AI Psychosis: क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आपकी सोच पर असर डाल रहा है? जानें क्या कहते हैं विशेषज्ञ

AI चैटबॉट्स से संवेदनशील यूजर्स भ्रमित हो सकते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि गंभीर तनाव या अवसाद में पेशेवर मदद जरूरी है।

AI साइकॉसिस तेजी से चिंता का विषय बन रहा है, जिसमें लोग AI चैटबॉट्स से बातचीत के दौरान वास्तविकता और कल्पना में अंतर नहीं कर पाते। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह मानसिक रूप से संवेदनशील यूजर्स में भ्रम, अवसाद और आत्महत्या के विचारों को बढ़ा सकता है। सही दिशा-निर्देश और पेशेवर मदद आवश्यक है।

AI Impact On Mental Health: विशेषज्ञों ने चेताया है कि AI चैटबॉट्स जैसे ChatGPT, Gemini और Grok मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकते हैं। हाल के अध्ययन बताते हैं कि संवेदनशील यूजर्स चैटबॉट्स से बातचीत में वास्तविकता और कल्पना में अंतर खो सकते हैं। अमेरिका और यूरोप में कई मामलों में यह भ्रम गंभीर मानसिक परेशानियों और आत्मघाती विचारों तक ले गया है। भारत में गुड़गांव की मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि AI टूल हल्के तनाव में सहारा दे सकते हैं, लेकिन गंभीर स्थितियों में पेशेवर थेरपिस्ट की मदद जरूरी है।

AI चैटबॉट्स और मानसिक उलझन

हाल के समय में AI साइकॉसिस तेजी से चर्चा में है। यह स्थिति तब होती है जब लोग AI चैटबॉट्स जैसे ChatGPT, Gemini या Grok से बातचीत करते हुए वास्तविकता और कल्पना में फर्क नहीं कर पाते। विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक रूप से संवेदनशील यूजर्स में यह भ्रम अधिक देखा जा रहा है, जिससे गंभीर मानसिक परेशानियों, यहां तक कि आत्मघाती विचारों का खतरा बढ़ सकता है।

डेनमार्क की आरहोस यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक सॉरेन ऑस्टरगार्ड के अनुसार, AI चैटबॉट्स सकारात्मक लेकिन असत्य उत्तर दे सकते हैं। स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने भी पाया कि ये चैटबॉट्स मानसिक बीमारियों से जुड़े गलत विश्वासों को अनजाने में बढ़ावा दे सकते हैं। ऐसे यूजर्स की सोच और अधिक भ्रमित हो जाती है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है।

AI Psychosis: क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आपकी सोच पर असर डाल रहा है? जानें क्या कहते हैं विशेषज्ञ

विशेषज्ञों की चेतावनी और भारत में स्थिति

भारत में गुड़गांव की मनोवैज्ञानिक डॉ. मुनिया भट्टाचार्या बताती हैं कि AI टूल अस्थायी सहारा दे सकते हैं, खासकर हल्के तनाव या अकेलेपन में। लेकिन गंभीर अवसाद, आत्महत्या या साइकॉसिस जैसी स्थितियों में ये चैटबॉट्स मदद नहीं करते, बल्कि जोखिम बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि AI थेरपी को इंसानी थेरपिस्ट के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि सपोर्ट टूल के रूप में ही उपयोग करना चाहिए।

इसके अलावा, शोधकर्ता कहते हैं कि AI के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव के बारे में और गहराई से रिसर्च की जरूरत है। सीमाओं को समझना और सही दिशा-निर्देश तैयार करना जरूरी है ताकि तकनीक का उपयोग सुरक्षित तरीके से किया जा सके।

AI के फायदे और सावधानी

AI चैटबॉट्स मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में नए अवसर भी ला रहे हैं। ये तुरंत उपलब्ध सहायता प्रदान कर सकते हैं और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ा सकते हैं। लेकिन साथ ही, विशेषज्ञों का सुझाव है कि उपयोगकर्ता को हमेशा सावधानी बरतनी चाहिए और गंभीर परिस्थितियों में पेशेवर मदद लेना प्राथमिकता होनी चाहिए।

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