मध्य प्रदेश जाति प्रमाण पत्र मामला में हाईकोर्ट ने मंत्री प्रतिमा बागरी के विवादित प्रमाण पत्र की जांच हाई लेवल कास्ट स्क्रूटनी कमेटी से 60 दिनों में पूरी कर अंतिम निर्णय देने का निर्देश दिया है।
मध्य प्रदेश जाति प्रमाण पत्र मामला में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नगरीय प्रशासन राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र विवाद पर अहम निर्देश जारी किए हैं। कांग्रेस नेता प्रदीप अहिरवार की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने हाई लेवल कास्ट स्क्रूटनी कमेटी को 60 दिनों के भीतर जांच पूरी कर अंतिम निर्णय लेने को कहा है। कोर्ट ने पारदर्शी सुनवाई और सभी पक्षों को अवसर देने पर भी जोर दिया।
हाईकोर्ट का सख्त निर्देश: 60 दिन में पूरी होगी जाति प्रमाण पत्र जांच
मध्य प्रदेश की नगरीय प्रशासन राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र विवाद में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के संवेदनशील मामलों में देरी स्वीकार्य नहीं है और हाई लेवल कास्ट स्क्रूटनी कमेटी को 60 दिनों के भीतर जांच पूरी कर अंतिम निर्णय देने का निर्देश दिया गया है।
![]()
जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने यह भी कहा कि जांच प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए। सभी संबंधित पक्षों को सुनवाई का पूरा अवसर दिया जाएगा, ताकि किसी भी प्रकार की प्रक्रिया संबंधी त्रुटि न रहे।
याचिका और आरोपों की पृष्ठभूमि
यह मामला कांग्रेस नेता प्रदीप अहिरवार द्वारा दायर रिट पिटीशन (WP-8658-2026) से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मंत्री प्रतिमा बागरी का अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र संदिग्ध है और इस पर 31 मार्च 2025 से शिकायत लंबित थी, जिस पर समय पर कार्रवाई नहीं हुई।
याचिकाकर्ता का कहना है कि लंबी देरी से न्याय प्रक्रिया प्रभावित हुई है। इससे पहले एक अन्य याचिका को ‘लोकस स्टैंडि’ के आधार पर वापस लिया गया था, हालांकि कोर्ट ने भविष्य में उचित प्रक्रिया के तहत मामला उठाने की अनुमति दी थी।
- जाति प्रमाण पत्र की वैधता पर सवाल
- पहले शिकायत लंबित रहने का आरोप
- पूर्व याचिका तकनीकी कारणों से वापस ली गई
- मंत्री ने सभी आरोपों को बताया निराधार
- SC आरक्षित सीट से विधायक हैं प्रतिमा बागरी
राजनीतिक और कानूनी असर की संभावना
हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि 30 अप्रैल 2026 तक आदेश की प्रति जांच कमेटी को भेजी जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि 30 जून 2026 तक निर्णय नहीं आता, तो याचिका को पुनः सक्रिय किया जा सकता है। इससे मामला समयबद्ध प्रक्रिया में लाया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस आदेश के बाद जांच प्रक्रिया में तेजी आएगी और राजनीतिक स्तर पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है। आने वाले महीनों में यह मामला प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों ही स्तर पर चर्चा में बना रह सकता है।









