तबादला डाड़ी में, दस्तखत चौपारण में! हजारीबाग में पूर्व सचिव की ID से बने 92 जन्म प्रमाण पत्र, फर्जीवाड़े की आशंका

हजारीबाग के चौपारण में पूर्व पंचायत सचिव की ID से 92 जन्म प्रमाण पत्र जारी हुए। सभी प्रमाण पत्र निरस्त कर प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की गई है।
तबादला डाड़ी में, दस्तखत चौपारण में! हजारीबाग में पूर्व सचिव की ID से बने 92 जन्म प्रमाण पत्र, फर्जीवाड़े की आशंका
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झारखंड के हजारीबाग जिले के चौपारण प्रखंड से जन्म प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया में कथित अनियमितता का गंभीर मामला सामने आया है। सिंघरावां पंचायत में पंचायत सचिव के तबादले और नए सचिव के प्रभार संभालने के बाद भी पूर्व पंचायत सचिव की लॉगिन आईडी का इस्तेमाल कर एक ही दिन में 92 जन्म प्रमाण पत्र जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है। मामला सामने आने के बाद प्रखंड प्रशासन ने सभी 92 प्रमाण पत्रों को निरस्त कर दिया है और पूरे प्रकरण की जांच शुरू कर दी गई है। प्रशासन की ओर से थाने में प्राथमिकी भी दर्ज कराई गई है।

मामले की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि जिस पंचायत सचिव की लॉगिन आईडी से प्रमाण पत्र जारी किए गए, उनका तबादला पहले ही सिंघरावां पंचायत से डाड़ी प्रखंड में हो चुका था। इसके बाद सिंघरावां पंचायत में नए पंचायत सचिव के रूप में केदार साव ने 22 अगस्त को प्रभार संभाल लिया था। इसके बावजूद पूर्व सचिव अनुरागिनी प्रिया की लॉगिन आईडी से जन्म प्रमाण पत्र जारी होने की जानकारी प्रशासन के सामने आई। अब जांच का मुख्य बिंदु यही है कि तबादले के बाद भी पूर्व सचिव की आईडी सक्रिय कैसे रही और उसका इस्तेमाल किस स्तर पर किया गया।

प्रखंड प्रशासन के मुताबिक, 22 अगस्त के बाद सिंघरावां पंचायत में जन्म-मृत्यु निबंधन के लिए नए पंचायत सचिव की लॉगिन आईडी तैयार करने की प्रक्रिया चल रही थी। इसी अवधि में पूर्व पंचायत सचिव की आईडी से 92 जन्म प्रमाण पत्र जारी हो गए। जिला सांख्यिकी कार्यालय से प्रमाण पत्रों से जुड़ी जानकारी मिलने के बाद प्रखंड प्रशासन को इस मामले की जानकारी हुई और इसके बाद रिकॉर्ड की जांच शुरू की गई।

प्रशासन की प्रारंभिक जांच में डिजिटल सिग्नेचर और ओटीपी के इस्तेमाल का मामला भी सामने आया है। आरोप है कि पूर्व पंचायत सचिव से डिजिटल सिग्नेचर और ओटीपी प्राप्त कर जन्म प्रमाण पत्र जारी किए गए। हालांकि यह अभी जांच का विषय है कि वास्तव में इन प्रमाण पत्रों को किसने जारी किया, पूर्व सचिव की आईडी तक किसकी पहुंच थी और प्रमाण पत्र बनाने के दौरान निर्धारित प्रक्रिया का कितना पालन किया गया। पुलिस और विभागीय जांच पूरी होने के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।

इस मामले में प्रखंड प्रशासन की ओर से चौपारण थाना प्रभारी को आवेदन देकर प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। सहायक निर्वाचक निबंधन पदाधिकारी सह बीडीओ चौपारण नितेश भास्कर के आवेदन के आधार पर कांड संख्या 258/26 दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है। बीडीओ ने मामले को गंभीर बताते हुए जांच कराने और जांच में दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की बात कही है।

प्रारंभिक स्तर पर सिंघरावां पंचायत के प्रज्ञा केंद्र संचालक सह वीएलई नौशाद असगर की भूमिका भी संदिग्ध बताई गई है। हालांकि किसी व्यक्ति की भूमिका को लेकर अंतिम निष्कर्ष पुलिस और विभागीय जांच के बाद ही निकाला जा सकेगा। फिलहाल प्रशासन यह पता लगाने में जुटा है कि 92 प्रमाण पत्रों के आवेदन किस तरह आए, उनके साथ कौन-कौन से दस्तावेज लगाए गए, किसने उनकी जांच की और किस प्रक्रिया के तहत उन्हें स्वीकृति मिली।

जन्म प्रमाण पत्र सामान्य नागरिक के लिए बेहद महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेज होता है। इसका इस्तेमाल उम्र और पहचान से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्यों में किया जाता है। स्कूल में दाखिले से लेकर विभिन्न सरकारी योजनाओं, पहचान से जुड़े दस्तावेजों और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में जन्म प्रमाण पत्र की आवश्यकता पड़ सकती है। ऐसे में यदि किसी प्रमाण पत्र को निर्धारित प्रक्रिया से अलग तरीके से जारी किया जाता है तो उसकी प्रामाणिकता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

हजारीबाग प्रशासन अब यह भी जांच कर रहा है कि 92 जन्म प्रमाण पत्रों में दर्ज नाम किन लोगों के हैं और क्या उनके जन्म से जुड़े वास्तविक रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। इसके साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि प्रमाण पत्रों के लिए आवेदन करने वालों ने कौन-कौन से दस्तावेज जमा किए थे। यदि दस्तावेजों में कोई गड़बड़ी सामने आती है या यह पता चलता है कि बिना वैध आवेदन और आवश्यक जांच के प्रमाण पत्र जारी किए गए, तो मामले की गंभीरता और बढ़ सकती है।

प्रशासन की जांच में अस्पताल से जुड़े रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सामुदायिक अस्पताल, चौपारण से निर्गत जन्म संबंधी दस्तावेजों की भी जांच की आवश्यकता बताई गई है। जांच एजेंसियां यह मिलान कर सकती हैं कि जिन जन्म प्रमाण पत्रों को जारी किया गया, उनमें दर्ज जन्म की तारीख, स्थान और अन्य विवरण संबंधित मूल रिकॉर्ड से मेल खाते हैं या नहीं। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि प्रमाण पत्र जारी करने के पीछे वास्तविक दस्तावेज मौजूद थे या नहीं।

मामला ऐसे समय सामने आया है जब निर्वाचन आयोग के निर्देश पर विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया भी चल रही है। यही वजह है कि जन्म प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेजों को लेकर सामने आई यह गड़बड़ी प्रशासन के लिए और संवेदनशील हो गई है। जन्म प्रमाण पत्र किसी व्यक्ति की उम्र और जन्म से जुड़े रिकॉर्ड को प्रमाणित करने वाला दस्तावेज है, इसलिए इसकी प्रामाणिकता पर सवाल उठने की स्थिति में प्रशासन को रिकॉर्ड की बारीकी से जांच करनी पड़ती है।

एसआईआर के दौरान नागरिकों से विभिन्न दस्तावेजों के माध्यम से अपनी पहचान और पात्रता से जुड़े रिकॉर्ड उपलब्ध कराने की प्रक्रिया चल रही है। ऐसे में प्रशासन इस बात की भी पड़ताल कर सकता है कि इन 92 प्रमाण पत्रों का कहीं किसी अन्य सरकारी प्रक्रिया में इस्तेमाल तो नहीं हुआ। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन प्रमाण पत्रों का किसी चुनावी प्रक्रिया में इस्तेमाल किया गया है। प्रशासन की जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह पता लगाना भी हो सकता है कि प्रमाण पत्र जारी होने के बाद उनका उपयोग कहां और किस उद्देश्य से किया गया।

मामले में सबसे बड़ा सवाल पूर्व पंचायत सचिव की लॉगिन आईडी को लेकर है। किसी अधिकारी या कर्मचारी के तबादले के बाद उसके पुराने लॉगिन की स्थिति क्या थी, उसे निष्क्रिय किया गया था या नहीं और उसके डिजिटल सिग्नेचर तथा ओटीपी की सुरक्षा किस तरह हुई, इन सभी पहलुओं की जांच की जा सकती है। डिजिटल व्यवस्था में लॉगिन आईडी और डिजिटल सिग्नेचर किसी अधिकारी की आधिकारिक पहचान से जुड़े होते हैं। इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा इनका इस्तेमाल किए जाने की स्थिति में जिम्मेदारी तय करना जरूरी हो जाता है।

प्रशासन अब यह भी देख सकता है कि 92 प्रमाण पत्र एक ही दिन में किस समय जारी किए गए और उन्हें जारी करने के लिए सिस्टम में किस-किस स्तर पर लॉगिन किया गया था। डिजिटल रिकॉर्ड में उपलब्ध समय, लॉगिन डिटेल, ओटीपी से जुड़ी जानकारी और प्रमाण पत्रों की प्रक्रिया की जांच से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि सिस्टम का इस्तेमाल किस तरीके से किया गया। अगर जांच में किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर पूर्व सचिव की आईडी का इस्तेमाल करने की बात सामने आती है तो उसके खिलाफ कानूनी और विभागीय कार्रवाई हो सकती है।

इस मामले ने पंचायत स्तर पर डिजिटल तरीके से होने वाले जन्म-मृत्यु निबंधन की निगरानी को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। ऑनलाइन प्रक्रिया का उद्देश्य प्रमाण पत्र जारी करने की व्यवस्था को आसान, पारदर्शी और रिकॉर्ड आधारित बनाना है। लेकिन किसी लॉगिन आईडी का अनधिकृत इस्तेमाल होने की आशंका सामने आने पर डिजिटल सुरक्षा और लॉगिन प्रबंधन की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

हजारीबाग जिले की आधिकारिक वेबसाइट पर जन्म प्रमाण पत्र को नागरिक सेवाओं में शामिल किया गया है और जिले में प्रमाण पत्र संबंधी सेवाओं की ऑनलाइन व्यवस्था भी उपलब्ध है। ऐसे सरकारी दस्तावेजों को जारी करने की प्रक्रिया में अधिकृत अधिकारियों और संबंधित पंजीकरण इकाइयों की भूमिका होती है।

सिंघरावां पंचायत का यह मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने संबंधित 92 प्रमाण पत्रों को निरस्त कर दिया है। इसका अर्थ है कि जांच पूरी होने तक इन दस्तावेजों को वैध सरकारी प्रमाण पत्र के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा। जिन लोगों के नाम इन प्रमाण पत्रों में दर्ज हैं, उनके रिकॉर्ड की भी जांच की जा सकती है। यदि किसी व्यक्ति ने सही दस्तावेजों के आधार पर आवेदन किया था लेकिन प्रक्रिया में किसी अन्य स्तर पर अनियमितता हुई, तो उसकी स्थिति अलग हो सकती है। इसलिए प्रत्येक प्रमाण पत्र की अलग-अलग जांच महत्वपूर्ण होगी।

दूसरी ओर, यदि जांच में यह साबित होता है कि किसी प्रमाण पत्र के लिए आवश्यक दस्तावेज मौजूद नहीं थे और जानबूझकर गलत प्रक्रिया अपनाई गई, तो संबंधित लोगों की भूमिका तय की जाएगी। पुलिस प्राथमिकी के आधार पर मामले की जांच करेगी और उपलब्ध डिजिटल तथा दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगी।

पूर्व पंचायत सचिव अनुरागिनी प्रिया का तबादला चौपारण से डाड़ी प्रखंड में होने और उसके बाद उनकी पुरानी लॉगिन आईडी से प्रमाण पत्र जारी होने का तथ्य इस मामले का सबसे अहम पहलू बना हुआ है। वहीं, नए पंचायत सचिव केदार साव के प्रभार संभालने के बाद भी नई लॉगिन आईडी तैयार होने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी। अब जांच में यह स्पष्ट करना जरूरी होगा कि इस तकनीकी और प्रशासनिक संक्रमण के दौरान सिस्टम में किस स्तर पर चूक हुई।

फिलहाल प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए सभी 92 प्रमाण पत्र निरस्त कर दिए हैं और प्राथमिकी दर्ज कराई है। जांच के बाद यह स्पष्ट होगा कि इन प्रमाण पत्रों में से कितने नियमों के तहत जारी किए जा सकते थे, कितने में दस्तावेज सही थे और कितने मामलों में कथित तौर पर प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ। साथ ही यह भी सामने आएगा कि पूर्व सचिव की आईडी का इस्तेमाल किसने किया और इसमें प्रज्ञा केंद्र संचालक समेत अन्य किसी व्यक्ति की भूमिका थी या नहीं।

यह मामला सरकारी डिजिटल व्यवस्था में लॉगिन और डिजिटल सिग्नेचर की सुरक्षा की अहमियत को भी सामने लाता है। अधिकारियों के तबादले के बाद पुराने लॉगिन को समय पर निष्क्रिय करना, नए अधिकारी को नई आईडी उपलब्ध कराना और डिजिटल प्रमाण पत्र जारी करने की गतिविधियों की नियमित निगरानी करना जरूरी है। यदि जांच में किसी तरह की लापरवाही सामने आती है तो प्रशासन उस स्तर पर भी सुधारात्मक कार्रवाई कर सकता है।

अब सबकी नजर पुलिस और विभागीय जांच पर है। प्राथमिकी दर्ज होने के बाद जांच एजेंसियां 92 प्रमाण पत्रों के रिकॉर्ड, आवेदन पत्र, संलग्न दस्तावेज, लॉगिन विवरण, डिजिटल सिग्नेचर और ओटीपी से जुड़ी जानकारी की पड़ताल कर सकती हैं। जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही यह साफ होगा कि यह मामला केवल तकनीकी और प्रशासनिक चूक था या इसके पीछे सुनियोजित तरीके से प्रमाण पत्र जारी करने की कोशिश की गई थी। फिलहाल प्रशासन ने प्रमाण पत्रों को निरस्त कर दिया है और दोषियों की पहचान के लिए जांच आगे बढ़ रही है।

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