संयुक्त राष्ट्र की पूर्व मानवाधिकार प्रमुख नवनीतम ‘नवी’ पिल्लई का तमिलनाडु के अपने पैतृक गांव बटलागुंडु से जुड़ाव एक पुरानी तस्वीर और पिता की आखिरी इच्छा से शुरू हुआ था। करीब दो दशक पहले उन्होंने अपने पिता की इच्छा पूरी करने के संकल्प के साथ पुश्तैनी गांव का दौरा किया था।
नई दिल्ली: तमिलनाडु के बटलगुंडु गांव में नवी पिल्लई के रिश्तेदारों ने नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की खबर पर जश्न मनाया। करीब दो दशक पहले एक पुरानी तस्वीर और अधूरे पते की मदद से पिल्लई अपने पुश्तैनी परिवार तक पहुंची थीं। अब परिजन उन्हें भारत आने का न्योता देने की तैयारी कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार और न्याय के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए पहचानी जाने वाली नवनीतम ‘नवी’ पिल्लई को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की खबर ने तमिलनाडु के बटलगुंडु गांव में खुशी का माहौल बना दिया है।
उनके रिश्तेदारों ने इस उपलब्धि पर जश्न मनाया और उनके भारत लौटने की उम्मीद जताई। परिवार के लिए यह सम्मान केवल एक अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि नहीं, बल्कि अपने रिश्ते और साझा पारिवारिक इतिहास को याद करने का भी अवसर है।
नवी पिल्लई का अपने पुश्तैनी गांव से जुड़ाव एक पुरानी तस्वीर और उनके पिता की अंतिम इच्छा से जुड़ा है। करीब दो दशक पहले वह अपने परिवार की जड़ों को तलाशने के लिए भारत आई थीं। उस समय उनके पास पिता की दी हुई एक तस्वीर और अधूरा पता था, जिसके सहारे उन्होंने अपने भारतीय रिश्तेदारों को खोजने की कोशिश की।
पिता की अंतिम इच्छा पूरी करने भारत आई थीं नवी पिल्लई
परिवार के करीबी सदस्य एम. वेंकटेश कुमार के मुताबिक, नवी पिल्लई के पिता का वर्ष 2007 में दक्षिण अफ्रीका में निधन हो गया था। मृत्यु से पहले उन्होंने अपनी अस्थियों को रामेश्वरम में विसर्जित करने और परिवार के पुश्तैनी देवता के मंदिर में दर्शन करने की इच्छा जताई थी। पिता की इस इच्छा को पूरा करने के साथ ही पिल्लई अपने उन रिश्तेदारों को भी खोजना चाहती थीं, जिनसे उनका संपर्क नहीं था।
वेंकटेश कुमार के अनुसार, पिल्लई अपने कुछ अधिकारियों के साथ डिंडीगुल पहुंचीं और परिवार की तलाश में करीब दस दिन तक एक यात्री निवास में रुकी रहीं। उनके पास मौजूद तस्वीर और अधूरा पता ही उस समय रिश्तेदारों तक पहुंचने का प्रमुख आधार थे।
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चाय की दुकान से मिला परिवार तक पहुंचने का सुराग
परिवार की तलाश के दौरान एक स्थानीय चाय की दुकान पर अहम सुराग मिला। वहां से गुजर रहे एक व्यक्ति ने तस्वीर में दिख रहे नवी पिल्लई के दादा को पहचान लिया। इसके बाद स्थानीय प्रशासन, तत्कालीन जिला कलेक्टर, राजस्व अधिकारियों और गांव के लोगों की मदद से पिल्लई को उनके पुश्तैनी घर तक पहुंचाया गया।
वहां उनकी मुलाकात वेंकटेश कुमार और परिवार के दूसरे सदस्यों से हुई। रिश्तेदारों के मुताबिक, पिल्लई अपने परिवार को खोज पाने से बेहद खुश थीं। उन्होंने पुश्तैनी घर और उससे जुड़ी जानकारियां जुटाईं तथा परिवार के साथ तस्वीरें भी खिंचवाईं। वेंकटेश कुमार ने बताया कि पिल्लई ने परिवार को भरोसा दिलाया था कि जरूरत पड़ने पर वे उनकी मदद करेंगी। इस मुलाकात ने उनके परिवार को दोबारा जुड़ने का अवसर दिया और पुरानी पारिवारिक यादों को नया अर्थ मिला।
‘अब उन्हें ढूंढने के लिए तस्वीर की जरूरत नहीं पड़ेगी’
नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की खबर के बाद परिवार ने केक काटकर अपनी खुशी जाहिर की। वेंकटेश कुमार ने कहा कि पिल्लई केवल एक प्रसिद्ध न्यायविद नहीं हैं, बल्कि उनकी बुआ और परिवार की सदस्य भी हैं। उन्होंने इस उपलब्धि को पूरे गांव के लिए गर्व का विषय बताया। परिवार अब उन्हें भारत आने का निमंत्रण देने की योजना बना रहा है।
वेंकटेश कुमार के मुताबिक, इस बार स्थिति पहले से अलग होगी, क्योंकि अब परिवार को उनसे जुड़ने के लिए किसी पुरानी तस्वीर या अधूरे पते का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। यह टिप्पणी उनके रिश्ते की भावनात्मक अहमियत और वर्षों पहले शुरू हुई तलाश की याद दिलाती है।









