महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने Form-6 में बदलाव का प्रस्ताव भेजा, पहली बार वोटर बनने की घोषणा हटाने की मांग

महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी का Form-6 से पहली बार मतदाता बनने की घोषणा हटाने का प्रस्ताव। SIR के दौरान नाम जुड़वाने वाले मतदाताओं की परेशानी दूर होगी

महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने Form-6 में बदलाव का प्रस्ताव चुनाव आयोग को भेजा है। इसका उद्देश्य SSR के दौरान मतदाता सूची से हटे पात्र लोगों को दोबारा नाम जुड़वाने में होने वाली परेशानी कम करना है।

मुंबई: महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने मतदाता पंजीकरण से जुड़े Form-6 में संशोधन का प्रस्ताव भारत निर्वाचन आयोग को भेजा है। प्रस्ताव में सुझाव दिया गया है कि मतदाता सूची में दोबारा नाम दर्ज कराने के इच्छुक लोगों से यह घोषणा न कराई जाए कि वे पहली बार मतदाता के रूप में पंजीकरण करा रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार, मौजूदा प्रावधान को लेकर कुछ मतदाताओं में भ्रम और कानूनी कार्रवाई का डर देखा जा रहा है।

यह प्रस्ताव ऐसे समय भेजा गया है, जब महाराष्ट्र में मतदाता सूची का विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण यानी Special Summary Revision (SSR) चल रहा है। इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची में नए नाम जोड़े जाते हैं और पहले से दर्ज जानकारी में आवश्यक सुधार किए जाते हैं। प्रस्ताव का उद्देश्य उन पात्र नागरिकों के लिए आवेदन प्रक्रिया को आसान बनाना है, जिनके नाम किसी कारण से मतदाता सूची से हट गए हैं।

हालांकि, Form-6 में बदलाव को लेकर अंतिम फैसला निर्वाचन आयोग को करना है। जब तक संशोधन को औपचारिक मंजूरी नहीं मिलती, तब तक लागू फॉर्म और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही आवेदन करना होगा।

Form-6 में किस बदलाव का प्रस्ताव है?

Form-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। मौजूदा फॉर्म में आवेदक को यह घोषणा करनी होती है कि वह पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन कर रहा है। इसके साथ ही यह भी बताना होता है कि उसका नाम किसी अन्य विधानसभा या संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में पहले से शामिल नहीं है।

महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के प्रस्ताव में पहली बार मतदाता बनने से संबंधित घोषणा हटाने का सुझाव दिया गया है। इसका उद्देश्य उन लोगों की परेशानी कम करना है, जो पहले मतदाता सूची में शामिल थे, लेकिन पुनरीक्षण के दौरान उनका नाम हट गया और अब वे दोबारा पंजीकरण कराना चाहते हैं।

अधिकारियों के मुताबिक, मौजूदा घोषणा के कारण कुछ लोग आवेदन करने से हिचक रहे हैं। कई बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) ने भी इस तरह की चिंताओं की जानकारी दी है। इसी आधार पर पिछले सप्ताह निर्वाचन आयोग को संशोधन का प्रस्ताव भेजा गया।

गलत घोषणा करने पर क्या है कानूनी प्रावधान?

Form-6 में दी जाने वाली जानकारी की सत्यता महत्वपूर्ण है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत मतदाता सूची से संबंधित कुछ जानकारियों या घोषणाओं में जानबूझकर गलत बयान देने पर दंड का प्रावधान है। इसमें एक वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

बताया गया है कि इसी कानूनी प्रावधान को लेकर कुछ आवेदकों में चिंता है। यदि कोई व्यक्ति पहले से मतदाता सूची में शामिल रहा है और बाद में उसका नाम हट जाता है, तो पहली बार नाम जुड़वाने से संबंधित घोषणा को लेकर उसे भ्रम हो सकता है।

हालांकि, कानून के तहत किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी उसके वास्तविक तथ्यों और दिए गए बयान पर निर्भर करती है। केवल आवेदन प्रक्रिया को लेकर चिंता होने से किसी व्यक्ति का दोष सिद्ध नहीं होता। ऐसे मामलों में सही जानकारी देना और आधिकारिक निर्देशों का पालन करना जरूरी है।

प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य इस तरह के भ्रम को कम करना है। लेकिन जब तक निर्वाचन आयोग कोई औपचारिक आदेश जारी नहीं करता, तब तक आवेदकों को वर्तमान Form-6 के निर्देशों को ध्यान से पढ़ना चाहिए।

SIR के बाद हटे नामों को लेकर पहले भी बदला गया था फॉर्म

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) के बाद नाम जुड़वाने की प्रक्रिया को लेकर निर्वाचन आयोग पहले भी बदलाव कर चुका है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 10 अक्टूबर को आयोग ने SIR पूरा कर चुके राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में Form-6 से संबंधित एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र हटाने का फैसला किया था। इसके बाद पात्र आवेदकों को 2003 की मतदाता सूची में अपने या परिवार के सदस्यों के नाम होने की जानकारी देने की अतिरिक्त शर्त से राहत मिली।

पहले आवेदकों से यह बताने को कहा जाता था कि उनका नाम या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी के नाम उस पुरानी सूची में दर्ज थे या नहीं। संशोधन के बाद इस जानकारी से जुड़ा अतिरिक्त घोषणा-पत्र हटाने की बात कही गई।

इस बदलाव और महाराष्ट्र के ताजा प्रस्ताव में अंतर है। पहले कदम का संबंध पुरानी मतदाता सूची से जुड़े विवरणों से था, जबकि नया प्रस्ताव पहली बार मतदाता बनने की घोषणा पर केंद्रित है। दोनों का व्यापक उद्देश्य पात्र लोगों के पंजीकरण की प्रक्रिया में आने वाली कठिनाइयों को कम करना है।

17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूची का पुनरीक्षण

निर्वाचन आयोग ने 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया है। इनमें मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा और उत्तराखंड जैसे राज्य शामिल हैं, जहां 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं।

SSR का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन रखना है। इसके तहत पात्र नए मतदाताओं के नाम जोड़े जाते हैं, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं से संबंधित रिकॉर्ड की समीक्षा होती है और मतदाता विवरण में मौजूद गलतियों को ठीक किया जाता है।

जो युवा 2027 में 18 वर्ष की आयु पूरी कर पात्र मतदाता बनेंगे, वे भी लागू नियमों और निर्धारित समयसीमा के अनुसार पंजीकरण करा सकेंगे।

हालांकि, SSR और SIR अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। SSR मुख्य रूप से मतदाता सूची को नियमित रूप से अद्यतन करने पर केंद्रित है, जबकि SIR में सूची की अधिक व्यापक समीक्षा की जाती है। इसलिए दोनों के नियमों और दस्तावेजी आवश्यकताओं को एक समान नहीं मानना चाहिए।

SIR को लेकर विवाद और न्यायिक प्रक्रिया

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर देश में राजनीतिक बहस भी जारी है। इस विवाद की शुरुआत 24 जून 2025 को बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले SIR की घोषणा के साथ हुई थी।

निर्वाचन आयोग का कहना था कि प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना और पात्र मतदाताओं के नाम शामिल करना है। दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने दस्तावेजों की शर्तों, कम समय और संभावित नाम कटने को लेकर चिंता जताई।

अगस्त 2025 में बिहार की प्रारूप मतदाता सूची से लगभग 65 लाख नाम हटाए जाने की खबरों के बाद विवाद और तेज हुआ। इसके बाद नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों, पुराने रिकॉर्ड की अनिवार्यता और नाम हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए।

मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, 27 मई 2026 को अदालत ने बिहार में SIR कराने के निर्वाचन आयोग के अधिकार को बरकरार रखा। हालांकि, इस तरह की कानूनी कार्यवाही को किसी भी प्रक्रिया के हर पहलू पर अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए; संबंधित आदेशों और आगे की न्यायिक कार्यवाही का संदर्भ महत्वपूर्ण है।

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