उत्तर प्रदेश के झांसी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के एक प्रचारक ने सनातन परंपराओं और पारिवारिक मूल्यों को लेकर बड़ा बयान दिया है। संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में तलाक की कोई परंपरा नहीं रही है और विवाह को एक पवित्र, आजीवन संस्कार माना गया है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि आज के समय में समाज पश्चिमी प्रभाव के कारण विवाह और रिश्तों की मूल भावना से दूर होता जा रहा है, जो चिंताजनक है।
RSS प्रचारक ने अपने संबोधन में कहा कि सनातन संस्कृति में पति-पत्नी का रिश्ता केवल कानूनी समझौता नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सामाजिक दायित्व है। उन्होंने बताया कि विवाह को यहां सात जन्मों का बंधन माना गया है, जिसमें त्याग, समर्पण और सहनशीलता सबसे महत्वपूर्ण मूल्य हैं। तलाक जैसी अवधारणा आधुनिक सोच और बाहरी प्रभावों का परिणाम है, जो भारतीय पारिवारिक ढांचे को कमजोर कर रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि भाषा और संबोधन का समाज पर गहरा असर पड़ता है। इसी संदर्भ में प्रचारक ने विवाहित जोड़ों से अपील की कि वे एक-दूसरे को संबोधित करने में विदेशी या अनौपचारिक शब्दों का प्रयोग न करें। उन्होंने कहा कि ‘मियां-बीबी’, ‘हसबेंड-वाइफ’ या ‘हब्बी-बब्बी’ जैसे शब्द हमारी सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करते हैं। इसके बजाय पति-पत्नी को धर्म और परंपरा के अनुरूप एक-दूसरे के लिए सम्मानजनक और मर्यादित संबोधन अपनाने चाहिए।
संघ प्रचारक का कहना था कि शब्द केवल बोलचाल का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे हमारी सोच, संस्कार और दृष्टिकोण को भी दर्शाते हैं। जब भाषा बदलती है, तो धीरे-धीरे विचार और व्यवहार भी बदलने लगते हैं। यही कारण है कि संघ परिवार सामाजिक जीवन में भाषा की शुद्धता और सांस्कृतिक चेतना को अत्यंत आवश्यक मानता है।
कार्यक्रम में मौजूद स्वयंसेवकों और श्रोताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि संघ का शताब्दी वर्ष केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन और समाज को सही दिशा देने का समय है। इस अवसर पर परिवार व्यवस्था को मजबूत करने, वैवाहिक रिश्तों में धैर्य और समझ बढ़ाने तथा युवा पीढ़ी को भारतीय मूल्यों से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि आज पारिवारिक विवादों में छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते टूट रहे हैं, जबकि सनातन परंपरा हमें संवाद, सहनशीलता और समाधान का मार्ग दिखाती है। यदि पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति सम्मान और कर्तव्य की भावना रखें, तो अधिकांश समस्याओं का समाधान संभव है।
RSS प्रचारक के इस बयान के बाद झांसी में सामाजिक और वैचारिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। कुछ लोगों ने इसे भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों की रक्षा से जुड़ा जरूरी संदेश बताया, जबकि कुछ वर्गों ने इसे बदलते सामाजिक परिवेश के संदर्भ में बहस का विषय माना है। हालांकि, संघ से जुड़े लोगों का कहना है कि इस तरह के विचार समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखने के लिए आवश्यक हैं।
कुल मिलाकर, संघ के शताब्दी वर्ष पर दिया गया यह बयान विवाह, परिवार और भाषा से जुड़े सांस्कृतिक मूल्यों को फिर से केंद्र में लाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जिसने झांसी समेत पूरे क्षेत्र में चर्चा को जन्म दे दिया है।









