के नामकरण की यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन में कठिनाइयों और नकारात्मकता का सामना साहस और शक्ति से करना चाहिए। देवी दुर्गा की पूजा से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलते हुए हम हर विपरीत परिस्थिति पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

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