18 दिन में बंद हुआ हाइड्रोजन बसों का ट्रायल: नोएडा में सवारी कम, खर्चा ज्यादा होना बनी वजह

नोएडा में हाइड्रोजन बसों का ट्रायल 18 दिन में बंद हो गया। कम सवारी और ज्यादा संचालन खर्च के चलते सेवा को आगे जारी नहीं रखा गया।
18 दिन में बंद हुआ हाइड्रोजन बसों का ट्रायल: नोएडा में सवारी कम, खर्चा ज्यादा होना बनी वजह
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नोएडा में प्रदूषण कम करने और सार्वजनिक परिवहन को ज्यादा पर्यावरण-अनुकूल बनाने की दिशा में शुरू किया गया हाइड्रोजन बसों का ट्रायल महज 18 दिन में बंद हो गया। इस ट्रायल से उम्मीद थी कि शहर में सार्वजनिक परिवहन के लिए हाइड्रोजन आधारित बसों की उपयोगिता और व्यवहारिकता को परखा जा सकेगा, लेकिन यात्रियों की कम संख्या और संचालन पर आने वाला ज्यादा खर्च बड़ी चुनौती बन गया। इसके चलते ट्रायल को आगे जारी रखने के बजाय फिलहाल रोक दिया गया है।

हाइड्रोजन से चलने वाली बसों को भविष्य के साफ-सुथरे सार्वजनिक परिवहन के विकल्प के तौर पर देखा जाता है। पारंपरिक डीजल बसों की तुलना में हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक से चलने वाले वाहनों से स्थानीय स्तर पर प्रदूषण कम करने की उम्मीद की जाती है। इसी उद्देश्य से नोएडा में इन बसों का संचालन शुरू कर ट्रायल किया गया था। हालांकि, शुरुआती अवधि में ही यह सामने आया कि जिस स्तर की यात्री संख्या की उम्मीद की जा रही थी, वह नहीं मिल पाई।

ट्रायल के दौरान बसों को निर्धारित रूट पर चलाकर यात्रियों की प्रतिक्रिया, संचालन व्यवस्था, मांग और लागत समेत कई पहलुओं को समझने की कोशिश की गई। लेकिन कम यात्रियों के कारण बसों का संचालन आर्थिक रूप से ज्यादा प्रभावी नहीं दिखाई दिया। दूसरी तरफ हाइड्रोजन बसों के संचालन और ईंधन से जुड़ी लागत भी सामान्य बसों की तुलना में एक महत्वपूर्ण चुनौती रही।

नोएडा जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में सार्वजनिक परिवहन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यात्रियों को निजी वाहनों से सार्वजनिक परिवहन की ओर लाना है। शहर में बड़ी संख्या में लोग निजी कार, बाइक और कैब का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में किसी नए और महंगे परिवहन विकल्प को सफल बनाने के लिए पर्याप्त यात्री मिलना जरूरी है। हाइड्रोजन बसों के ट्रायल में यही पहलू अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा।

ट्रायल के दौरान यात्रियों की संख्या कम रहने का सीधा असर संचालन की लागत और उपयोगिता पर पड़ा। बस को चलाने के लिए ड्राइवर, तकनीकी व्यवस्था, रखरखाव, ईंधन और अन्य परिचालन खर्च लगातार जुड़े रहते हैं। अगर बस में यात्रियों की संख्या कम हो तो प्रति यात्री संचालन लागत काफी बढ़ जाती है। यही वजह रही कि ट्रायल को आगे बढ़ाना व्यावहारिक नहीं माना गया।

हालांकि, ट्रायल का बंद होना यह नहीं दर्शाता कि हाइड्रोजन बसों की तकनीक पूरी तरह असफल हो गई है। विशेषज्ञों और परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए इस तरह के ट्रायल का उद्देश्य केवल बस चलाना नहीं, बल्कि वास्तविक परिस्थितियों में इसकी व्यवहारिकता को समझना भी होता है। नोएडा में मिले अनुभव से यह पता चला कि तकनीक के साथ-साथ रूट चयन, यात्री मांग, किराया, ईंधन की उपलब्धता और संचालन लागत जैसे मुद्दों पर भी काम करना जरूरी है।

हाइड्रोजन बसों के लिए पर्याप्त ईंधन ढांचा तैयार करना भी बड़ी चुनौती है। इलेक्ट्रिक बसों के मुकाबले हाइड्रोजन आधारित परिवहन के लिए अलग तरह की ईंधन आपूर्ति और स्टोरेज व्यवस्था की जरूरत होती है। ऐसे में बड़े स्तर पर बसों का संचालन शुरू करने से पहले बुनियादी ढांचे को मजबूत करना आवश्यक होगा।

नोएडा में ट्रायल के दौरान कम यात्री मिलने की वजह पर भी गौर किया जाना जरूरी है। अगर बस का रूट यात्रियों की रोजमर्रा की जरूरत वाले प्रमुख इलाकों, मेट्रो स्टेशन, बाजार, औद्योगिक क्षेत्रों और आवासीय सेक्टरों को पर्याप्त रूप से कवर नहीं करता, तो नई बस सेवा को अपेक्षित यात्री नहीं मिल पाते। इसलिए भविष्य में इस तरह की बसों को दोबारा चलाने की योजना बनती है तो रूट और टाइमिंग का निर्धारण यात्री मांग के आधार पर करना महत्वपूर्ण होगा।

इसके अलावा किराया भी यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण factor होता है। आम यात्री किसी भी नई परिवहन सेवा का इस्तेमाल तभी ज्यादा करता है, जब वह सुविधाजनक होने के साथ-साथ किफायती भी हो। यदि संचालन लागत ज्यादा है और उसी के अनुरूप किराया बढ़ाना पड़ता है, तो यात्रियों को आकर्षित करना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में सरकार और परिवहन एजेंसियों के सामने तकनीक को बढ़ावा देने और यात्रियों के लिए सेवा को किफायती बनाए रखने के बीच संतुलन कायम करने की चुनौती होगी।

हाइड्रोजन बसों के ट्रायल का एक बड़ा उद्देश्य यह भी था कि भविष्य में प्रदूषण कम करने वाले सार्वजनिक परिवहन विकल्पों को बढ़ावा दिया जा सके। नोएडा और आसपास के एनसीआर क्षेत्र में वाहनों की संख्या लगातार बढ़ने के कारण प्रदूषण और ट्रैफिक दोनों बड़ी समस्याएं हैं। ऐसे में स्वच्छ ईंधन से चलने वाले सार्वजनिक परिवहन की जरूरत बनी हुई है। लेकिन इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए केवल नई तकनीक उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। उसका आर्थिक रूप से टिकाऊ होना और यात्रियों के लिए उपयोगी साबित होना भी उतना ही जरूरी है।

18 दिन के ट्रायल से मिले अनुभव को इसी नजरिए से देखा जा रहा है। कम यात्री संख्या और ज्यादा खर्च ने फिलहाल हाइड्रोजन बसों के नियमित संचालन की राह में चुनौती पैदा की है। अब ट्रायल से मिले आंकड़ों और अनुभव के आधार पर यह समझने की कोशिश की जा सकती है कि भविष्य में ऐसी बसों को किस रूट पर, कितनी संख्या में और किस मॉडल के तहत चलाया जाए, ताकि संचालन लागत कम हो और यात्रियों की संख्या बढ़ाई जा सके।

नोएडा में हाइड्रोजन बसों का ट्रायल बंद होने के बाद पर्यावरण-अनुकूल सार्वजनिक परिवहन को लेकर बहस भी महत्वपूर्ण हो जाती है। आने वाले समय में शहरों को डीजल आधारित परिवहन से धीरे-धीरे स्वच्छ ऊर्जा आधारित परिवहन की ओर बढ़ना है। इसके लिए इलेक्ट्रिक, हाइड्रोजन और अन्य वैकल्पिक ईंधन तकनीकों के विकल्प मौजूद हैं। लेकिन हर तकनीक की अपनी लागत और बुनियादी ढांचे की जरूरत है।

ऐसे में नोएडा का यह ट्रायल एक महत्वपूर्ण अनुभव माना जा सकता है। इससे यह संकेत मिलता है कि किसी नई परिवहन तकनीक को लागू करने से पहले तकनीकी क्षमता के साथ-साथ उसकी आर्थिक व्यवहारिकता और वास्तविक यात्री मांग का आकलन करना भी जरूरी है। फिलहाल 18 दिन में ट्रायल बंद होने की मुख्य वजह कम सवारी और ज्यादा संचालन खर्च सामने आई है। भविष्य में यदि बेहतर रूट, पर्याप्त यात्री और कम लागत वाला मॉडल तैयार किया जाता है, तो हाइड्रोजन बसों जैसी तकनीक को दोबारा बड़े स्तर पर आजमाया जा सकता है।

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