भारत ने संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत जीना रोमेरो के उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है, जिनमें कहा गया था कि देश में मानसिक स्वास्थ्य और लैंगिक न्याय जैसे मुद्दों पर आवाज उठाने वाले युवाओं को बदले की कार्रवाई और सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है।
नई दिल्ली: भारत ने संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिवेदक जीना रोमेरो की उस रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें भारतीय युवाओं को मानसिक स्वास्थ्य और लैंगिक न्याय जैसे मुद्दों पर आवाज उठाने के कारण कथित रूप से प्रतिशोध या सामाजिक कलंक का सामना करने की बात कही गई है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रथम सचिव अनुज स्वरूप ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि रिपोर्ट में प्रस्तुत आरोप पर्याप्त रूप से सत्यापित साक्ष्यों पर आधारित नहीं हैं।
यह मामला संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में शांतिपूर्ण सभा और संगठन की स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर हुई चर्चा के दौरान सामने आया। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों, स्वतंत्र न्यायपालिका और प्रेस की भूमिका का उल्लेख करते हुए रिपोर्ट की पद्धति पर सवाल उठाए। भारत का कहना है कि देश में युवाओं की भागीदारी और सार्वजनिक मुद्दों पर उनकी सक्रियता को देखते हुए रिपोर्ट में अधिक व्यापक और निष्पक्ष आकलन किया जाना चाहिए था।
अनुज स्वरूप ने भारतीय संविधान का दिया हवाला
भारतीय राजनयिक अनुज स्वरूप ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने तथा संगठन बनाने के अधिकार प्रदान करता है। उनके अनुसार, स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र प्रेस और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाएं इन अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
स्वरूप ने रोमेरो की रिपोर्ट में युवाओं के अनुभवों से जुड़े दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि कथित घटनाओं के समर्थन में गुमनाम स्रोतों का उल्लेख किया गया है, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि स्पष्ट नहीं है। भारत ने इसी आधार पर रिपोर्ट के निष्कर्षों को अपर्याप्त बताया और संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदकों से अधिक कठोर तथ्य-जांच की अपेक्षा जताई।
संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर भारत की टिप्पणी
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भारतीय प्रतिनिधि ने रिपोर्ट की आलोचना करते हुए कहा कि अपुष्ट जानकारियों के आधार पर व्यापक निष्कर्ष निकालने से अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत में युवाओं की स्थिति के बारे में रिपोर्ट में पेश किया गया आकलन पर्याप्त प्रमाणों से समर्थित नहीं है।
हालांकि, इस विवाद में भारत की आपत्ति और विशेष प्रतिवेदक की रिपोर्ट के निष्कर्षों को अलग-अलग समझना जरूरी है। भारत ने आरोपों को खारिज किया है, जबकि रिपोर्ट में युवाओं की अभिव्यक्ति और नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े कथित अनुभवों पर चिंता जताई गई है। इन दावों का स्वतंत्र मूल्यांकन करने के लिए संबंधित घटनाओं, उपलब्ध साक्ष्यों और रिपोर्ट की कार्यप्रणाली की जांच महत्वपूर्ण होगी।
युवाओं के राजनीतिक आंदोलनों का किया उल्लेख
स्वरूप ने भारत में युवाओं की राजनीतिक भागीदारी को अपने पक्ष में रखते हुए विभिन्न आंदोलनों और सरकार के साथ युवाओं की बातचीत का उल्लेख किया। उन्होंने एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक आंदोलन का उदाहरण देते हुए कहा कि युवाओं ने सार्वजनिक मुद्दों पर सवाल उठाए, विरोध-प्रदर्शन किए और वरिष्ठ नेताओं से संवाद भी किया।
भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने परीक्षा संबंधी अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों के विरोध-प्रदर्शनों का भी जिक्र किया। स्वरूप के अनुसार, सरकार ने छात्रों की शिकायतों पर संवाद किया और परीक्षाओं में गड़बड़ी रोकने के लिए कदम उठाए। उन्होंने विकसित भारत युवा नेतृत्व संवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि बड़ी संख्या में युवा राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जुड़कर अपनी भागीदारी निभा रहे हैं।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क के उस कथित बयान का भी हवाला दिया, जिसमें युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों के संदर्भ में संवाद को प्रभावी तरीका बताया गया था। भारतीय पक्ष का तर्क है कि ऐसे उदाहरणों को रिपोर्ट के आकलन में पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए।









