मैसूर दशहरा की विजयादशमी शोभायात्रा में हाथी प्रशांथा को स्वर्ण हौदा ले जाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उसने 2009 से 2013 तक मंगलुरु के पिलिकुला नेचर पार्क में समय बिताया था, जहां उसकी देखभाल और प्रशिक्षण हुआ।
मंगलुरु: कर्नाटक के प्रसिद्ध मैसूर दशहरा उत्सव में इस बार हाथी प्रशांथा को स्वर्ण हौदा ले जाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के लिए चुना गया है। विजयादशमी के दिन निकलने वाली पारंपरिक शोभायात्रा में स्वर्ण हौदा का विशेष धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व है। प्रशांथा का चयन इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि उसने अपने जीवन के शुरुआती वर्षों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मंगलुरु के पिलिकुला निसर्ग धाम जैविक उद्यान में बिताया था।
प्रशांथा वर्ष 2009 में कोडागु स्थित दुबारे हाथी शिविर में प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद पिलिकुला पहुंचा था। वह वर्ष 2013 तक इस जैविक उद्यान में रहा। इसके बाद उसे मैसूर दशहरा समारोह में भाग लेने के लिए बुलाया गया और बाद में वह वापस हाथी शिविर लौट गया। अब स्वर्ण हौदा उठाने के लिए उसका चयन होने से पिलिकुला में बिताए उसके वर्षों और वहां मिली देखभाल की चर्चा फिर शुरू हो गई है।
मैसूर दशहरा में स्वर्ण हौदा का विशेष महत्व
मैसूर दशहरा कर्नाटक के सबसे प्रसिद्ध सांस्कृतिक आयोजनों में गिना जाता है। इस उत्सव का समापन विजयादशमी के दिन निकलने वाली भव्य शोभायात्रा के साथ होता है। पारंपरिक रूप से इस जुलूस में सजे-धजे हाथी शामिल होते हैं और मुख्य आकर्षण स्वर्ण हौदा होता है।
स्वर्ण हौदा को दशहरा जुलूस की पहचान माना जाता है। इसे उठाने वाले हाथी की शारीरिक क्षमता, प्रशिक्षण, व्यवहार और भीड़ के बीच शांत रहने की योग्यता महत्वपूर्ण होती है। हजारों लोगों की मौजूदगी, संगीत, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और उत्सव के माहौल के बीच हाथी को नियंत्रित और अनुशासित रहना पड़ता है।
ऐसे में प्रशांथा को इस भूमिका के लिए चुना जाना उसके प्रशिक्षण और व्यवहार से जुड़ी अपेक्षाओं को रेखांकित करता है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में चयन प्रक्रिया के सभी तकनीकी मानदंडों या इस वर्ष की पूरी हाथी-व्यवस्था का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है।
2009 में पिलिकुला पहुंचा था प्रशांथा
प्रशांथा ने वर्ष 2009 में पिलिकुला निसर्ग धाम में प्रवेश किया था। इससे पहले उसे कोडागु के दुबारे हाथी शिविर में प्रशिक्षण दिया गया था। पिलिकुला में उसका प्रवास लगभग चार वर्षों तक चला और 2013 में उसे मैसूर दशहरा समारोह में भाग लेने के लिए बुलाया गया।
पिलिकुला निसर्ग धाम मंगलुरु क्षेत्र का एक प्रमुख प्राकृतिक और जैविक केंद्र है, जहां वन्यजीवों तथा प्रकृति से संबंधित गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है। प्रशांथा के वहां रहने का समय उसके व्यवहार और अन्य जानवरों के साथ तालमेल विकसित करने के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया गया है।
उस समय पिलिकुला के वन्यजीव परिसर के निदेशक रहे जयप्रकाश भंडारी ने प्रशांथा को एक शांत स्वभाव वाला हाथी बताया था। उनके अनुसार, पिलिकुला में रहने के दौरान प्रशांथा धीरे-धीरे अधिक अनुशासित और संभालने में आसान हो गया था।
शुरुआती वर्षों में प्रशिक्षकों के सामने थीं चुनौतियां
जयप्रकाश भंडारी के मुताबिक, कम उम्र में प्रशांथा के साथ काम करना उसके प्रशिक्षकों और देखभाल करने वालों के लिए कभी-कभी चुनौतीपूर्ण होता था। हालांकि, पिलिकुला में मिली देखभाल और प्रशिक्षण के दौरान उसके व्यवहार में सुधार आया। वह दूसरे जानवरों के आसपास रहने का अधिक अभ्यस्त हुआ और उसके स्वभाव में स्थिरता विकसित हुई।
हाथियों को प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया केवल आदेशों का पालन सिखाने तक सीमित नहीं होती। उनके साथ नियमित संपर्क, सुरक्षित वातावरण, देखभाल और मानवीय व्यवहार भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विशेष रूप से उन हाथियों के लिए यह पहलू अहम होता है, जिन्हें सार्वजनिक समारोहों में भाग लेना होता है।
प्रशांथा के मामले में पिलिकुला में बिताए गए वर्षों को उसके व्यवहार के विकास का महत्वपूर्ण चरण बताया गया है। हालांकि, उसके प्रशिक्षण की विस्तृत समय-सारिणी या पशु चिकित्सा संबंधी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए उसके व्यवहार में बदलाव के सभी कारणों के बारे में निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
शरीर की बनावट को लेकर जताई गई थी संभावना
भंडारी ने पहले प्रशांथा की शारीरिक बनावट का उल्लेख करते हुए कहा था कि उसमें स्वर्ण हौदा उठाने की क्षमता हो सकती है। उन्होंने उसके अपेक्षाकृत सपाट रीढ़ वाले हिस्से की तुलना मैसूर दशहरा में पहले यह जिम्मेदारी निभा चुके हाथियों बलराम और अर्जुन से की थी।
हाथी के शरीर की बनावट ऐसी जिम्मेदारियों में विचार करने योग्य पहलुओं में से एक हो सकती है। हालांकि, केवल रीढ़ की बनावट के आधार पर किसी हाथी की उपयुक्तता तय नहीं की जा सकती। उसकी सेहत, शारीरिक क्षमता, प्रशिक्षण, स्वभाव और पशु कल्याण से जुड़े मानदंडों का मूल्यांकन भी आवश्यक होता है।
बलराम और अर्जुन जैसे हाथियों ने मैसूर दशहरा की परंपरा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे अनुभवी हाथियों से तुलना प्रशांथा के चयन के संदर्भ को समझने में मदद करती है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि दोनों हाथियों की शारीरिक विशेषताएं पूरी तरह समान थीं।
पिलिकुला से मैसूर तक प्रशांथा का सफर
प्रशांथा की यात्रा कर्नाटक में हाथियों के प्रशिक्षण और पारंपरिक आयोजनों के बीच संबंध को भी सामने लाती है। दुबारे हाथी शिविर में प्रशिक्षण के बाद उसका पिलिकुला पहुंचना और फिर मैसूर दशहरा में भाग लेने के लिए बुलाया जाना उसके जीवन के अलग-अलग चरणों को दर्शाता है।
पिलिकुला में उसके प्रवास के दौरान उसकी देखभाल करने वाले लोगों ने उसके स्वभाव और व्यवहार में आए बदलावों को करीब से देखा। भंडारी की यादों के अनुसार, प्रशांथा समय के साथ अधिक शांत और अनुशासित हुआ। यही अनुभव अब उसके चयन की चर्चा में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन गया है।
मैसूर दशहरा में स्वर्ण हौदा उठाने की जिम्मेदारी किसी भी हाथी के लिए एक बड़ी भूमिका मानी जाती है। इसके लिए सार्वजनिक वातावरण में सहज रहने, प्रशिक्षकों के निर्देशों का पालन करने और उत्सव के दौरान सुरक्षित व्यवहार बनाए रखने की जरूरत होती है।
परंपरा के साथ पशु कल्याण भी जरूरी
मैसूर दशहरा की हाथी परंपरा सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, लेकिन ऐसे आयोजनों में हाथियों की सुरक्षा और कल्याण को भी प्राथमिकता देना आवश्यक है। बड़े जुलूसों में शोर, भीड़, रोशनी और लगातार गतिविधियां हाथियों के लिए तनाव पैदा कर सकती हैं। इसलिए उनकी शारीरिक स्थिति, आराम, भोजन, पानी और पशु चिकित्सा संबंधी जरूरतों का ध्यान रखना महत्वपूर्ण होता है।
प्रशांथा के चयन के साथ यह पहलू भी प्रासंगिक है कि उसे उत्सव के दौरान किस तरह तैयार किया जाएगा और उसकी देखभाल की व्यवस्था कैसी होगी। उपलब्ध समाचार विवरण में इस वर्ष के लिए विशेष पशु कल्याण प्रोटोकॉल का उल्लेख नहीं है। ऐसे में आयोजन से संबंधित अधिकारियों की ओर से दी गई जानकारी के आधार पर ही इस विषय में विस्तृत निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।
प्रशांथा का चयन क्यों है खास?
प्रशांथा का चयन केवल एक हाथी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपे जाने की खबर नहीं है। यह उसके प्रशिक्षण, व्यवहार और पिलिकुला में बिताए गए वर्षों की याद भी ताजा करता है। वर्ष 2009 से 2013 तक वहां रहने के बाद उसका मैसूर दशहरा से जुड़ना और अब स्वर्ण हौदा उठाने के लिए चुना जाना उसकी यात्रा का उल्लेखनीय पड़ाव है।
विजयादशमी की शोभायात्रा में उसकी भूमिका पर दर्शकों और दशहरा परंपरा में रुचि रखने वालों की नजर रहेगी। प्रशांथा की कहानी यह भी दिखाती है कि पारंपरिक समारोहों में भाग लेने वाले हाथियों की तैयारी के पीछे प्रशिक्षण और दीर्घकालिक देखभाल का महत्वपूर्ण योगदान होता है।









