हिंसा के बीच मणिपुर में सड़कों पर उतरीं मेइरा पाईबी महिलाएं, कानून-व्यवस्था की बहाली की मांग तेज

मणिपुर में मेइरा पाईबी महिलाओं ने सड़कों पर उतरकर दिन में धरना और रात में मशाल रैलियां शुरू कर दी। बढ़ती हिंसा और बंद के बीच कानून-व्यवस्था की मांग तेज।

मणिपुर में लगातार हिंसा और बंद के बीच मेइरा पाईबी महिलाओं का आंदोलन तेज हो गया है, जहां वे दिन में धरना और रास्ते रोक रही हैं, जबकि रात में मशाल रैलियों से कानून-व्यवस्था और शांति की मांग कर रही हैं।

इम्फाल: पूर्वोत्तर भारत के राज्य मणिपुर में जारी तनाव और अशांति के बीच महिलाओं का पारंपरिक संगठन मेइरा पाईबी एक बार फिर सुर्खियों में है। बीते दिनों हुए रॉकेट हमले और उसके बाद भड़की हिंसा ने राज्य में हालात और गंभीर कर दिए हैं। इसके बाद 18 अप्रैल से लगाए गए पूर्ण बंद के चलते सामान्य जनजीवन पूरी तरह प्रभावित है।

इसी माहौल में हजारों महिलाओं का यह समूह न केवल विरोध प्रदर्शन कर रहा है, बल्कि कई क्षेत्रों में खुद ही शांति और व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी भी निभा रहा है।

दिन में सड़क जाम और धरना, रात में मशाल रैलियां

मेइरा पाईबी से जुड़ी महिलाएं दिन के समय प्रमुख सड़कों पर धरना देकर यातायात को रोक रही हैं। कई इलाकों में स्थिति ऐसी है कि बिना अनुमति किसी भी व्यक्ति या वाहन को गुजरने नहीं दिया जा रहा है। वहीं, रात के समय ये महिलाएं मशाल रैलियां निकालकर अपने-अपने क्षेत्रों में निगरानी कर रही हैं।

इन गतिविधियों का उद्देश्य केवल विरोध नहीं बल्कि समुदाय में सुरक्षा और एकजुटता बनाए रखना बताया जा रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, महिलाओं की सक्रियता ने कई जगहों पर अराजकता को बढ़ने से रोका है।

महिलाओं की दोहरी जिम्मेदारी: घर और आंदोलन

आंदोलन में शामिल एक महिला प्रदर्शनकारी ने बताया कि उनके लिए यह समय बेहद चुनौतीपूर्ण है। उन्हें एक साथ घर की जिम्मेदारी, रोजी-रोटी और आंदोलन—तीनों को संतुलित करना पड़ रहा है। इसके बावजूद उनका कहना है कि यह उनके लिए एक नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है।

इंफाल के ख्वैरामबंद इमा मार्केट जैसी जगहों पर कुछ महिला विक्रेताओं को मजबूरी में दुकानें खोलनी पड़ी हैं, लेकिन वे स्पष्ट कर रही हैं कि वे आंदोलन के खिलाफ नहीं हैं और जल्द ही इसमें फिर से सक्रिय रूप से शामिल होंगी।

बड़ा आंदोलन और संगठनों की रणनीति

नागरिक संगठन ‘कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी’ ने 25 अप्रैल को राज्यव्यापी बड़े आंदोलन की घोषणा की है। इससे पहले से ही मेइरा पाईबी की सक्रियता ने आंदोलन को और व्यापक आधार दे दिया है।

यह संगठन लंबे समय से मणिपुर के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाता रहा है और मौजूदा परिस्थितियों में इसे निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।

हिंसा के बीच मणिपुर में सड़कों पर उतरीं मेइरा पाईबी महिलाएं, कानून-व्यवस्था की बहाली की मांग तेज

मेइरा पाईबी आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व

मेइरा पाईबी आंदोलन की शुरुआत लगभग 1980 के दशक में हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य समाज में बढ़ती शराबखोरी और नशे की समस्या को रोकना था। समय के साथ यह आंदोलन सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और सुरक्षा जैसे बड़े मुद्दों से जुड़ गया।

इस आंदोलन ने कई बार राज्य में लागू अफस्पा (AFSPA) के खिलाफ भी मजबूत आवाज उठाई है। मशाल रैलियों और सामूहिक निगरानी इसकी पहचान बन चुकी है।

इस आंदोलन की सबसे चर्चित शख्सियतों में इरोम शर्मिला का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, जिन्होंने लंबे समय तक भूख हड़ताल कर मणिपुर के हालात और मानवाधिकार मुद्दों को वैश्विक मंच तक पहुंचाया।

हालिया हिंसा और सुरक्षा स्थिति

हाल ही में मणिपुर के बिष्णुपुर जिले में हुए एक हमले में कई बच्चों की मौत ने हालात को और तनावपूर्ण बना दिया। इसके बाद कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन और हिंसक झड़पें भी हुईं। सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव में भी जानमाल का नुकसान हुआ।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए राज्य के कई जिलों में इंटरनेट और मोबाइल डेटा सेवाएं अस्थायी रूप से बंद करनी पड़ीं।

राजनीतिक बदलाव और मौजूदा स्थिति

मई 2023 से शुरू हुई जातीय हिंसा ने मणिपुर को लंबे समय तक प्रभावित किया। मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच हुई इस हिंसा ने हजारों लोगों को विस्थापित कर दिया।

लगातार राजनीतिक दबाव के बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने 2025 में इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया गया। बाद में नई सरकार का गठन किया गया, लेकिन हालात अब भी पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाए हैं।

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