बिहार में इन दिनों क्रेडिट-डिपॉजिट (CD) रेशियो को लेकर बहस तेज हो गई है। चर्चा का केंद्र यह है कि राज्य में लोगों और संस्थानों द्वारा बैंकों में जमा किए गए बड़े हिस्से का पैसा स्थानीय स्तर पर ऋण के रूप में इस्तेमाल नहीं हो रहा, बल्कि बैंकिंग व्यवस्था के माध्यम से दूसरे राज्यों में भी उपयोग हो रहा है। इसी संदर्भ में करीब ₹2.44 लाख करोड़ की राशि को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या बिहार की जमा पूंजी का लाभ दूसरे राज्यों, विशेषकर औद्योगिक रूप से विकसित दक्षिण भारतीय राज्यों को अधिक मिल रहा है।
क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो का अर्थ है कि किसी राज्य में बैंकों ने जितनी राशि जमा (Deposit) के रूप में ली है, उसका कितना प्रतिशत उसी राज्य में ऋण (Credit) के रूप में दिया गया। यदि किसी राज्य का CD रेशियो कम होता है तो इसका मतलब है कि वहां जमा धन की तुलना में कम कर्ज वितरित किया जा रहा है। शेष धन बैंक अपनी समग्र बैंकिंग व्यवस्था के तहत अन्य क्षेत्रों या राज्यों में भी निवेश या ऋण के रूप में लगा सकते हैं।
बिहार लंबे समय से कम CD रेशियो वाले राज्यों में गिना जाता रहा है। इसका प्रमुख कारण राज्य में बड़े उद्योगों की अपेक्षाकृत कम संख्या, निवेश की सीमित संभावनाएं, बैंक योग्य परियोजनाओं की कमी और ऋण मांग का अपेक्षाकृत कम स्तर माना जाता है। इसके विपरीत महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और गुजरात जैसे राज्यों में उद्योग, व्यापार और सेवा क्षेत्र अधिक विकसित होने के कारण ऋण की मांग भी अधिक रहती है।
यही वजह है कि बिहार सरकार लगातार चाहती है कि बैंक राज्य में अधिक से अधिक ऋण वितरित करें। यदि किसानों, युवाओं, महिलाओं, स्टार्टअप, लघु एवं मध्यम उद्योगों (MSME), स्वयं सहायता समूहों और नए उद्यमियों को अधिक कर्ज मिलेगा तो स्थानीय स्तर पर रोजगार, निवेश और आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी। इससे राज्य की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
सरकार का मानना है कि यदि बिहार में जमा होने वाला अधिक पैसा यहीं के लोगों और उद्योगों को ऋण के रूप में उपलब्ध कराया जाए तो नए कारोबार शुरू होंगे, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी तथा बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इसी उद्देश्य से विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत बैंकों को ऋण वितरण बढ़ाने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है।
हालांकि बैंकिंग विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अधिक ऋण देना ही समाधान नहीं है। ऋण लेने वालों की भुगतान क्षमता, परियोजनाओं की व्यवहार्यता और बैंकिंग नियमों का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि बिना पर्याप्त मूल्यांकन के ऋण दिया जाए तो गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए बैंक ऋण वितरण में आर्थिक व्यवहार्यता और नियामकीय मानकों का भी ध्यान रखते हैं।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार बिहार में आधारभूत ढांचे का विकास, औद्योगिक निवेश, कौशल विकास और उद्यमिता को बढ़ावा मिलने से भविष्य में ऋण की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी। इससे राज्य का क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो भी बेहतर हो सकता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को अधिक लाभ मिलेगा।










