Bangladesh में इमरान-मॉडल की वापसी? शेख हसीना ने चुनाव से पहले बदला सारा समीकरण

बांग्लादेश में चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक मोड़। अंतरिम सरकार ने आवामी लीग नेताओं को निर्दलीय रूप में चुनाव लड़ने की अनुमति दी, जिससे इमरान खान मॉडल जैसी स्थिति

बांग्लादेश में चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक ट्विस्ट आया है। अंतरिम सरकार ने आवामी लीग के नेताओं को निर्दलीय रूप से चुनाव लड़ने की अनुमति देकर पूरा समीकरण बदल दिया है। यह कदम पाकिस्तान के इमरान खान मॉडल जैसा ही परिदृश्य बनाता दिख रहा है।

Dhaka: बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़े मोड़ की शुरुआत हो चुकी है। चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले जो कदम उठाया गया है, उसने पूरे चुनावी माहौल को अचानक बदल दिया है। अंतरिम सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग को आंशिक राहत दी है, जो पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। 

यह फैसला पाकिस्तान में इमरान खान की पार्टी PTI के खिलाफ लिए गए कार्रवाई की याद दिलाता है, जहां पार्टी पर बैन के बावजूद उसके उम्मीदवार निर्दलीय के तौर पर जीतकर आए थे। बांग्लादेश में अब कुछ वैसा ही परिदृश्य बनता दिख रहा है।

आवामी लीग नेताओं को चुनाव लड़ने की अनुमति

अंतरिम सरकार ने ऐलान किया कि आवामी लीग के clean image वाले नेता और कार्यकर्ता चुनाव लड़ सकते हैं। लेकिन उन्हें किसी भी हाल में आवामी लीग के symbol पर चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं दी जाएगी। यानी पार्टी पर लगा प्रतिबंध बरकरार रहेगा।

इन नेताओं को केवल निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरना होगा। यह फैसला सरकार की ओर से किया गया एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है, क्योंकि इससे एक तरफ राजनीतिक संतुलन कायम रहेगा और दूसरी तरफ आवामी लीग को पूरी तरह चुनाव से बाहर भी नहीं किया जाएगा।

विशेषज्ञों के मुताबिक, यह निर्णय आने वाले चुनावों में सत्ता संघर्ष को और दिलचस्प बना देगा। आवामी लीग, जो पिछले कई वर्षों से देश की प्रमुख ताकत रही है, अब बिना पार्टी पहचान के अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश करेगी।

इमरान खान मॉडल की झलक

यह स्थिति पाकिस्तान की 2024 की चुनावी राजनीति से बेहद मिलती-जुलती है। पाकिस्तान में जब इमरान खान को जेल भेजा गया था और उनकी पार्टी PTI पर बैन लगाया गया था, तब भी PTI के कई नेता निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में उतरे और भारी संख्या में सीटें जीतकर आए।

Bangladesh में इमरान-मॉडल की वापसी? शेख हसीना ने चुनाव से पहले बदला सारा समीकरण

बांग्लादेश में भी इसी तरह की संभावनाएं बन रही हैं, जहां आवामी लीग के कई नेता निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ेंगे और पार्टी की आंतरिक ताकत को बचाए रखने की कोशिश करेंगे।

जुलाई विद्रोह के बाद पहला बड़ा चुनाव

जुलाई 2024 के जनविद्रोह में शेख हसीना सरकार के गिरने के बाद बांग्लादेश अब सत्ता परिवर्तन के बाद अपने पहले राष्ट्रीय चुनाव की तैयारी में है। एक साल से अधिक समय बाद होने वाला यह चुनाव देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार बांग्लादेश चुनाव आयोग गुरुवार को आधिकारिक तौर पर चुनाव तारीख की घोषणा करेगा।

चुनाव आयोग के वरिष्ठ सचिव अख्तर अहमद ने बताया कि तारीखों की घोषणा मुख्य चुनाव आयुक्त एएमएम नासिर उद्दीन द्वारा शाम 6 बजे राष्ट्रीय प्रसारण के माध्यम से की जाएगी। यह घोषणा बांग्लादेश की राजनीतिक दिशा को आने वाले वर्षों के लिए तय करने वाली मानी जा रही है।

जुलाई चार्टर पर जनमत संग्रह की तैयारी

चुनाव घोषणा के साथ ही सरकार द्वारा तैयार किए गए जुलाई चार्टर पर भी जनमत संग्रह कराए जाने की संभावना है। यह चार्टर राजनीतिक और प्रशासनिक सुधारों का एक व्यापक खाका है जिसमें कार्यपालिका पर नियंत्रण बढ़ाने, न्यायपालिका और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को मजबूत करने और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के दुरुपयोग को रोकने से जुड़े सुझाव शामिल हैं।

चुनाव 2026 में होने की संभावना

चुनाव आयोग पहले ही संकेत दे चुका है कि राष्ट्रीय चुनाव फरवरी 2026 के पहले सप्ताह में कराए जा सकते हैं। चुनाव आयोग प्रमुख एएमएम नासिर उद्दीन ने कहा था कि चुनाव कराना चुनौतीपूर्ण होगा क्योंकि मतदाताओं का चुनाव प्रणाली और प्रशासनिक प्रक्रिया पर भरोसा कमजोर पड़ा है। 

उन्होंने माना कि पिछले राजनीतिक संकटों और हिंसा के कारण जनता का विश्वास कम हुआ है और उसे वापस लाना एक लंबी प्रक्रिया होगी। चुनाव आयोग का मानना है कि पारदर्शी और शांतिपूर्ण चुनाव ही देश को स्थिरता प्रदान कर सकते हैं।

मुख्य राजनीतिक दावेदारों पर नजर

आगामी चुनाव में सबसे मजबूत दावेदार के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को देखा जा रहा है। अंतरिम सरकार द्वारा प्रतिबंधों में ढील मिलने के बाद जमात-ए-इस्लामी भी राजनीतिक मैदान में वापसी कर सकती है। यह वही पार्टी है जिसे 2013 के एक अदालती फैसले के बाद चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी गई थी क्योंकि अदालत ने उसकी विचारधारा को देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान के खिलाफ माना था। 

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