इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने 27 अक्टूबर के चुनाव से पहले ईरान पर हमला करने से परहेज करने की बात कही है। उन्होंने चेतावनी दी कि ईरान ने हमला किया तो इजराइल कड़ा जवाब देगा। चुनाव में उनकी सत्ता दांव पर है।
यरुशलम: इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने 27 अक्टूबर 2026 को होने वाले आम चुनाव से पहले ईरान पर नए हमले को लेकर सावधानी बरतने के संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले ईरान पर हमला करना उचित नहीं होगा, लेकिन अगर तेहरान इजराइल पर मिसाइल हमला करता है, तो उसका कड़ा जवाब दिया जाएगा। नेतन्याहू ने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति में उनके राजनीतिक विरोधी उन्हें ही जिम्मेदार ठहराएंगे।बुधवार, 14 अक्टूबर को इजराइली आर्मी रेडियो को दिए एक इंटरव्यू में नेतन्याहू ने ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई और चुनावी राजनीति के बीच संबंधों पर अपनी बात रखी। उनका बयान ऐसे समय आया है, जब विपक्षी नेता उन पर चुनाव से पहले सैन्य टकराव बढ़ाने की कोशिश करने का आरोप लगा रहे हैं।
नेतन्याहू बोले- अभी हमला करना उचित नहीं
नेतन्याहू से जब चुनाव से पहले ईरान पर संभावित हमले के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में ऐसा करना उचित नहीं होगा। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि चुनाव के बाद उनकी सरकार ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को लेकर क्या रुख अपना सकती है।
इजराइली प्रधानमंत्री ने चेतावनी दी कि यदि ईरान या उससे जुड़े संगठन इजराइल पर हमला करते हैं, तो देश जवाबी कार्रवाई करेगा। उन्होंने कहा कि ईरान की ओर से मिसाइलें दागे जाने की स्थिति में भी विपक्ष उन्हें ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराएगा।
नेतन्याहू के बयान से संकेत मिलता है कि उनकी सरकार फिलहाल चुनाव से पहले किसी नए सैन्य अभियान को लेकर राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी पहलुओं पर विचार कर रही है। हालांकि, उनके बयान को ईरान के साथ तनाव पूरी तरह समाप्त करने के संकेत के रूप में नहीं देखा जा सकता।
चुनाव से पहले नेतन्याहू के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती
इजराइल में 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव को नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रधानमंत्री और उनके गठबंधन को विपक्षी दलों से चुनौती मिल रही है। चुनाव प्रचार के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा, ईरान के साथ संघर्ष और 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद सरकार की भूमिका जैसे मुद्दे प्रमुख बने हुए हैं।
विपक्षी नेताओं का आरोप है कि नेतन्याहू सुरक्षा संबंधी संकटों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। उनका दावा है कि चुनाव से पहले ईरान के साथ संघर्ष बढ़ने से राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा चुनावी बहस के केंद्र में आ सकता है।
नेतन्याहू ने इन आरोपों के बीच यह स्पष्ट किया है कि वह फिलहाल ईरान पर पहले हमला करने के पक्ष में नहीं हैं। हालांकि, उन्होंने इजराइल की सुरक्षा पर किसी तरह का समझौता करने का संकेत भी नहीं दिया।
फरवरी के हमलों के बाद क्षेत्र में तनाव बरकरार
इस साल 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमले किए थे। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल और खाड़ी क्षेत्र में हमले किए। रिपोर्टों के मुताबिक, जून के बाद दोनों देशों के बीच सीधे हमलों में विराम रहा है, लेकिन क्षेत्रीय तनाव समाप्त नहीं हुआ है।
ईरान और इजराइल के बीच टकराव का असर व्यापक मध्य पूर्व पर पड़ता है। इस संघर्ष में मिसाइल हमले, हवाई रक्षा प्रणालियां, क्षेत्रीय सहयोगी संगठन और अमेरिकी सैन्य भूमिका जैसे कई पहलू शामिल हैं।
नेतन्याहू के ताजा बयान से यह स्पष्ट नहीं होता कि इजराइल और अमेरिका आगे किस तरह की रणनीति अपनाएंगे। प्रधानमंत्री ने अपने हालिया अमेरिकी संपर्कों और चुनाव के बाद संभावित सैन्य विकल्पों के बारे में विस्तार से जानकारी नहीं दी।
सऊदी अरब पर हूती हमलों से बढ़ी क्षेत्रीय चिंता
इजराइल और ईरान के बीच तनाव के साथ-साथ सऊदी अरब पर यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों ने भी क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है। 10 अक्टूबर को रियाद के किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुए हमले में सऊदी अधिकारियों के अनुसार कम से कम 12 लोगों की मौत हुई और 300 से अधिक लोग घायल हुए। कुछ शुरुआती रिपोर्टों में मृतकों की संख्या अलग बताई गई थी।
हूती विद्रोहियों ने हाल के दिनों में सऊदी अरब के खिलाफ हमले तेज किए हैं। इन घटनाओं ने नागरिक हवाई यातायात और क्षेत्रीय सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

नेतन्याहू ने कहा कि मध्य पूर्व के कई देश इजराइल की सैन्य क्षमताओं और हालिया सफलताओं के बाद उससे संपर्क कर रहे हैं। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि क्या इजराइल सऊदी अरब को हूती हमलों से बचाने के लिए प्रत्यक्ष सैन्य सहायता दे रहा है।
इस घटनाक्रम से क्षेत्रीय देशों के बीच सुरक्षा सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा तेज हुई है। फिर भी, किसी विशिष्ट सैन्य समझौते या सहायता की पुष्टि के लिए संबंधित सरकारों के आधिकारिक बयान जरूरी हैं।
7 अक्टूबर 2023 के हमले का चुनाव पर असर
नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति पर 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले का प्रभाव अब भी बना हुआ है। उस हमले में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे और इजराइल की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे थे।
विपक्ष ने नेतन्याहू की सरकार पर सुरक्षा में हुई चूक की जिम्मेदारी लेने में विफल रहने का आरोप लगाया है। साथ ही, हमले की जांच के लिए स्वतंत्र आयोग गठित करने की मांग भी उठती रही है।
नेतन्याहू के समर्थक दूसरी ओर उनकी सरकार की सैन्य कार्रवाइयों और सुरक्षा नीति को देश की रक्षा के लिए जरूरी बताते हैं। ऐसे में ईरान के साथ संभावित संघर्ष चुनावी बहस में राष्ट्रीय सुरक्षा को फिर से प्रमुख मुद्दा बना सकता है।
विपक्षी एकजुटता की कमी से मिल सकता है फायदा
इजराइल की राजनीति में नेतन्याहू के विरोध में कई नेता सक्रिय हैं। इनमें गादी आइजेनकोट, नफ्ताली बेनेट और एविगडोर लिबरमैन जैसे नेता शामिल हैं। हालांकि, विपक्षी दलों के बीच रणनीति और नेतृत्व को लेकर मतभेद चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।
नेतन्याहू अपनी पार्टी और दक्षिणपंथी सहयोगियों के समर्थन को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर, विपक्ष के सामने चुनौती यह है कि वह अलग-अलग राजनीतिक समूहों को एक प्रभावी चुनावी विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर सके।
चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में अलग-अलग रुझान सामने आने की खबरें हैं। ऐसे में किसी भी गठबंधन की जीत या हार का निश्चित अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी।
छोटी पार्टियों की भूमिका भी होगी अहम
इजराइल की संसद, नेसेट, में कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए किसी गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन हासिल करना होता है। देश की आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में छोटी पार्टियों का प्रदर्शन भी सरकार गठन के समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
किसी पार्टी को संसद में प्रतिनिधित्व पाने के लिए कम से कम 3.25 प्रतिशत वोट हासिल करना जरूरी है। इस सीमा को पार करने या इससे नीचे रहने का असर सीटों के बंटवारे पर पड़ सकता है।
इसलिए 27 अक्टूबर के चुनाव में केवल प्रमुख दलों का प्रदर्शन ही नहीं, बल्कि छोटी पार्टियों को मिलने वाला समर्थन भी महत्वपूर्ण होगा। चुनाव के बाद गठबंधन बनाने की संभावनाएं यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं कि नेतन्याहू सत्ता में बने रहेंगे या इजराइल में नई सरकार बनेगी।
आगे क्या होगा?
नेतन्याहू के ताजा बयान से फिलहाल संकेत मिलता है कि वह चुनाव से पहले ईरान पर नए हमले के पक्ष में नहीं हैं। लेकिन उन्होंने यह भी साफ किया है कि इजराइल पर हमला होने की स्थिति में जवाबी कार्रवाई की जाएगी।
अब नजर चुनाव प्रचार, ईरान के साथ तनाव और क्षेत्रीय सुरक्षा घटनाक्रम पर रहेगी। चुनाव से पहले किसी नए हमले की स्थिति में इजराइल की घरेलू राजनीति और मध्य पूर्व की सुरक्षा पर व्यापक असर पड़ सकता है। वहीं, तनाव में कमी आने से नेतन्याहू की सरकार को चुनावी अभियान पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिल सकता है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि चुनाव के बाद इजराइल की ईरान नीति में कोई बदलाव होगा या नहीं। इसका जवाब आने वाले दिनों के सुरक्षा घटनाक्रम और चुनावी परिणामों से मिल सकता है।









