Commonwealth Games 2026: सिर्फ 10 खेल, बड़ी चुनौतियां और भारत की उम्मीदें, ग्लासगो में क्यों अलग होगा इस बार का आयोजन?

Commonwealth Games 2026 इस बार ग्लासगो में सिर्फ 10 खेलों के साथ होगा। जानिए आयोजन में क्या बदला है, भारत के सामने कौन-सी चुनौतियां हैं और किन

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 का आगाज 23 जुलाई से स्कॉटलैंड के ग्लासगो में होने जा रहा है। यह खेलों का 23वां संस्करण होगा, लेकिन कई मायनों में इसे अब तक का सबसे अलग और चुनौतीपूर्ण आयोजन माना जा रहा है।

स्पोर्ट्स न्यूज़: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 का आयोजन 23 जुलाई से स्कॉटलैंड के ग्लासगो में शुरू होने जा रहा है। खेलों का यह 23वां संस्करण कई वजहों से पिछले आयोजनों से बिल्कुल अलग होगा। इस बार प्रतियोगिता का आकार छोटा रखा गया है और खेलों की संख्या को घटाकर सिर्फ 10 कर दिया गया है। इसका सीधा असर भारत जैसे मजबूत खेल राष्ट्रों की पदक संभावनाओं पर भी पड़ेगा, क्योंकि देश के कई पारंपरिक पदक दिलाने वाले खेल इस बार प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं हैं।

भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में शानदार प्रदर्शन किया है और पदक तालिका में दुनिया के सबसे सफल देशों में शामिल रहा है। लेकिन ग्लासगो में भारतीय दल को अपनी रणनीति बदलनी होगी। कुश्ती, निशानेबाजी, बैडमिंटन और हॉकी जैसे खेलों की गैरमौजूदगी के बीच भारतीय खिलाड़ियों को सीमित अवसरों में अधिक से अधिक पदक हासिल करने होंगे। ऐसे में नीरज चोपड़ा, मीराबाई चानू और लवलीना बोरगोहेन जैसे सितारों पर खास नजर रहेगी।

कैसे शुरू हुआ कॉमनवेल्थ गेम्स का सफर?

कॉमनवेल्थ गेम्स का इतिहास 1930 से शुरू होता है। पहली बार इन खेलों का आयोजन कनाडा के हैमिल्टन में हुआ था और उस समय इनका नाम ब्रिटिश एम्पायर गेम्स था। शुरुआत में इसमें ब्रिटिश साम्राज्य से जुड़े देशों और क्षेत्रों के खिलाड़ी हिस्सा लेते थे। समय के साथ दुनिया में राजनीतिक बदलाव आए और प्रतियोगिता का स्वरूप भी बदलता गया।

इन खेलों का आयोजन आमतौर पर हर चार साल में होता है। हालांकि द्वितीय विश्व युद्ध के कारण 1942 और 1946 में कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजित नहीं किए जा सके। भारत ने पहली बार 1934 में इन खेलों में हिस्सा लिया था। आजादी के बाद से भारतीय खिलाड़ियों ने लगातार इन खेलों में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है।

ग्लासगो में दूसरी बार कॉमनवेल्थ गेम्स

ग्लासगो के लिए 2026 का आयोजन खास है, क्योंकि यह शहर दूसरी बार कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी करेगा। इससे पहले 2014 में यहां खेलों का सफल आयोजन हुआ था। हालांकि 2026 का संस्करण 2014 से काफी अलग होगा। 2014 में 14 वेन्यू पर 17 खेलों की प्रतियोगिताएं आयोजित की गई थीं। इस बार आयोजन को चार प्रमुख खेल परिसरों तक सीमित रखा गया है। सभी प्रमुख आयोजन स्थल एक-दूसरे के करीब स्थित हैं और लगभग आठ मील के दायरे में प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी।

आयोजन को छोटा और केंद्रीकृत रखने के पीछे खर्च कम करना, मौजूदा बुनियादी ढांचे का बेहतर उपयोग करना और आयोजन को अधिक टिकाऊ बनाना प्रमुख उद्देश्य हैं। यह मॉडल भविष्य में बड़े खेल आयोजनों के लिए एक नई दिशा भी दिखा सकता है।

Commonwealth Games 2026: सिर्फ 10 खेल, बड़ी चुनौतियां और भारत की उम्मीदें, ग्लासगो में क्यों अलग होगा इस बार का आयोजन?

कौन से देश सबसे ज्यादा बार मेजबानी कर चुके हैं?

कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी के मामले में ऑस्ट्रेलिया सबसे आगे है। उसने अब तक पांच बार इस प्रतियोगिता की मेजबानी की है। कनाडा चार बार मेजबान रह चुका है। ग्लासगो में 2026 के आयोजन के साथ स्कॉटलैंड भी चार बार मेजबानी करने वाले देशों की सूची में शामिल हो जाएगा। इंग्लैंड ने तीन बार और न्यूजीलैंड ने तीन बार कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी की है। भारत ने 2010 में दिल्ली में पहली बार इन खेलों की मेजबानी की थी। इसके अलावा मलेशिया, जमैका और वेल्स भी मेजबानी कर चुके हैं।

2026 में सिर्फ 10 खेल क्यों?

बर्मिंघम में 2022 में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में 20 खेल शामिल थे। इसके मुकाबले ग्लासगो संस्करण में खेलों की संख्या आधी कर दी गई है। इस बार एथलेटिक्स और पैरा एथलेटिक्स, स्विमिंग और पैरा स्विमिंग, आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक्स, ट्रैक साइकिलिंग और पैरा ट्रैक साइकिलिंग, नेटबॉल, वेटलिफ्टिंग और पैरा वेटलिफ्टिंग, बॉक्सिंग, जूडो, बॉल्स और पैरा बॉल्स तथा 3x3 बास्केटबॉल और व्हीलचेयर 3x3 बास्केटबॉल को शामिल किया गया है।

कम खेलों का मतलब यह है कि खिलाड़ियों के लिए पदक जीतने के अवसर भी सीमित होंगे। भारत के लिए यह स्थिति खास तौर पर चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि उसके कई मजबूत खेल इस बार कार्यक्रम में नहीं हैं।

इन खेलों की गैरमौजूदगी से भारत को नुकसान

क्रिकेट, हॉकी, बैडमिंटन, कुश्ती, निशानेबाजी और टेबल टेनिस जैसे खेल ग्लासगो 2026 के कार्यक्रम से बाहर हैं। इसके अलावा स्क्वैश, डाइविंग, रग्बी सेवेंस, बीच वॉलीबॉल, माउंटेन बाइकिंग और रिदमिक जिम्नास्टिक्स भी इस संस्करण में नहीं होंगे। भारत के नजरिए से सबसे बड़ा झटका निशानेबाजी, कुश्ती, बैडमिंटन और हॉकी के बाहर होने का है। 

इन खेलों ने पिछले कई कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की पदक संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसलिए इस बार भारत को एथलेटिक्स, बॉक्सिंग, वेटलिफ्टिंग और अन्य उपलब्ध स्पर्धाओं में ज्यादा मजबूत प्रदर्शन करना होगा।

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मीराबाई चानू पर रहेंगी नजरें

वेटलिफ्टिंग भारत के सबसे मजबूत पदक क्षेत्रों में से एक रही है। ऐसे में टोक्यो ओलंपिक की रजत पदक विजेता और 2022 कॉमनवेल्थ चैंपियन मीराबाई चानू से एक बार फिर स्वर्ण पदक की उम्मीद होगी। अनुभवी मीराबाई के पास बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में दबाव से निपटने का लंबा अनुभव है। उनके प्रदर्शन पर भारत की पदक उम्मीदें काफी हद तक निर्भर करेंगी।

बॉक्सिंग में भारत की प्रमुख उम्मीदों में लवलीना बोरगोहेन का नाम शामिल है। टोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली लवलीना अब कॉमनवेल्थ गेम्स में अपनी पहली पदक सफलता हासिल करने के लक्ष्य के साथ उतरेंगी। भारत की मुक्केबाजी टीम से इस बार भी मजबूत प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही है। लवलीना के अनुभव और अंतरराष्ट्रीय स्तर की उपलब्धियों को देखते हुए वह भारत के लिए अहम पदक दावेदार हो सकती हैं।

नीरज चोपड़ा होंगे सबसे बड़े आकर्षण

एथलेटिक्स में भारत की सबसे बड़ी उम्मीद नीरज चोपड़ा होंगे। ओलंपिक और विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना चुके भारतीय भाला फेंक स्टार की मौजूदगी से एथलेटिक्स प्रतियोगिता का रोमांच बढ़ेगा। नीरज की अगुआई में भारत की मजबूत एथलेटिक्स टीम मैदान में उतरेगी। ऐसे में सिर्फ नीरज ही नहीं, बल्कि अन्य भारतीय एथलीटों से भी पदक की उम्मीद की जा रही है।

ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 का उद्घाटन समारोह 23 जुलाई को होगा। ब्रिटेन के किंग चार्ल्स तृतीय और क्वीन कैमिला समारोह में शामिल होंगे। किंग चार्ल्स आधिकारिक तौर पर खेलों के उद्घाटन की घोषणा करेंगे। समारोह का सबसे खास हिस्सा 'किंग्स बैटन' से जुड़ा होगा। किंग चार्ल्स ने मार्च 2025 में इस बैटन में अपना संदेश रखा था। उद्घाटन समारोह के दौरान वह संदेश पढ़ा जाएगा, जो इस आयोजन के ऐतिहासिक क्षणों में से एक होगा।

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