महंगाई की मार झेल रहे आम लोगों की मुश्किलें अक्टूबर में और बढ़ सकती हैं। खाने-पीने की चीजों से लेकर ईंधन और रोजमर्रा के सामान की कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
Inflation Rate in India: देश में महंगाई को लेकर आम लोगों की चिंता बढ़ सकती है। खाने-पीने की वस्तुओं, ईंधन और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले सामान की कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है। रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) के अनुमान के मुताबिक, अक्टूबर 2026 में भारत की थोक महंगाई दर 12 प्रतिशत से ऊपर और खुदरा महंगाई दर 6 प्रतिशत के पार जा सकती है। हालांकि, ये अनुमान हैं और वास्तविक आंकड़े आधिकारिक महंगाई रिपोर्ट जारी होने के बाद ही स्पष्ट होंगे।
एजेंसी ने महंगाई बढ़ने के पीछे प्रतिकूल बेस इफेक्ट, मौसम में बदलाव और ऊर्जा की कीमतों में तेजी जैसे कारकों को प्रमुख बताया है। यदि महंगाई में अनुमान के मुताबिक बढ़ोतरी होती है, तो इसका असर घरेलू बजट के साथ कारोबार और मौद्रिक नीति पर भी पड़ सकता है।
थोक महंगाई में तेजी, सितंबर में दर 11.39% पर पहुंची
थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित महंगाई दर में हाल के महीनों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2026 में थोक महंगाई बढ़कर 11.39 प्रतिशत हो गई, जबकि अगस्त में यह 9.92 प्रतिशत थी। यानी एक महीने के भीतर इसमें उल्लेखनीय वृद्धि हुई। Ind-Ra का अनुमान है कि प्रतिकूल बेस इफेक्ट के कारण थोक महंगाई पर आने वाले महीनों में भी दबाव बना रह सकता है। एजेंसी के आकलन के अनुसार, फरवरी 2027 तक यह ऊंचे स्तर पर रह सकती है और दोहरे अंकों में बनी रहने की आशंका है।
थोक महंगाई में वृद्धि का असर उत्पादन और कारोबार की लागत पर पड़ सकता है। जब कंपनियों के लिए कच्चा माल, ऊर्जा और अन्य जरूरी इनपुट महंगे होते हैं, तो वे इसका कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाल सकती हैं। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव उत्पाद, क्षेत्र और कंपनियों की मूल्य निर्धारण क्षमता पर निर्भर करता है।
खुदरा महंगाई भी 6% के पार जाने की आशंका
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आम परिवारों के लिए खुदरा महंगाई का आंकड़ा अधिक महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह उपभोक्ताओं द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में बदलाव को दर्शाता है। सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत दर्ज की गई थी, जबकि अगस्त में यह 4.83 प्रतिशत थी। रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर की दर 23 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई।
Ind-Ra के मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र कुमार पंत के अनुमान के अनुसार, अक्टूबर में खुदरा महंगाई 6 प्रतिशत से ऊपर जा सकती है। यदि ऐसा होता है, तो खाद्य पदार्थों, घरेलू जरूरतों और अन्य खर्चों पर निर्भर परिवारों के बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। हालांकि, महंगाई का असर सभी परिवारों पर एक जैसा नहीं होता। कम आय वाले परिवार अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा भोजन और जरूरी वस्तुओं पर खर्च करते हैं, इसलिए कीमतों में तेजी उनके लिए अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
कच्चे तेल और कमजोर रुपये की भूमिका
ऊर्जा की कीमतें महंगाई के रुझान को प्रभावित करने वाला एक अहम कारक हैं। कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ने से परिवहन, उत्पादन और माल ढुलाई की लागत में इजाफा हो सकता है। इसका असर धीरे-धीरे अन्य वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है। कमजोर भारतीय रुपया भी आयात को महंगा बना सकता है। भारत कई जरूरी ऊर्जा उत्पादों और औद्योगिक कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने और रुपये के कमजोर होने से घरेलू लागत पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
देवेंद्र कुमार पंत के आकलन के मुताबिक, थोक और खुदरा दोनों स्तरों पर महंगाई का दबाव व्यापक हो रहा है। हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी तनाव कम होने और ऊर्जा बाजार में स्थिरता लौटने पर महंगाई का स्तर अनुमान से कम भी रह सकता है।
RBI की ब्याज दरों पर रहेगी नजर
महंगाई बढ़ने की आशंका के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति पर भी नजर रहेगी। ब्याज दरों में बदलाव का फैसला महंगाई के रुझान, आर्थिक विकास और अन्य घरेलू एवं वैश्विक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाता है। रिपोर्ट में नीतिगत ब्याज दरों में 50 से 75 बेसिस पॉइंट तक संभावित बढ़ोतरी का उल्लेख किया गया है। हालांकि, इसे RBI का आधिकारिक फैसला या घोषित योजना नहीं माना जाना चाहिए। रेपो रेट में किसी भी बदलाव की पुष्टि केंद्रीय बैंक की आधिकारिक घोषणा से ही होगी।







