नासा ने घोषणा की है कि 2030 तक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) को प्रशांत महासागर के पॉइंट नीमो में नियंत्रित तरीके से गिराया जाएगा। 25 साल पुराने इस मिशन को सुरक्षित रूप से समाप्त करने के लिए 1 अरब डॉलर का खर्च तय किया गया है।
न्यूयोर्क: पृथ्वी से लगभग 400 किलोमीटर ऊपर स्थित अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन International Space Station अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। पिछले 25 वर्षों से मानवता की सबसे बड़ी अंतरिक्ष प्रयोगशाला के रूप में काम कर रहा यह स्टेशन अब 2030 तक पूरी तरह रिटायर कर दिया जाएगा।
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने आधिकारिक रूप से इसकी डिऑर्बिट योजना साझा की है, जिसके तहत 2028 से इसकी अंतिम प्रक्रिया शुरू होगी और 2030 तक इसे पृथ्वी के वातावरण में नियंत्रित तरीके से गिरा दिया जाएगा।
यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब अंतरिक्ष अनुसंधान का फोकस गहरे अंतरिक्ष मिशनों, चंद्रमा और मंगल अभियानों की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
1 अरब डॉलर की डिऑर्बिट योजना और बढ़ती लागत
नासा ने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को सुरक्षित तरीके से खत्म करने के लिए लगभग 1 अरब डॉलर (करीब 9500 करोड़ रुपए) का बजट तय किया है। यह प्रक्रिया अत्यंत जटिल और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है।
आईएसएस का कुल निर्माण और संचालन खर्च वर्षों में कई लाख करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है। विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार बढ़ती मेंटेनेंस लागत और तकनीकी समस्याओं के कारण इसे आगे बनाए रखना आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं रह गया है।
इसके अलावा, नासा अब अपने संसाधनों को भविष्य की परियोजनाओं जैसे चंद्र मिशन और मंगल पर मानव मिशन की तैयारी में लगाना चाहता है।
कैसे समाप्त होगा अंतरिक्ष स्टेशन का सफर
International Space Station को सीधे पृथ्वी पर गिरने नहीं दिया जाएगा, बल्कि इसे नियंत्रित प्रक्रिया के तहत वायुमंडल में लाया जाएगा।
2028 के आसपास स्टेशन की कक्षा को धीरे-धीरे नीचे लाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इसके लिए विशेष अंतरिक्ष यानों की मदद ली जाएगी, जो इसे सुरक्षित तरीके से पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश कराएंगे।
जैसे ही स्टेशन वायुमंडल में प्रवेश करेगा, तेज घर्षण के कारण इसका अधिकांश हिस्सा जलकर नष्ट हो जाएगा। हालांकि कुछ भारी धातु और संरचनात्मक हिस्से पूरी तरह नष्ट नहीं हो पाएंगे, इसलिए उनके पृथ्वी पर गिरने का खतरा बना रहता है।
इसी जोखिम को देखते हुए नासा ने एक नियंत्रित और सुरक्षित गिरावट योजना तैयार की है ताकि मलबा किसी आबादी वाले क्षेत्र में न गिरे।
पॉइंट नीमो: अंतरिक्ष कचरे का अंतिम ठिकाना
नासा ने आईएसएस के मलबे को गिराने के लिए प्रशांत महासागर के एक दूरस्थ क्षेत्र का चयन किया है, जिसे Point Nemo कहा जाता है।
यह स्थान पृथ्वी पर सबसे दूरस्थ समुद्री बिंदु माना जाता है, जहां सबसे नजदीकी जमीन भी हजारों किलोमीटर दूर होती है। इस वजह से इसे “स्पेसक्राफ्ट कब्रिस्तान” भी कहा जाता है।
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यहां 1970 के दशक से अब तक लगभग 300 से अधिक अंतरिक्ष यान और सैटेलाइट के अवशेष गिराए जा चुके हैं। यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियंत्रित है और यहां जहाजों या मानव गतिविधियों की अनुमति नहीं होती।
नासा की योजना है कि International Space Station को भी इसी क्षेत्र में नियंत्रित तरीके से गिराया जाए ताकि किसी प्रकार का मानवीय जोखिम न रहे।
अंतरिक्ष स्टेशन की तकनीकी भूमिका और उपलब्धियां
International Space Station नवंबर 2000 से लगातार मानव उपस्थिति वाला मंच रहा है। यहां अब तक 19 देशों के 250 से अधिक अंतरिक्ष यात्री रह चुके हैं और वैज्ञानिक प्रयोग कर चुके हैं।
यह स्टेशन हर 24 घंटे में लगभग 16 बार पृथ्वी की परिक्रमा करता है और माइक्रोग्रैविटी (सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण) में वैज्ञानिक प्रयोगों का अनोखा केंद्र रहा है।
यहां चिकित्सा, जैव विज्ञान, सामग्री विज्ञान और अंतरिक्ष पर्यावरण से जुड़े हजारों प्रयोग किए गए हैं, जिनका उपयोग पृथ्वी पर भी कई तकनीकों में हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग का प्रतीक
International Space Station एक संयुक्त परियोजना है जिसमें अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और कनाडा की अंतरिक्ष एजेंसियों की भागीदारी रही है।
NASA के साथ-साथ रूस की रोसकॉसमॉस, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और अन्य साझेदारों ने इसे दशकों तक संचालित किया।
यह परियोजना शीत युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय सहयोग का सबसे बड़ा उदाहरण मानी जाती है, जिसने अंतरिक्ष विज्ञान में वैश्विक साझेदारी को मजबूत किया।
निजी स्पेस स्टेशन युग की शुरुआत
आईएसएस के रिटायर होने के बाद अंतरिक्ष में निजी कंपनियों का दौर शुरू होने वाला है। कई अमेरिकी और निजी कंपनियां अपने स्वयं के स्पेस स्टेशन विकसित कर रही हैं।
इनमें Axiom Space का Axiom Station, Blue Origin का Orbital Reef और अन्य निजी परियोजनाएं शामिल हैं।
इसके अलावा, चीन पहले ही अपना स्वतंत्र अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित कर चुका है, जो लगातार विस्तार कर रहा है।
भारत और भविष्य की अंतरिक्ष योजना
भारत की अंतरिक्ष एजेंसी ISRO भी इस दिशा में सक्रिय है। भारत ने घोषणा की है कि वह 2035 तक अपना स्वतंत्र अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की योजना पर काम कर रहा है।
यह कदम भारत को वैश्विक अंतरिक्ष शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।
वैज्ञानिक विरासत और भविष्य की दिशा
International Space Station ने मानवता को अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहने और काम करने की क्षमता विकसित करने में मदद की है। इसने यह साबित किया है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से बड़े वैज्ञानिक लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।
अब जब यह मिशन अपने अंतिम चरण में पहुंच रहा है, तो वैज्ञानिक समुदाय इसे एक युग के अंत और नए अंतरिक्ष युग की शुरुआत के रूप में देख रहा है, जहां निजी कंपनियां और नए देश अंतरिक्ष अनुसंधान में प्रमुख भूमिका निभाएंगे।









