कश्मीरी पंडितों का जम्मू में एक दिवसीय अनशन, अलग होमलैंड और ‘नरसंहार’ की मान्यता की मांग

कश्मीर: पनुन कश्मीर के बैनर तले कश्मीरी पंडितों ने जम्मू में अनशन किया। संगठन ने अलग होमलैंड, कथित नरसंहार की मान्यता, कानून और 15,000 नौकरियों की मांग की।

जम्मू में पनुन कश्मीर के बैनर तले विस्थापित कश्मीरी पंडितों ने एक दिवसीय भूख हड़ताल की। संगठन ने अलग होमलैंड, कथित नरसंहार की आधिकारिक मान्यता और विशेष कानून की मांग की। साथ ही 15,000 नौकरियां और बढ़ी आर्थिक सहायता मांगी।

जम्मू-कश्मीर: जम्मू में विस्थापित कश्मीरी पंडितों के एक बड़े समूह ने शनिवार को एक दिवसीय भूख हड़ताल की। पनुन कश्मीर के बैनर तले आयोजित इस प्रदर्शन में समुदाय के लिए कश्मीर घाटी में अलग होमलैंड बनाने, कथित ‘नरसंहार’ को आधिकारिक मान्यता देने और इसके लिए विशेष कानून बनाने की मांग की गई। प्रदर्शनकारियों ने जम्मू स्थित प्रेस क्लब के बाहर धरना दिया। हाथों में तख्तियां लेकर उन्होंने अपनी मांगों के समर्थन में नारे लगाए और सरकार से लंबे समय से लंबित मुद्दों पर कार्रवाई करने की अपील की।

पनुन कश्मीर के नेताओं ने कहा कि समुदाय के विस्थापन के बाद से उनकी मांगों को लेकर संघर्ष जारी है। संगठन ने कहा कि कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी के लिए ऐसा राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचा जरूरी है, जिसमें उनकी सुरक्षा और स्थायी पुनर्वास सुनिश्चित हो सके।

अलग केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा देने की मांग

पनुन कश्मीर के संयोजक अग्निशेखर ने कहा कि संगठन कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी को एक अलग होमलैंड के माध्यम से सुनिश्चित करने की मांग कर रहा है। उन्होंने प्रस्तावित क्षेत्र को केंद्रशासित प्रदेश (Union Territory) का दर्जा देने की मांग रखी।

अग्निशेखर के अनुसार, यह मांग समुदाय के विस्थापन के बाद से चल रहे संघर्ष का हिस्सा है। उन्होंने दावा किया कि कश्मीरी पंडित समुदाय ने लंबे समय तक हिंसा और उत्पीड़न का सामना किया है और उनके अनुसार अलग केंद्रशासित प्रदेश ही स्थायी समाधान उपलब्ध करा सकता है।

उन्होंने कहा कि प्रस्तावित होमलैंड का उद्देश्य दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रह रहे कश्मीरी पंडितों के लिए घाटी में वापस लौटने का सुरक्षित रास्ता तैयार करना है।

अग्निशेखर ने दावा किया कि इस व्यवस्था से समुदाय को भविष्य में दोबारा घाटी से विस्थापित किए जाने की आशंका कम होगी।

37 साल से ‘नरसंहार’ की आधिकारिक मान्यता की मांग

पनुन कश्मीर के अध्यक्ष टीटो गंजू ने कहा कि संगठन पिछले 37 वर्षों से समुदाय के कथित नरसंहार को औपचारिक रूप से मान्यता देने की मांग कर रहा है।

उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडितों ने हिंसा और विस्थापन का सामना किया और चाहते हैं कि इस घटना को सरकार की ओर से औपचारिक रूप से मान्यता दी जाए।

गंजू ने दावा किया कि संसद में अलग-अलग मौकों पर ‘नरसंहार’ शब्द का उल्लेख किया गया है, लेकिन सरकार की ओर से अभी तक समुदाय के इस दावे को लेकर कोई औपचारिक मान्यता नहीं दी गई है।

यहां ‘नरसंहार’ का उल्लेख पनुन कश्मीर और उसके नेताओं द्वारा किए गए दावे के संदर्भ में है। इस रिपोर्ट में इसे स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है।

अलग ‘जेनोसाइड लॉ’ बनाने की मांग

पनुन कश्मीर ने भारत में एक विशेष नरसंहार कानून बनाए जाने की मांग भी की। टीटो गंजू ने तर्क दिया कि भारत Genocide Convention का हस्ताक्षरकर्ता है और इसलिए संगठन के अनुसार देश में इससे संबंधित विशिष्ट कानून होना चाहिए।

गंजू ने कहा कि पनुन कश्मीर ने 2020 में स्वयं एक विधेयक का प्रस्ताव तैयार किया था। संगठन अब सरकार से इस मुद्दे की जांच और कानून बनाने की संभावनाओं पर विचार करने के लिए एक आयोग गठित करने की मांग कर रहा है।

उनके मुताबिक, आयोग समुदाय के दावों, घटनाओं और संबंधित मुद्दों की जांच कर सकता है और प्रस्तावित कानून पर विचार कर सकता है।

तीन प्रमुख मांगों पर जोर

टीटो गंजू ने प्रदर्शन के दौरान संगठन की तीन मुख्य मांगें गिनाईं। इनमें कथित नरसंहार की आधिकारिक मान्यता, विशेष जेनोसाइड कानून का निर्माण और कश्मीरी पंडितों के लिए अलग होमलैंड शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि समुदाय को विस्थापित हुए कई दशक बीत चुके हैं, लेकिन अभी भी उसे न्याय और आजीविका के लिए प्रदर्शन करना पड़ रहा है।

पनुन कश्मीर का कहना है कि कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के लिए केवल आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं है। संगठन सुरक्षा और राजनीतिक अधिकारों की गारंटी के साथ स्थायी समाधान की मांग कर रहा है।

बेरोजगार युवाओं के लिए 15 हजार नौकरियों की मांग

प्रदर्शनकारियों ने विस्थापित कश्मीरी पंडित युवाओं के लिए रोजगार से जुड़ी मांग भी उठाई। टीटो गंजू ने केंद्र सरकार के माध्यम से समुदाय के बेरोजगार युवाओं के लिए 15,000 नौकरियां उपलब्ध कराने की मांग की।

संगठन के अनुसार, विस्थापन के कारण समुदाय के सामने रोजगार और आजीविका से जुड़ी समस्याएं भी बनी हुई हैं। सरकारी स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने को पुनर्वास प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है।

यह मांग समुदाय के युवाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने और उन्हें स्थायी आजीविका उपलब्ध कराने से जुड़ी है।

विस्थापित परिवारों की आर्थिक सहायता बढ़ाने की मांग

पनुन कश्मीर ने विस्थापित परिवारों को मिलने वाली मासिक एक्स-ग्रेशिया सहायता में भी बढ़ोतरी की मांग की है। संगठन चाहता है कि यह राशि कम से कम 25,000 रुपये प्रति माह की जाए।

टीटो गंजू ने कहा कि विस्थापित परिवारों की आर्थिक स्थिति और लंबे समय से जारी पुनर्वास संबंधी समस्याओं को देखते हुए मौजूदा सहायता में वृद्धि की जरूरत है।

संगठन का कहना है कि रोजगार, आर्थिक सहायता और सुरक्षित पुनर्वास तीनों पहलुओं पर एक साथ काम किए जाने की आवश्यकता है।

महिलाओं ने भी भूख हड़ताल में लिया हिस्सा

जम्मू में आयोजित भूख हड़ताल में पनुन कश्मीर के कार्यकर्ताओं के साथ महिला सदस्य भी शामिल हुईं। प्रदर्शनकारियों ने प्रेस क्लब के बाहर धरना देकर अपनी मांगों के समर्थन में नारे लगाए।

प्रदर्शन का उद्देश्य सरकार का ध्यान कश्मीरी पंडित समुदाय की लंबे समय से चली आ रही मांगों की ओर आकर्षित करना था।

प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों की अनदेखी जारी रही तो समुदाय अपने आंदोलन को आगे भी जारी रख सकता है।

कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का मुद्दा

कश्मीरी पंडितों का विस्थापन कश्मीर के आधुनिक राजनीतिक इतिहास के सबसे संवेदनशील मुद्दों में शामिल है। समुदाय के बड़ी संख्या में लोगों ने घाटी से बाहर जाकर अलग-अलग राज्यों और देशों में जीवन शुरू किया।

विस्थापित समुदाय के भीतर वापसी, सुरक्षा, रोजगार और पुनर्वास को लेकर लंबे समय से अलग-अलग मांगें उठती रही हैं। पनुन कश्मीर का प्रस्ताव इनमें से एक प्रमुख राजनीतिक मांग है, जिसमें अलग क्षेत्र और केंद्रशासित प्रदेश के दर्जे की बात कही जाती है।

संगठन का कहना है कि केवल सुरक्षित वापसी की व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी और इसके लिए एक अलग राजनीतिक-प्रशासनिक ढांचे की आवश्यकता है।

सरकार से संस्थागत कार्रवाई की मांग

पनुन कश्मीर के नेताओं ने सरकार से इस मुद्दे पर केवल राहत या पुनर्वास योजनाओं तक सीमित रहने के बजाय संस्थागत स्तर पर कार्रवाई करने की मांग की है।

संगठन चाहता है कि कथित नरसंहार के दावों की जांच के लिए आयोग गठित किया जाए और प्रस्तावित कानून पर विचार किया जाए। इसके साथ ही अलग होमलैंड, रोजगार और आर्थिक सहायता से जुड़ी मांगों पर भी निर्णय लेने की अपील की गई है।

फिलहाल जम्मू में आयोजित यह एक दिवसीय भूख हड़ताल समुदाय की इन्हीं मांगों को लेकर विरोध का हिस्सा रही। पनुन कश्मीर ने स्पष्ट किया है कि उसकी तीन मुख्य राजनीतिक मांगें कथित नरसंहार की मान्यता, विशेष कानून और अलग होमलैंड हैं। इसके अलावा संगठन ने 15,000 नौकरियों और विस्थापित परिवारों के लिए कम से कम 25,000 रुपये मासिक सहायता की भी मांग की है।

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