CPI महासचिव डी. राजा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शिक्षक दिवस संबोधन पर सवाल उठाए। उन्होंने सरकार के शिक्षा बजट में बदलाव का आंकड़ा सार्वजनिक करने की मांग की और आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने शिक्षकों व छात्रों की चिंताओं के बजाय राजनीतिक आलोचनाओं पर ध्यान केंद्रित किया।
नई दिल्ली: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के महासचिव डी. राजा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शिक्षक दिवस संबोधन को लेकर निशाना साधा है। राजा ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने शिक्षकों और छात्रों से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर बात करने के बजाय राजनीतिक आलोचनाओं पर ज्यादा जोर दिया। राजा ने प्रधानमंत्री से यह स्पष्ट करने की मांग की कि उनके कार्यकाल के दौरान केंद्र सरकार के शिक्षा बजट में कितने प्रतिशत की कमी या बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि सरकार को आलोचकों पर राजनीतिक हमले करने के बजाय शिक्षकों और छात्रों के सवालों का जवाब देना चाहिए। डी. राजा की यह प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री मोदी के दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) में शिक्षक दिवस के अवसर पर दिए गए संबोधन के एक दिन बाद आई।
मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ बयान पर भी विवाद
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षक दिवस के मौके पर SRCC के शताब्दी समारोह को संबोधित किया था। इस दौरान उन्होंने अपने पहले दिए गए ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान का फिर जिक्र किया और सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना करने वालों पर निशाना साधा।
मोदी ने कहा था कि जो लोग उनके इस बयान पर प्रतिक्रिया दे रहे थे, उन्होंने अपने व्यवहार से खुद को उजागर कर दिया।
प्रधानमंत्री ने भारत की आर्थिक स्थिति की तुलना 2013 से करते हुए कहा कि देश उस समय ‘Fragile Five’ अर्थव्यवस्थाओं में शामिल था, जबकि अब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में है।
उन्होंने भारत की मौजूदा 7.8 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि का भी उल्लेख किया और कहा कि कुछ आलोचक इस उपलब्धि को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।
डी. राजा बोले- आलोचकों को नाम देकर सवाल नहीं दबाए जा सकते
CPI महासचिव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर प्रधानमंत्री के संबोधन पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि शिक्षकों और छात्रों की वास्तविक चिंताओं को संबोधित करने के बजाय प्रधानमंत्री ने राजनीतिक हमले करने का रास्ता चुना।
राजा ने कहा कि यह तरीका लंबे समय तक काम नहीं करेगा। उनके मुताबिक, लोग सरकार के दावों को आसानी से स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि उनके अनुसार सरकार की कई बड़ी विफलताएं सामने आई हैं।
CPI नेता ने सरकार पर आर्थिक आंकड़ों को ‘हेरफेर और गलत तरीके से पेश करने’ तक का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार अब अपने दावों पर सवाल उठाने वालों को ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों से संबोधित कर रही है।
राजा ने कहा कि देश सरकार से सवाल करता रहेगा। उनके मुताबिक, असहमति को अपराध नहीं बनाया जा सकता और नाम रखने या राजनीतिक आरोप लगाने से सवालों को दबाया नहीं जा सकता।
शिक्षा बजट पर प्रधानमंत्री से सीधा सवाल
डी. राजा ने प्रधानमंत्री मोदी से एक सीधा सवाल पूछा कि उनके कार्यकाल के दौरान केंद्र सरकार का शिक्षा बजट कितने प्रतिशत घटा है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को आलोचकों पर हमला करने के बजाय भारत के शिक्षकों और छात्रों के सवालों का जवाब देना चाहिए।
राजा का यह सवाल केंद्र सरकार के शिक्षा पर खर्च और बजट प्राथमिकताओं को लेकर राजनीतिक बहस को फिर सामने लाता है। हालांकि, राजा ने अपने बयान में जिस प्रतिशत कमी का सवाल उठाया, उसका कोई आंकड़ा स्वयं पेश नहीं किया।
ऐसे में उनकी टिप्पणी का मुख्य केंद्र सरकार के शिक्षा बजट में बदलाव को लेकर प्रधानमंत्री से स्पष्ट जवाब की मांग है।
मोदी ने आर्थिक उपलब्धियों का किया जिक्र
SRCC के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की अर्थव्यवस्था और पिछले वर्षों में हुए बदलावों का उल्लेख किया था।
उन्होंने 2013 की आर्थिक स्थिति की तुलना मौजूदा स्थिति से करते हुए कहा कि भारत ने ‘Fragile Five’ से निकलकर दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बनाई है।
प्रधानमंत्री ने 7.8 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि का हवाला देते हुए सरकार की आर्थिक नीतियों की उपलब्धियां गिनाईं। उन्होंने उन लोगों पर भी टिप्पणी की जो सरकार की आर्थिक उपलब्धियों और विभिन्न योजनाओं की आलोचना करते हैं।
मोदी ने आलोचकों को ‘नाराज फूफा’ जैसे शब्दों से संबोधित करते हुए UPI, हाई-स्पीड ट्रेन और स्टैच्यू ऑफ यूनिटी जैसी परियोजनाओं का उदाहरण दिया।
राजनीतिक बयानबाजी को लेकर विपक्ष का विरोध
प्रधानमंत्री के शिक्षक दिवस संबोधन पर डी. राजा की प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है, जब केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों और शिक्षा क्षेत्र में बजट आवंटन को लेकर राजनीतिक बहस जारी है।
विपक्षी दल अक्सर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे क्षेत्रों में सरकारी खर्च को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। दूसरी ओर, केंद्र सरकार आर्थिक विकास, डिजिटल बुनियादी ढांचे और बड़े सार्वजनिक प्रोजेक्ट्स को अपनी उपलब्धियों के रूप में पेश करती रही है।
इस राजनीतिक मतभेद का एक प्रमुख पहलू यह है कि सरकार आर्थिक वृद्धि और विकास के आंकड़ों को अपनी नीतियों की सफलता का प्रमाण बताती है, जबकि विपक्ष इन आंकड़ों और उनके सामाजिक प्रभाव को लेकर सवाल उठाता है।
‘दिमागी नक्सल’ टिप्पणी बनी राजनीतिक मुद्दा
प्रधानमंत्री मोदी की ‘दिमागी नक्सल’ टिप्पणी भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुकी है। डी. राजा ने इसे सरकार की आलोचना करने वालों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया राजनीतिक लेबल बताया।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार से सवाल करना और नीतियों की आलोचना करना नागरिकों और राजनीतिक दलों का अधिकार है।
राजा के बयान का व्यापक संदेश यही था कि आर्थिक विकास के दावों के साथ-साथ सरकार को शिक्षा और अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों से जुड़े सवालों का भी जवाब देना चाहिए।
शिक्षा बजट पर अब सरकार के जवाब की नजर
डी. राजा की टिप्पणी के बाद बहस का केंद्र शिक्षा बजट में बदलाव और सरकार की शिक्षा संबंधी प्राथमिकताओं पर आ गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री से स्पष्ट आंकड़ों के साथ जवाब देने की मांग की है।
हालांकि, इस रिपोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से राजा के आरोपों पर तत्काल प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है। इसलिए शिक्षा बजट में कथित गिरावट के दावे पर अंतिम निष्कर्ष निकालने के लिए संबंधित बजट आंकड़ों और अलग-अलग वित्तीय वर्षों के आवंटन की तुलना आवश्यक होगी।
फिलहाल, शिक्षक दिवस के मंच से प्रधानमंत्री मोदी के आर्थिक और राजनीतिक बयानों पर डी. राजा की प्रतिक्रिया ने शिक्षा बजट, आर्थिक आंकड़ों और राजनीतिक असहमति को लेकर बहस को फिर तेज कर दिया है। यह विवाद आने वाले दिनों में सरकार की शिक्षा प्राथमिकताओं और विपक्ष के राजनीतिक सवालों के बीच टकराव को और बढ़ा सकता है।










