ब्राह्मण ‘राजनीतिक रूप से पिछड़े’? सुप्रीम कोर्ट करेगा आरक्षण पर विचार

सुप्रीम कोर्ट में ब्राह्मण समुदाय को ‘राजनीतिक रूप से पिछड़ा’ घोषित करने और आरक्षण देने के मुद्दे पर विचार होगा। जानिए इस फैसले की पृष्ठभूमि और संभावित असर।

ब्राह्मण राजनीतिक रूप से पिछड़े हो सकते हैं — क्या यह संभव है? सामाजिक और शैक्षिक रूप से ब्राह्मणों को सबसे उन्नत माना जाता है, लेकिन लोकतंत्र के जमीनी स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधियों में उनकी उपस्थिति बेहद कम है।

नई दिल्ली: भारत में आरक्षण प्रणाली को लेकर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) में बहस छिड़ गई है। इस बार सवाल है कि क्या ब्राह्मण समुदाय, जो सामाजिक और शैक्षिक रूप से सबसे उन्नत माना जाता है, राजनीतिक रूप से पिछड़ा वर्ग (PBC – Public Backward Class) माना जा सकता है और क्या उन्हें पंचायतों व स्थानीय चुनावों में आरक्षण का हकदार माना जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने एक गैर सरकारी संगठन (NGO) ‘यूथ फॉर इक्वालिटी फाउंडेशन’ की याचिका पर इस मुद्दे की सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों का हवाला दिया गया है और इस बार न्यायालय इस बात की जांच करेगा कि क्या ब्राह्मण समुदाय को राजनीतिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए।

याचिका कौन और कैसे दायर की गई?

गैर सरकारी संगठन ‘यूथ फॉर इक्वालिटी फाउंडेशन’ ने यह याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायणन के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में दायर की है। याचिका में मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, और जस्टिस आर. महादेवन व जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष यह मामला रखा गया। याचिका में उल्लेख किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने के. कृष्ण मूर्ति मामले में फैसला सुनाया था कि सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन जरूरी नहीं कि राजनीतिक पिछड़ेपन के समान हो। अब यह सवाल उठाया गया है कि क्या ब्राह्मण समुदाय को राजनीतिक रूप से पिछड़ा माना जा सकता है और उन्हें स्थानीय स्वशासन में आरक्षण दिया जा सकता है।

CJI सूर्यकांत की पीठ ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर प्रारंभिक तौर पर कहा कि यह मामला जांच के योग्य है। पीठ ने संकेत दिया कि सामान्यतः PBC वर्ग के लोग वही हो सकते हैं जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हों (SEBC)। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यदि किसी SEBC समुदाय का स्थानीय प्रतिनिधित्व कम है, तो उन्हें PBC के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। लेकिन इसका उल्टा सच नहीं है।

यानी केवल राजनीतिक रूप से पिछड़े होने के आधार पर किसी समुदाय को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता, जब तक वे सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े न हों।

पिछला सुप्रीम कोर्ट का फैसला

2010 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने स्पष्ट किया था कि राज्य सरकारों को अपनी आरक्षण नीतियों में बदलाव करने की सलाह दी जाती है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि PBC और SEBC के लिए समान नीतियां बनाई जाएँ। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि शिक्षा और रोजगार में आरक्षण मिलने वाले समूहों को स्थानीय स्वशासन में आरक्षण देना जरूरी नहीं है। 

कोर्ट ने यह भी माना कि राजनीतिक भागीदारी में बाधाएं शिक्षा और रोजगार तक पहुंच की बाधाओं के समान नहीं होती। इसलिए स्थानीय चुनावों में आरक्षण नीति पर नए सिरे से सोचने और नीति निर्माण की आवश्यकता है। शंकर नारायणन ने याचिका में कहा कि 15 साल बीत जाने के बावजूद किसी भी राज्य ने सार्वजनिक पिछड़े वर्ग (PBC) की पहचान कर आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का निर्माण नहीं किया। 

उन्होंने बताया कि केवल SEBC समुदायों को ही आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र दिए गए हैं। याचिका में यह भी मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट महाराष्ट्र और अन्य राज्यों से जवाब मांगे और यह तय करे कि क्या ब्राह्मण या अन्य समुदाय जो सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से उन्नत हैं, उन्हें राजनीतिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण मिल सकता है।

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