लोकसभा में शुक्रवार को महिला आरक्षण विधेयक में संशोधन कर सीटों की संख्या बढ़ाने का जो प्रस्ताव रखा गया था, वह निचले सदन से पास नहीं हो सका। इसके बाद देश में एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि भारत की संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कितना उचित और संतुलित है।
नई दिल्ली: भारत में महिला आरक्षण और संसद में महिला प्रतिनिधित्व को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। लोकसभा में सीटों के विस्तार से जुड़ा हालिया प्रस्ताव पारित न हो पाने के बाद यह सवाल और गंभीर हो गया है कि आखिर भारतीय लोकतंत्र में आधी आबादी की भागीदारी कितनी वास्तविक और प्रभावी है। आंकड़े बताते हैं कि सुधार हुआ है, लेकिन गति बेहद धीमी है और लक्ष्य अभी भी दूर है।
संसद में महिलाओं की भागीदारी: बढ़ोतरी लेकिन सीमित प्रभाव
भारत की लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व वर्षों में धीरे-धीरे बढ़ा है। 1957 में जहां यह सिर्फ लगभग 5.4 प्रतिशत था, वहीं 2024 में यह बढ़कर करीब 13.6 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यह वृद्धि लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह अभी भी प्रस्तावित एक-तिहाई (33 प्रतिशत) महिला आरक्षण लक्ष्य से काफी पीछे है।
2019 के आम चुनाव में महिलाओं की हिस्सेदारी अपने उच्चतम स्तर 14.4 प्रतिशत तक पहुंची थी, लेकिन यह बढ़त स्थायी नहीं रह सकी और बाद के वर्षों में इसमें मामूली गिरावट दर्ज की गई।
चुनाव लड़ने वाली महिलाएं बढ़ीं, जीत का अनुपात नहीं बदला
आंकड़ों से यह भी स्पष्ट होता है कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन यह जीत में तब्दील नहीं हो पा रही है।
- 2019 लोकसभा चुनाव में 726 महिलाओं ने चुनाव लड़ा, जिनमें से 78 जीतकर संसद पहुंचीं।
- 2024 में 800 महिलाओं ने चुनाव लड़ा, लेकिन केवल 74 ही जीत सकीं।
इसका मतलब है कि महिलाओं की चुनावी सफलता दर लगभग 10 प्रतिशत या उससे भी कम बनी हुई है। यह स्थिति बताती है कि राजनीतिक भागीदारी और वास्तविक प्रतिनिधित्व के बीच अब भी बड़ा अंतर मौजूद है।
राजनीतिक दलों में भी असमान तस्वीर
भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों में भी महिलाओं की भागीदारी सीमित बनी हुई है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के आंकड़े इस असमानता को स्पष्ट करते हैं:
- भारतीय जनता पार्टी (भाजपा): लगभग 10% महिला प्रतिनिधि
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: लगभग 10%
- द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK): लगभग 6%
- ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK): लगभग 5%
- शिवसेना: लगभग 3%
इसके विपरीत, तृणमूल कांग्रेस (TMC) में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत अधिक है, जहां यह लगभग 18% तक पहुंचती है। यह अंतर दर्शाता है कि राजनीतिक दलों की आंतरिक संरचना भी महिला प्रतिनिधित्व को प्रभावित करती है।
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वैश्विक तुलना में भारत पीछे
जब भारत की तुलना वैश्विक स्तर पर की जाती है, तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है। दुनिया भर में संसदों में महिलाओं का औसत प्रतिनिधित्व लगभग 27 प्रतिशत है, जबकि भारत इससे काफी नीचे है। कुछ देशों की स्थिति इस प्रकार है:
- रवांडा: 63.8%
- क्यूबा: 57.2%
- मेक्सिको: 50.4%
इन देशों के मुकाबले भारत की 13.6 प्रतिशत हिस्सेदारी यह दिखाती है कि नीतिगत हस्तक्षेप के बिना लैंगिक संतुलन हासिल करना बेहद चुनौतीपूर्ण है।
मतदान में महिलाएं आगे, लेकिन सत्ता में पीछे
दिलचस्प बात यह है कि भारत में महिलाओं की मतदान भागीदारी लगातार बढ़ रही है और कई बार पुरुषों के बराबर या उनसे अधिक भी रही है।
- 1962: लगभग 47% महिला मतदान
- 2014: 65% से अधिक
- 2019: 67.2% (पुरुषों से थोड़ा अधिक)
- 2024: लगभग 65.8% (लगभग बराबर)
यह स्पष्ट करता है कि महिलाएं लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं, लेकिन सत्ता और नीति निर्माण में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी सीमित है।हाल के वर्षों में “महिला आरक्षण” और “Women Reservation” जैसे विषयों पर ऑनलाइन सर्च में भी तेज बढ़ोतरी देखी गई है। अप्रैल 2026 की शुरुआत में यह विषय गूगल ट्रेंड्स पर उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, जो सार्वजनिक रुचि और जागरूकता में वृद्धि को दर्शाता है।








