शेखचिल्ली की पहली कहानी

शेखचिल्ली की पहली कहानी
Last Updated: Thu, 16 Feb 2023

शेखचिल्ली को एक बार किसी सेठ के घर नौकरी मिल गई। शेख उसके घर के सारे काम कर दिया करता था। सेठ को भी तसल्ली थी कि घर में कोई हाथ बंटाने वाला आ गया है। वो सोचते थे कि अब सारा काम आसानी से हो जाएगा और मुझे किसी चीज की फिक्र भी करनी नहीं पड़ेगी। शेख ने भी पूरे घर का काम अच्छे से संभाल लिया था। वो रोजाना पूरा घर अच्छे से साफ कर दिया करता था। बस एक आदत उसमें बुरी थी कि वो घर से निकलने वाला सारा कूड़ा खिड़की से बाहर फेंक देता था।

घर तो साफ हो जाता था, लेकिन खिड़की से गिरता कचरा किसी-न-किसी राहगीर के कपड़े जरूर खराब कर देता था। कुछ समय बाद आसपास के सब लोग शेख की इस हरकत से परेशान हो गए। सबने एक साथ सेठ से शेख की शिकायत करने का फैसला किया। फैसला लेते ही आस पड़ोस के सारे लोग सेठ के घर पहुंच गए। इतने सारे लोगों को एक साथ अपने घर में देखकर सेठ को कुछ समझ नहीं आया। उन्होंने पूछा, “आप लोग अचानक यहां? क्या हुआ कोई बात हो गई?”

जवाब में लोगों ने रोज खिड़की से गिरने वाले कूड़े की बात सेठ को बता दी। सेठ ने यह सुनते ही शेख को आवाज लगाते हुए अपने पास बुलाया। शेख के आते ही सेठ ने उससे कहा कि ये सब तुम्हारी शिकायत कर रहे हैं कि तुम ऊपर से लोगों के ऊपर कचरा फेंक देते हो। ऐसा दोबारा मत करना। शेख ने मासूमियत के साथ पूछा कि साहब! घर का कचरा बाहर नहीं, तो कहा फेकूंगा? सेठ ने जवाब देते हुए कह दिया, “तुम भले लोगों को देखकर कूड़ा फेंका करो। ऐसे ही फेंक दोगे तो लोगों को परेशानी होगी।”

शेख ने सिर हिलाते हुए कहा, “ठीक है आप जैसा कहते हैं मैं आगे से वैसा ही करूंगा।” सेठ बोले, “ठीक है जाओ और दूसरे काम निपटा लो।” अगले दिन शेख घर की सफाई करने के बाद घंटों तक खिड़की पर कचरा लेकर खड़ा रहा। कुछ देर बाद उसने आराम-आराम से कचरा गिराना शुरू कर दिया। वहां से एक लड़का तैयार होकर जा रहा था। सारा कूड़ा उसपर गिर गया। गुस्से में वो युवक सेठ जी, सेठी जी चिल्लाते हुए अंदर आ गया। सेठ ने पूछा, “क्या हुआ इतने गुस्से में क्यों हो ?” “आपके घर का  कचरा शेखचिल्ली ने मेरे ऊपर डाल दिया है। मैं तैयार होकर कहीं जरूरी काम से जा रहा था।” जवाब में उस लड़के ने कहा।

सेठ ने गुस्से में शेख को बुलाया और कहा कि तुझे मैंने कल ही समझाया था, लेकिन दोबारा तूने कूड़ा लोगों पर डाल दिया। शेख ने जवाब में कहा, “साहब, आपने कहा था कि भले व्यक्ति को देखकर ही आराम से कूड़ा फेंकना। मैंने वैसा ही किया है। मैं खिड़की के पास कूड़ा लेकर काफी देर तक भले आदमी का इंतजार करता रहा। मुझे ये भले इंसान लगे, तो मैंने आराम-आराम से इन पर कूड़ा डाल दिया।” शेखचिल्ली की नासमझी पर हंसते हुए वो लड़का सेठ के घर से चला गया और सेठ अपना सिर पकड़कर बैठ गए।

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इस कहानी से यह सीख मिलती है कि – बोली गई बातों के सिर्फ शब्द नहीं पकड़ने चाहिए, बल्कि भाव को समझना चाहिए। तभी किसी बात को ठीक तरह से समझा जा सकता है, वरना गलती होना तय है।

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