चंडीगढ़ में हाई कोर्ट ने मेडिकल नेग्लिजेंस मामलों पर अहम फैसला देते हुए कहा कि डॉक्टरों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई से पहले स्वतंत्र चिकित्सा विशेषज्ञ की राय जरूरी है। अदालत ने बिना पर्याप्त चिकित्सकीय साक्ष्यों के जारी समन आदेश को रद्द कर दिया।
चंडीगढ़: मेडिकल नेग्लिजेंस से जुड़े मामलों में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल मरीज की मृत्यु या इलाज के असफल होने के आधार पर किसी डॉक्टर को आपराधिक मुकदमे का सामना नहीं कराया जा सकता। अदालत ने कहा कि डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई से पहले स्वतंत्र और सक्षम चिकित्सा विशेषज्ञ की राय लेना आवश्यक है, ताकि तथ्यों और चिकित्सा साक्ष्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन हो सके।
विशेषज्ञ राय के बिना कार्रवाई पर हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
मेडिकल नेग्लिजेंस के मामलों में डॉक्टरों की आपराधिक जिम्मेदारी को लेकर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि किसी डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक मुकदमा शुरू करने से पहले स्वतंत्र और योग्य चिकित्सा विशेषज्ञ की राय लेना आवश्यक है। यदि विशेषज्ञ की राय के बिना डॉक्टरों को तलब किया जाता है, तो ऐसा आदेश कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता।
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न्यायमूर्ति मनीषा बत्रा की पीठ ने यह टिप्पणी एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें निचली अदालत ने डॉक्टरों को लापरवाही से मृत्यु सहित विभिन्न धाराओं के तहत समन जारी किया था। हाई कोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने उपलब्ध चिकित्सा साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया और विशेषज्ञ रिपोर्ट की प्रतीक्षा किए बिना डॉक्टरों को अदालत में पेश होने का आदेश दे दिया।
प्रसव के बाद महिला की मौत से जुड़ा मामला
यह मामला पंजाब के तरनतारन जिले से संबंधित है। शिकायतकर्ता के अनुसार उसकी पत्नी को प्रसव पीड़ा होने पर एक निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था। शुरुआत में सामान्य प्रसव का आश्वासन दिया गया, लेकिन बाद में ऑपरेशन के जरिए जुड़वां बच्चियों का जन्म हुआ।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि प्रसव के बाद महिला की तबीयत बिगड़ गई और अत्यधिक रक्तस्राव होने लगा। इसके बाद उसे दूसरे अस्पताल रेफर किया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। महिला के पति ने डॉक्टरों पर चिकित्सकीय लापरवाही का आरोप लगाते हुए आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी।
प्रारंभिक साक्ष्यों के आधार पर न्यायिक मजिस्ट्रेट ने डॉक्टरों को भारतीय दंड संहिता की धारा 304-ए और अन्य प्रासंगिक धाराओं के तहत तलब कर लिया था। इस आदेश को डॉक्टरों ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।
जांच रिपोर्ट में नहीं मिली लापरवाही
सुनवाई के दौरान डॉक्टरों की ओर से अदालत को बताया गया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस चिकित्सकीय साक्ष्य मौजूद नहीं है, जिससे उनकी आपराधिक लापरवाही साबित होती हो। साथ ही एक विशेषज्ञ जांच टीम ने भी अपनी रिपोर्ट में डॉक्टरों को दोषमुक्त बताया था।
अदालत ने कहा कि केवल इस तथ्य से कि मरीज की मृत्यु हो गई या उपचार सफल नहीं रहा, डॉक्टर को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। चिकित्सा क्षेत्र में कई बार जटिल परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं, जिनके कारण प्रतिकूल परिणाम सामने आ सकते हैं।
प्रतिष्ठा और करियर पर पड़ता है असर
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि किसी डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया शुरू होते ही उसे गिरफ्तारी की आशंका, जमानत की प्रक्रिया और पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान जैसी गंभीर परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यदि बाद में वह निर्दोष साबित भी हो जाए, तब भी उसकी छवि को पहुंचे नुकसान की भरपाई करना आसान नहीं होता।
इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने निचली अदालत द्वारा जारी समन आदेश को रद्द कर दिया और स्पष्ट किया कि मेडिकल नेग्लिजेंस के मामलों में विशेषज्ञ चिकित्सकीय राय और ठोस साक्ष्य के आधार पर ही आपराधिक कार्रवाई की जानी चाहिए।








