लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी और परिसीमन पर विपक्ष में मतभेद, जानें कांग्रेस से DMK तक किसका क्या रुख

Lok Sabha Delimitation: लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी और परिसीमन के मुद्दे पर विपक्षी दलों के बीच मतभेद सामने आए हैं। जानें कांग्रेस, DMK समेत अन्य विपक्षी

देश की राजनीति में इन दिनों लोकसभा की सीटें बढ़ाने, महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने और चुनाव क्षेत्रों के नए सिरे से परिसीमन को लेकर चर्चा तेज है। सरकार इन प्रस्तावों को आगे बढ़ाना चाहती है, लेकिन इन्हें लेकर विपक्षी दलों की अलग-अलग चिंताएं और मांगें सामने आ रही हैं।

नई दिल्ली: देश में महिला आरक्षण, लोकसभा की सीटें बढ़ाने और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार का प्रस्ताव था कि लोकसभा में अधिकतम सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 की जाए और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को 2029 के आम चुनाव से लागू करने का रास्ता तैयार किया जाए। 

हालांकि, इस योजना से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका। इसके बाद परिसीमन और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े दो अन्य विधेयकों पर भी आगे की कार्रवाई नहीं हुई।

क्या था सरकार का प्रस्ताव?

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने महिला आरक्षण लागू करने और लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने के लिए विपक्षी दलों से सहयोग की अपील की थी। सरकार ने 16 अप्रैल को संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 के साथ परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेशों से संबंधित विधेयक पेश किए थे।

प्रस्ताव का उद्देश्य लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 850 तक बढ़ाना, निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से निर्धारण करना और महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण को 2029 के चुनाव से लागू करने की संभावना तैयार करना था। लेकिन 17 अप्रैल को संविधान संशोधन विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण विधेयक पारित नहीं हो सका। 

कांग्रेस: महिला आरक्षण का समर्थन, परिसीमन पर सवाल

कांग्रेस का कहना है कि वह महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, लेकिन इसे परिसीमन और लोकसभा सीटों में बड़े बदलाव से जोड़ने पर उसे आपत्ति है। पार्टी नेतृत्व ने महिला आरक्षण कानून को लागू करने की मांग करते हुए सरकार की मंशा और प्रस्तावित प्रक्रिया पर सवाल उठाए। राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं ने आशंका जताई कि परिसीमन के जरिए देश का चुनावी संतुलन प्रभावित हो सकता है। कांग्रेस की प्रमुख चिंता यह भी है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नुकसान पहुंचा सकता है। 

समाजवादी पार्टी: आंकड़ों और प्रतिनिधित्व पर जोर

लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी और परिसीमन पर विपक्ष में मतभेद, जानें कांग्रेस से DMK तक किसका क्या रुख

समाजवादी पार्टी परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाती रही है। पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की राजनीतिक चिंताओं में जातिगत जनगणना, सामाजिक न्याय और विभिन्न समुदायों के उचित प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे शामिल हैं। पार्टी के लिए यह बहस उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के राजनीतिक समीकरणों से भी जुड़ी है।

DMK: दक्षिण भारत के हितों की चिंता

तमिलनाडु की सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने प्रस्तावित बदलावों का विरोध किया था। पार्टी की चिंता है कि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें परिसीमन के कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में नुकसान नहीं उठाना चाहिए।

दक्षिण भारतीय राज्यों की व्यापक चिंता यह है कि यदि सीटों का बंटवारा जनसंख्या के अनुपात में बदला गया, तो संसद में उत्तर भारत के राज्यों का प्रभाव बढ़ सकता है। हालांकि, केंद्र सरकार का तर्क रहा है कि सीटों की कुल संख्या बढ़ाने से दक्षिणी राज्यों की सीटें भी बढ़ सकती हैं और उनका कुल अनुपात लगभग स्थिर रह सकता है। 

TMC, शिवसेना (UBT) और वाम दलों का रुख

तृणमूल कांग्रेस ने भी परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव का विरोध किया। पार्टी की प्रमुख ममता बनर्जी और अन्य विपक्षी नेताओं की आशंका है कि प्रस्तावित बदलावों से राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन प्रभावित हो सकता है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) भी इस मुद्दे पर विपक्षी खेमे के साथ खड़ी रही। वहीं CPI, CPI(M) और CPI(ML) जैसे वामपंथी दलों ने परिसीमन की प्रक्रिया और सीटों के पुनर्निर्धारण के तरीके पर आपत्ति जताई।

NCP (शरद पवार) की अलग मांग

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की नेता सुप्रिया सुले ने सभी राज्यों की सीटों में समान अनुपात से वृद्धि जैसे विकल्पों पर चर्चा की बात कही थी। इस रुख का उद्देश्य सीटें बढ़ाने और राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन बनाए रखने की चिंता को साथ लेकर चलना था। हालांकि, किसी भी अंतिम सहमति के लिए विपक्षी दलों के बीच बातचीत अहम बनी हुई है।

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