अयोध्या में सावन पूर्णिमा पर झूलन उत्सव का समापन: झूलों पर विराजमान हुए भगवान, भक्तों-पुजारियों ने किया भजन-कीर्तन

अयोध्या में सावन शुक्ल तृतीया से चल रहा झूलन उत्सव सावन पूर्णिमा पर संपन्न हुआ। मंदिरों में भगवान को झूले पर विराजमान कर भजन-कीर्तन हुए।
अयोध्या में सावन पूर्णिमा पर झूलन उत्सव का समापन: झूलों पर विराजमान हुए भगवान, भक्तों-पुजारियों ने किया भजन-कीर्तन
Photo Credit / Attribution: Google

अयोध्या में सावन पूर्णिमा के अवसर पर भगवान श्रीराम, माता सीता और विभिन्न आराध्य स्वरूपों के पारंपरिक झूलन उत्सव का श्रद्धा और उल्लास के साथ समापन हो गया। सावन शुक्ल तृतीया से शुरू हुए इस उत्सव के अंतिम दिन रामनगरी के प्रमुख मंदिरों में देर रात तक धार्मिक आयोजन चलते रहे। मंदिरों को आकर्षक ढंग से सजाया गया और भगवान को फूलों से सजे झूलों पर विराजमान कर भक्तों ने दर्शन किए। इस दौरान मंदिर परिसर भजन-कीर्तन और जयकारों से गूंजते रहे।

सावन के महीने में अयोध्या की धार्मिक परंपराओं में झूलन उत्सव का विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान मंदिरों में भगवान के विग्रह को अलग-अलग तरह के झूलों पर विराजमान कराया जाता है। श्रद्धालु भगवान को झुलाने के साथ भजन और संकीर्तन करते हैं। पूरे सावन के दौरान रामनगरी में इस परंपरा की अलग-अलग मंदिरों में भव्य झलक देखने को मिलती है।

सावन पूर्णिमा की रात झूलन उत्सव के समापन अवसर पर अयोध्या के मंदिरों में विशेष सजावट की गई। कहीं फूलों से झूले सजाए गए तो कहीं चांदी और अन्य धातुओं से बने आकर्षक झूलों पर भगवान को विराजमान कराया गया। मंदिरों में पुजारियों और संतों ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। इसके बाद श्रद्धालुओं ने भगवान के झूले को धीरे-धीरे झुलाते हुए मंगल गीत और भजन गाए।

अयोध्या के प्रसिद्ध दशरथ महल में भी झूलन उत्सव की भव्य छटा देखने को मिली। यहां सोने-चांदी से बने आकर्षक झूले पर भगवान धनुषधारी को विराजमान कराया गया। महंत देवेंप्रसादाचार्य और उनके कृपापात्र अर्जुन द्वाराचार्य जगदगुरु कृपालु रामभूषण देवाचार्य ने भगवान को झुलाया। इस दौरान मंदिर में मौजूद श्रद्धालुओं ने भजन-कीर्तन में हिस्सा लिया और भगवान के दर्शन किए।

झूलन उत्सव के दौरान मंदिरों में भगवान के श्रृंगार का भी विशेष आकर्षण रहा। अलग-अलग दिनों में आराध्य को अलग-अलग स्वरूपों और पोशाकों में सजाया गया। फूलों, पत्तियों और रंग-बिरंगी सजावट से झूलों को आकर्षक रूप दिया गया। अंतिम दिन भी मंदिरों में विशेष श्रृंगार के साथ भगवान को झूले पर विराजमान कराया गया।

सावन पूर्णिमा के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु अयोध्या पहुंचे। भक्तों ने रामलला समेत प्रमुख मंदिरों में दर्शन-पूजन किया और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। सुबह से ही मंदिरों और आसपास के क्षेत्रों में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही। शाम होते-होते झूलन उत्सव को लेकर मंदिर परिसरों में रौनक और बढ़ गई।

झूलन उत्सव सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अयोध्या की सदियों पुरानी सांस्कृतिक और भक्ति परंपरा का हिस्सा भी माना जाता है। सावन में जब चारों ओर हरियाली और मौसम में बदलाव दिखाई देता है, उसी दौरान मंदिरों में भगवान को झूले पर विराजमान कराने की परंपरा श्रद्धालुओं के बीच विशेष उत्साह पैदा करती है। भक्त इसे भगवान के साथ सावन की खुशियां साझा करने के भाव से जोड़कर देखते हैं।

उत्सव के दौरान संतों और पुजारियों ने भगवान के सामने भजन-कीर्तन किए। ढोलक, मंजीरे और अन्य वाद्य यंत्रों के साथ भक्तों ने संकीर्तन में हिस्सा लिया। मंदिरों में लगातार धार्मिक गीतों और जयकारों की गूंज सुनाई देती रही। कई स्थानों पर श्रद्धालुओं ने बारी-बारी से भगवान के झूले को झुलाया।

सावन पूर्णिमा के साथ ही इस वर्ष का झूलन उत्सव अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचा। पूरे आयोजन के दौरान अयोध्या के विभिन्न मंदिरों में भक्तिमय माहौल बना रहा। समापन के मौके पर भी श्रद्धालुओं में उत्साह कम नहीं हुआ। देर रात तक मंदिरों में दर्शन और धार्मिक कार्यक्रम चलते रहे।

अयोध्या में झूलन उत्सव की खासियत यह है कि यहां भगवान को केवल मंदिर के गर्भगृह में विराजमान देवता के रूप में नहीं, बल्कि भक्तों के बीच परिवार के सदस्य की तरह उत्सव में शामिल किया जाता है। सावन के झूलों पर आराध्य को विराजमान कर उन्हें झुलाने की परंपरा इसी भाव को दर्शाती है। भक्त भगवान के सामने बैठकर गीत गाते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

सावन पूर्णिमा पर उत्सव के समापन के साथ ही मंदिरों में झूलों को उतारने की प्रक्रिया शुरू हो गई। हालांकि, पूरे आयोजन की यादें श्रद्धालुओं के बीच बनी रहेंगी। रामनगरी में सावन के दौरान आयोजित होने वाला यह उत्सव धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु अयोध्या पहुंचते हैं।

इस बार भी झूलन उत्सव के दौरान अयोध्या के मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया। भगवान के झूले, विशेष श्रृंगार, फूलों की सजावट और भजन-कीर्तन ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बनाए रखा। सावन पूर्णिमा की रात उत्सव के समापन के साथ रामनगरी में झूलन परंपरा का यह चरण पूरा हुआ, लेकिन मंदिरों में भक्ति और धार्मिक आयोजनों का सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।

 

Leave a comment