कौन हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, जिनके कारण प्रयागराज माघ मेला में उठे विवाद?

कौन हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, जिनके कारण प्रयागराज माघ मेला में उठे विवाद?

प्रयागराज के माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती संगम स्नान को लेकर विवादों में आ गए। प्रशासन ने भीड़ और सुरक्षा कारणों से उन्हें रोक दिया, जिससे शिष्यों और अधिकारियों के बीच तनाव बढ़ा। शंकराचार्य पद की वैधता पर सवाल उठने से माघ मेला राजनीति और धार्मिक चर्चाओं का केंद्र बन गया।

Swami Avimukteshwaranand Controversy: प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती संगम स्नान के लिए शिष्यों के साथ निकले, लेकिन प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से उन्हें आगे बढ़ने से रोका। विवाद में शिष्यों और अधिकारियों के बीच टकराव हुआ और शंकराचार्य पद की वैधता पर सवाल उठ गया। यह घटना धार्मिक और प्रशासनिक दृष्टि से बड़ी चर्चाओं का विषय बनी है और फिलहाल मामला शांत नहीं हुआ है।

कौन हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, जिनका जन्म 15 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में उमाशंकर उपाध्याय के रूप में हुआ था, ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) के शंकराचार्य हैं। उन्होंने संस्कृत, वेद, उपनिषद और शास्त्रों का गहन अध्ययन किया और 1990 के दशक में संन्यास ग्रहण किया। 2003 में उन्हें दंड संन्यास दीक्षा मिली और तब से वे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के नाम से जाने गए। उनका दृष्टिकोण केवल धर्म तक सीमित नहीं है; वे पर्यावरण, गौहत्या, गंगा संरक्षण और धार्मिक मर्यादाओं पर भी मुखर रहे हैं।

माघ मेले में विवाद

प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती संगम स्नान के लिए शिष्यों के साथ रथ और पालकी पर निकले। प्रशासन ने भारी भीड़ को देखते हुए उन्हें आगे बढ़ने से रोका और पैदल स्नान करने को कहा। इसके बाद शिष्यों और प्रशासन के बीच हल्की झड़प हुई और स्वामी ने संगम स्नान से इनकार कर धरने पर बैठ गए। विवाद बढ़ते हुए शंकराचार्य पद की वैधता तक पहुंच गया, क्योंकि प्रशासन ने नोटिस जारी कर इसे सुप्रीम कोर्ट के लंबित मामले से जोड़कर देखा।

धर्म, परंपरा और विवाद

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती हमेशा धर्म और परंपराओं की मुखर पैरवी करते आए हैं। उन्होंने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मांग की, पर्यावरण संरक्षण के लिए PIL दाखिल किया और गौहत्या, मंदिरों की आत्मनिर्भरता और सरकारी हस्तक्षेप पर खुलकर अपनी राय रखी। उनका कहना है कि शंकराचार्य पद का निर्णय अदालत या राजनीति नहीं, बल्कि धर्मपीठ और परंपराओं के अनुसार होता है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का माघ मेले में विवाद यह दर्शाता है कि धर्म, परंपरा और प्रशासनिक नियमों के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है। फिलहाल मामला शांत नहीं हुआ है और माघ मेला राजनीति और धार्मिक चर्चाओं का केंद्र बना हुआ है।

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