NASA ने ISRO को अपने Moon Base Programme में शामिल होने का न्योता दिया है। चांद के दक्षिणी ध्रुव पर स्थायी मानवीय मौजूदगी की योजना वाले इस मिशन में भारत की विशेषज्ञता अहम हो सकती है।
NASA Moon Base Programme: चांद पर लंबे समय तक इंसानों की मौजूदगी स्थापित करने की महत्वाकांक्षी योजना है। NASA ने अगस्त 2026 में ISRO को इस कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण दिया। यह पहल Artemis Accords के तहत भारत-अमेरिका अंतरिक्ष सहयोग को आगे बढ़ा सकती है और ISRO को भविष्य की चंद्र तथा मानव अंतरिक्ष उड़ान तकनीकों में महत्वपूर्ण अनुभव दे सकती है।
NASA का Moon Base Programme क्या है?
NASA का Moon Base Programme चांद पर लंबे समय के लिए इंसानों की मौजूदगी स्थापित करने की योजना है। इसके तहत चंद्रमा की सतह पर ऐसी संरचना विकसित करने का लक्ष्य है, जहां अंतरिक्ष यात्री लंबे समय तक रहकर काम और वैज्ञानिक शोध कर सकें। यह कार्यक्रम कई चरणों में रोबोटिक और मानव मिशनों के जरिए आगे बढ़ाया जाएगा।

इस योजना का प्रमुख फोकस चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव है। इस क्षेत्र में ऐसे हिस्से मौजूद हैं जहां लंबे समय तक सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचती। यहां मौजूद संभावित जल-बर्फ और कठिन पर्यावरण चंद्रमा के इतिहास तथा भविष्य के गहरे अंतरिक्ष अभियानों को समझने के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
NASA ने मार्च 2026 में अपने ‘Ignition’ कार्यक्रम के दौरान Moon Base Programme की घोषणा की थी। योजना को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने की तैयारी है। शुरुआती चरण में चंद्र सतह तक भरोसेमंद पहुंच और वहां के वातावरण को समझने पर जोर रहेगा। इसके बाद जरूरी बुनियादी ढांचा विकसित करने और आगे चलकर लंबे समय की मानवीय मौजूदगी स्थापित करने की दिशा में काम किया जाएगा।
भारत को क्यों मिला शामिल होने का न्योता?
भारत और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष सहयोग पहले से लगातार बढ़ रहा है। अगस्त 2026 में बेंगलुरु में हुई India-US Civil Space Joint Working Group की नौवीं बैठक के दौरान NASA ने ISRO को Moon Base Programme में भागीदारी का निमंत्रण दिया। दोनों देशों ने अंतरिक्ष विज्ञान, मानव अंतरिक्ष उड़ान तकनीक और Artemis Accords के तहत वैज्ञानिक डेटा साझा करने पर भी सहयोग आगे बढ़ाने की बात कही।
भारत 2023 में Artemis Accords पर हस्ताक्षर करने वाला 27वां देश बना था। ऐसे में Moon Base Programme में ISRO की संभावित भागीदारी भारत-अमेरिका के मौजूदा अंतरिक्ष सहयोग को चंद्र अन्वेषण के अगले स्तर तक ले जा सकती है।
भारत के पास चंद्र अभियानों का महत्वपूर्ण अनुभव भी है। Chandrayaan-3 ने 2023 में चंद्रमा पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग की थी और रोवर को सतह पर संचालित किया गया था। यह अनुभव भविष्य के अंतरराष्ट्रीय चंद्र अभियानों में ISRO के लिए उपयोगी हो सकता है।
ISRO के लिए क्या बदलेगा?
Moon Base Programme में भागीदारी से ISRO को लंबे समय तक चलने वाले मानव अंतरिक्ष मिशनों और चंद्र सतह पर काम करने वाली तकनीकों के विकास में व्यावहारिक अनुभव मिल सकता है। भारत पहले से ही Space Vision 2047 के तहत अपने मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है।
भारत की योजना 2035 तक Bharatiya Antariksha Station स्थापित करने और 2040 तक भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर भेजने की है। ऐसे में NASA के साथ सहयोग से भारत को जटिल मानव अंतरिक्ष अभियानों की योजना और तकनीक में अतिरिक्त अनुभव मिल सकता है।
चांद पर बढ़ रही अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा
चंद्रमा पर स्थायी मौजूदगी स्थापित करने की कोशिश केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। रूस और चीन भी International Lunar Research Station यानी ILRS विकसित करने की योजना पर काम कर रहे हैं। चीन 2030 तक इंसानों को चंद्रमा पर भेजने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
ऐसे माहौल में NASA का भारत को अपने Moon Base Programme में शामिल होने का न्योता वैज्ञानिक सहयोग के साथ अंतरिक्ष कूटनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह अंतरराष्ट्रीय सहयोग से मिलने वाले तकनीकी लाभ को अपनी स्वतंत्र अंतरिक्ष क्षमताओं और दीर्घकालिक लक्ष्यों के साथ संतुलित रखे।












