नोएडा और ग्रेटर नोएडा में निवेश के बड़े-बड़े प्रस्तावों के बाद अब उनकी वास्तविक स्थिति का हिसाब जुटाया जाएगा। उत्तर प्रदेश शासन ने पिछले पांच वर्षों के दौरान निवेशक सम्मेलन में हुए समझौतों और ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी में शामिल परियोजनाओं की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। संबंधित अधिकारियों को यह रिपोर्ट 25 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध करानी है। इसका मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि निवेश के लिए किए गए समझौतों में से कितनी परियोजनाएं धरातल पर उतरीं, कितनी कंपनियों ने अपना कारोबार या उत्पादन शुरू किया और कितनी इकाइयां शुरू होने के बाद बंद हो गईं। इसके साथ उन परियोजनाओं की जानकारी भी जुटाई जाएगी, जो अब तक शुरू नहीं हो सकीं।
यह समीक्षा इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि निवेश प्रस्तावों की कुल राशि अपने आप में किसी परियोजना के पूरा होने या उत्पादन शुरू करने का प्रमाण नहीं होती। किसी कंपनी के साथ समझौता होने, उसे भूखंड आवंटित होने, निर्माण शुरू होने और व्यावसायिक गतिविधियां शुरू होने के बीच कई चरण होते हैं। शासन की ओर से मांगी गई रिपोर्ट के जरिए इन चरणों की वास्तविक स्थिति सामने लाने की कोशिश की जाएगी। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि घोषित निवेश में से कितना निवेश जमीन पर उतरा है और किन परियोजनाओं में अभी काम बाकी है।
2023 में आयोजित ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के दौरान नोएडा और ग्रेटर नोएडा के लिए लगभग 1.76 लाख करोड़ रुपये के निवेश समझौते (एमओयू) किए गए थे। इनमें नोएडा प्राधिकरण क्षेत्र के लिए करीब 89 हजार करोड़ रुपये और ग्रेटर नोएडा के लिए लगभग 87 हजार करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव शामिल थे। इन प्रस्तावों के जरिए औद्योगिक इकाइयों, व्यावसायिक परियोजनाओं और दूसरे क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करने का लक्ष्य रखा गया था। अब शासन इन समझौतों की प्रगति का वास्तविक ब्योरा चाहता है।
रिपोर्ट तैयार करने में निवेश मित्र और संबंधित प्राधिकरणों की संयुक्त टीम सहयोग करेगी। अधिकारियों की टीम मौके पर जाकर कंपनियों की स्थिति की जांच करेगी। केवल दस्तावेजों में दर्ज जानकारी के आधार पर स्थिति तय करने के बजाय यह पता लगाने का प्रयास किया जाएगा कि संबंधित कंपनी वास्तव में स्थापित हुई है या नहीं, वहां निर्माण कार्य पूरा हुआ है या नहीं और उत्पादन अथवा कारोबार शुरू हुआ है या नहीं। जिन इकाइयों ने काम शुरू करने के बाद अपनी गतिविधियां बंद कर दी हैं, उनकी स्थिति भी सर्वे में दर्ज की जाएगी।
रिपोर्ट में उन कंपनियों की जानकारी भी मांगी जाएगी, जिन्हें अभी तक भूखंड आवंटित नहीं हो सके हैं। किसी परियोजना को जमीन नहीं मिलने के कारण उसके निर्माण और उत्पादन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाती। ऐसे मामलों में देरी की वजहों का विवरण देना होगा, ताकि यह पता लगाया जा सके कि बाधा भूखंड आवंटन से संबंधित है या परियोजना के किसी दूसरे चरण में समस्या बनी हुई है। शासन को यह जानकारी भी मिल सकेगी कि किन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कदम उठाने की जरूरत है।
ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी में शामिल परियोजनाओं की स्थिति की जांच भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। किसी परियोजना का इस चरण तक पहुंचना उसके क्रियान्वयन की दिशा में प्रगति का संकेत हो सकता है, लेकिन इससे यह अपने आप साबित नहीं होता कि कंपनी ने उत्पादन या कारोबार शुरू कर दिया है। इसलिए कंपनियों की मौजूदा स्थिति, काम शुरू होने की जानकारी और परियोजना में आई रुकावटों का अलग-अलग ब्योरा जुटाना जरूरी होगा।
25 अक्टूबर 2026 की समयसीमा के भीतर रिपोर्ट उपलब्ध कराए जाने के बाद निवेश प्रस्तावों और परियोजनाओं की प्रगति को लेकर अधिक स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकती है। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि कितनी कंपनियां शुरू हुई हैं, कितनी बंद हो चुकी हैं या कितनी परियोजनाएं अधूरी हैं, क्योंकि ये आंकड़े जांच के बाद ही सामने आएंगे। फिलहाल शासन ने पिछले पांच वर्षों के समझौतों और संबंधित परियोजनाओं की स्थिति का विस्तृत हिसाब मांगा है।









