Lala Shri Ram कौन थे? SRCC से DCM तक, ऐसे खड़ा किया भारत का बड़ा कारोबारी और शैक्षणिक साम्राज्य

Lala Shri Ram ने DCM को विस्तार देने के साथ SRCC, LSR और रिसर्च संस्थानों की नींव रखी। जानिए शुरुआती असफलताओं से सफलता तक उनका पूरा सफर।

प्रधानमंत्री मोदी के SRCC शताब्दी समारोह संबोधन के बाद लाला श्री राम फिर चर्चा में हैं। शुरुआती कारोबारी असफलताओं से उबरकर उन्होंने DCM को विस्तार दिया और SRCC, LSR जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की नींव रखी।

Lala Shri Ram: दिल्ली के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बाद इसके संस्थापक लाला श्री राम की विरासत चर्चा में है। साधारण शुरुआत और शुरुआती कारोबारी असफलताओं के बावजूद उन्होंने DCM को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उद्योग के साथ शिक्षा और कर्मचारी कल्याण पर जोर देते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण संस्थानों की स्थापना में भी योगदान दिया।

DCM में अकाउंटिंग से शुरू हुआ सफर, फिर कारोबारी फैसलों ने दिलाई बड़ी कामयाबी

Lala Shri Ram कौन थे? SRCC से DCM तक, ऐसे खड़ा किया भारत का बड़ा कारोबारी और शैक्षणिक साम्राज्य

लाला श्री राम का जीवन भारतीय कारोबार और शिक्षा के क्षेत्र में दूरदर्शिता, मेहनत और लंबे समय की सोच का उदाहरण माना जाता है। शुरुआती दौर में स्टेशनरी कारोबार और कॉटन-गिनिंग फैक्ट्री में असफलता के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। रावलपिंडी में मुनीम के तौर पर काम करने के बाद करीब 25 वर्ष की उम्र में वे परिवार की कंपनी दिल्ली क्लॉथ एंड जनरल मिल्स (DCM) से जुड़े।

DCM को आगे बढ़ाने में कैसे मिली बड़ी सफलता?

श्री राम कारोबार को सिर्फ दफ्तर तक सीमित रखकर नहीं देखते थे। वे मिल के गेट से लेकर अकाउंट्स विभाग और फैक्ट्री फ्लोर तक खुद कामकाज समझते थे। बाजार की वास्तविक मांग जानने के लिए कपड़ा कारोबारियों और सेल्समैन से भी बातचीत करते थे।

पहले विश्व युद्ध के दौरान उनकी कारोबारी रणनीति को बड़ा फायदा मिला। जब कई छोटे निवेशकों का DCM पर भरोसा कम हुआ, तब श्री राम ने उनसे कंपनी के शेयर खरीदने शुरू किए। साथ ही, उन्होंने सेना के लिए टेंट बनाने का कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए अपने पिता को तैयार किया। इस कारोबार से मिली कमाई का इस्तेमाल उन्होंने आगे DCM के शेयर खरीदने में किया। युद्ध समाप्त होने तक उनका परिवार कंपनी का सबसे बड़ा शेयरहोल्डर बन चुका था।

उद्योग के साथ कर्मचारी कल्याण पर भी दिया जोर

1930 के दशक में श्री राम ने DCM के कारोबार को चीनी, वनस्पति, इलेक्ट्रिक मोटर और कैपेसिटर जैसे क्षेत्रों तक फैलाया। उनका जोर ऐसे उत्पादों पर था, जिनका भारत में पर्याप्त उत्पादन नहीं होता था।

ऊषा सिलाई मशीन के मामले में भी उन्होंने भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखा। इंजीनियरों को विदेशी मॉडलों का अध्ययन कर उन्हें भारतीय मौसम और कामकाजी परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करने पर जोर दिया गया।

उनकी सोच सिर्फ उत्पादन और मुनाफे तक सीमित नहीं थी। उन्होंने 1920 में कर्मचारियों के लिए प्रोविडेंट फंड की शुरुआत की और 1931 में मुनाफे में हिस्सेदारी वाला बोनस लागू किया। इससे पता चलता है कि वे कर्मचारियों को कारोबारी व्यवस्था का अहम हिस्सा मानते थे।

SRCC और LSR से लेकर रिसर्च संस्थान तक विरासत

लाला श्री राम की विरासत का बड़ा हिस्सा शिक्षा और रिसर्च से जुड़ा है। 1920 में शुरू किए गए कमर्शियल एजुकेशन ट्रस्ट से आगे चलकर वह संस्थान विकसित हुआ, जिसे आज श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) के नाम से जाना जाता है।

1947 में उन्होंने श्रीराम इंस्टीट्यूट फॉर इंडस्ट्रियल रिसर्च की स्थापना की, जिसे देश के शुरुआती स्वतंत्र गैर-लाभकारी औद्योगिक शोध संस्थानों में गिना जाता है। इसके बाद 1956 में अपनी पत्नी फूलन देवी की स्मृति में लेडी श्री राम कॉलेज फॉर विमेन (LSR) की स्थापना की।

जनवरी 1963 में निधन के समय लाला श्री राम अपने पीछे एक बड़ा औद्योगिक कारोबार और ऐसे शैक्षणिक संस्थान छोड़ गए थे, जिनका प्रभाव आगे भी जारी रहा। उनकी कहानी शुरुआती असफलताओं से लेकर उद्योग, शिक्षा और कर्मचारी कल्याण में लंबे समय तक असर छोड़ने तक के सफर को दिखाती है।

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