डायबिटीज के मरीजों में लगातार थकान को न करें नजरअंदाज, विशेषज्ञ की सलाह से ही बदलें दवा की खुराक: डॉ. खुशबू अग्रवाल

डायबिटीज के मरीजों में लगातार थकान ब्लड शुगर के उतार-चढ़ाव का संकेत हो सकती है। जानें जांच, दवा की खुराक और डॉक्टर की सलाह क्यों जरूरी है।
डायबिटीज के मरीजों में लगातार थकान को न करें नजरअंदाज, विशेषज्ञ की सलाह से ही बदलें दवा की खुराक: डॉ. खुशबू अग्रवाल
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डायबिटीज यानी मधुमेह से पीड़ित लोगों में लगातार थकान, कमजोरी और ऊर्जा की कमी को सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज करना नुकसानदेह हो सकता है। यदि पर्याप्त आराम करने के बाद भी शरीर में थकावट बनी रहती है, रोजमर्रा के काम करने में परेशानी होती है या पहले की तुलना में अधिक कमजोरी महसूस होती है, तो इसके कारणों की जांच कराना जरूरी है। डॉ. खुशबू अग्रवाल की सलाह के अनुसार, डायबिटीज के मरीजों को ऐसे लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए और अपनी दवाओं की खुराक में बदलाव केवल विशेषज्ञ की सलाह पर ही करना चाहिए।

डायबिटीज में शरीर में ब्लड शुगर का स्तर नियंत्रित रखना बेहद महत्वपूर्ण होता है। जब रक्त में ग्लूकोज का स्तर सामान्य सीमा से अधिक हो जाता है, तो शरीर उसे ऊर्जा के रूप में प्रभावी ढंग से इस्तेमाल नहीं कर पाता। इसके कारण कुछ मरीजों को थकान, सुस्ती, अधिक प्यास लगना और बार-बार पेशाब आने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। वहीं, ब्लड शुगर बहुत कम हो जाने पर भी कमजोरी, पसीना आना, कंपकंपी, चक्कर और बेचैनी जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। इसलिए केवल थकान के आधार पर यह मान लेना सही नहीं है कि शुगर बढ़ी हुई है या दवा की खुराक कम अथवा ज्यादा करने की जरूरत है।1

डायबिटीज के मरीजों में थकान के कई कारण हो सकते हैं। ब्लड शुगर का अनियंत्रित रहना, दवाओं के कारण शुगर कम हो जाना, शरीर में पानी की कमी, नींद पूरी नहीं होना और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं इसके पीछे हो सकती हैं। कुछ मरीजों में खून की कमी, थायरॉइड से जुड़ी परेशानी या किडनी संबंधी समस्या भी कमजोरी का कारण बन सकती है। इसलिए यदि थकान लंबे समय तक बनी रहती है या रोजमर्रा की गतिविधियां प्रभावित होने लगती हैं, तो डॉक्टर से परामर्श लेकर आवश्यक जांच कराना उचित है।

डायबिटीज का इलाज प्रत्येक मरीज की जरूरत के अनुसार तय किया जाता है। मरीज की उम्र, ब्लड शुगर का स्तर, बीमारी की अवधि, दूसरी बीमारियां, खानपान और पहले से चल रही दवाओं को ध्यान में रखकर उपचार की योजना बनाई जाती है। किसी मरीज को एक दवा से लाभ मिल सकता है, जबकि दूसरे को अलग दवा या उपचार के संयोजन की जरूरत पड़ सकती है। इसी वजह से किसी दूसरे मरीज को देखकर अपनी दवा या उसकी खुराक बदलना जोखिम भरा हो सकता है।

डायबिटीज की दवाओं की खुराक अपने मन से घटाने या बढ़ाने से ब्लड शुगर का स्तर असंतुलित हो सकता है। विशेष रूप से इंसुलिन और कुछ ऐसी दवाएं, जो रक्त में शुगर को कम करती हैं, हाइपोग्लाइसीमिया यानी ब्लड शुगर बहुत कम होने का खतरा पैदा कर सकती हैं। दूसरी ओर, दवा छोड़ देने या निर्धारित मात्रा से कम लेने पर शुगर बढ़ सकती है। इसलिए डॉक्टर की सलाह के बिना दवा बंद करना, उसकी मात्रा बदलना या किसी अन्

थकान महसूस होने पर मरीजों को अपने ब्लड शुगर की जांच करनी चाहिए और डॉक्टर को लक्षणों के बारे में स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए। यह भी बताना उपयोगी होता है कि थकान कब शुरू होती है, भोजन करने के बाद या दवा लेने के बाद बढ़ती है या नहीं, और इसके साथ पसीना, चक्कर, अधिक प्यास अथवा बार-बार पेशाब आने जैसे लक्षण हैं या नहीं। डॉक्टर जरूरत के अनुसार फास्टिंग ब्लड शुगर, भोजन के बाद की शुगर, एचबीए1सी या दूसरी जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। इन जांचों से उपचार की प्रभावशीलता समझने और आगे की योजना तय करने में मदद मिलती है।

डायबिटीज को नियंत्रित रखने में दवाओं के साथ जीवनशैली की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। मरीजों को नियमित समय पर संतुलित भोजन करना चाहिए, पर्याप्त पानी पीना चाहिए और अपनी शारीरिक क्षमता तथा डॉक्टर की सलाह के अनुसार गतिविधियां जारी रखनी चाहिए। पर्याप्त नींद लेना और नियमित रूप से ब्लड शुगर की निगरानी करना भी उपयोगी है। हालांकि, यदि शुगर बहुत कम हो रही हो, बहुत अधिक बढ़ी हुई हो या मरीज की तबीयत खराब हो, तो व्यायाम अथवा घरेलू उपायों के सहारे स्थिति संभालने की कोशिश करने के बजाय चिकित्सा सलाह लेनी चाहिए।

यदि थकान के साथ भ्रम की स्थिति, बेहोशी, सांस लेने में परेशानी, लगातार उल्टी या अत्यधिक कमजोरी जैसे गंभीर लक्षण दिखाई दें, तो तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। ब्लड शुगर बहुत कम होने की आशंका में भी तुरंत उचित कदम उठाना जरूरी है। ऐसे लक्षणों को केवल डायबिटीज की सामान्य परेशानी मानकर टालना ठीक नहीं है।

डायबिटीज के मरीजों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि शरीर में होने वाले बदलावों पर ध्यान दें और लगातार थकान को बिना जांच के सामान्य न मानें। सही समय पर ब्लड शुगर की जांच, नियमित चिकित्सकीय परामर्श और दवाओं का निर्धारित तरीके से सेवन बीमारी को नियंत्रित रखने में मदद कर सकता है। दवा की खुराक में बदलाव का फैसला मरीज की स्थिति और जांच के परिणामों को देखकर विशेषज्ञ को ही करना चाहिए।

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