वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ते तनाव के बीच भारत के तेल आयात पैटर्न में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार फरवरी 2026 में इराक भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा, जबकि रूस दूसरे स्थान पर चला गया।
बिजनेस न्यूज़: भारत के तेल आयात में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। फरवरी महीने में रूस को पीछे छोड़ते हुए इराक भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया। यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई से जुड़ी अनिश्चितता बढ़ी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार फरवरी में रूस से भारत का तेल आयात लगभग 32 प्रतिशत तक घट गया और यह घटकर करीब 10 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। वहीं इराक से आयात बढ़ने के कारण वह महीने भर के लिए भारत का सबसे बड़ा सप्लायर बन गया।
फरवरी में इराक बना भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर
फरवरी 2026 के दौरान भारत ने रूस से तेल आयात में कमी दर्ज की, जबकि इराक से आयात में बढ़ोतरी हुई। रिपोर्ट के अनुसार रूस से तेल आयात लगभग 32 प्रतिशत घटकर करीब 10 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। वहीं इराक से आयात बढ़कर लगभग 11.8 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया, जिससे वह भारत का सबसे बड़ा सप्लायर बन गया।
सऊदी अरब से भी तेल आयात बढ़कर लगभग 9.98 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया। इन बदलावों के साथ भारत के कुल तेल आयात में मध्य पूर्व की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 59 प्रतिशत हो गई। इस दौरान ब्राजील भी भारत के प्रमुख सप्लायर देशों में शामिल होकर चौथे स्थान पर पहुंच गया।

फिर बढ़ सकता है रूस से तेल आयात
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि मार्च 2026 में रूस से तेल आयात फिर बढ़ सकता है। अनुमान है कि यह बढ़कर 18 से 22 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है। इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलसंधि में जहाज़ों की आवाजाही प्रभावित होने से सप्लाई पर दबाव पड़ा है। ऐसे में भारत स्थिर और सस्ती सप्लाई के लिए रूस की ओर फिर से रुख कर सकता है।
इसके अलावा अमेरिका ने 6 मार्च को भारत के लिए रूसी तेल से जुड़े कुछ प्रतिबंधों में आंशिक छूट दी, जिससे आयात बढ़ने की संभावना और मजबूत हो गई है। कम कीमत और लगातार सप्लाई के कारण रूस भारत की ऊर्जा रणनीति में अब भी अहम भूमिका निभा रहा है।
180 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है कच्चा तेल
सऊदी अरब के अधिकारियों ने आशंका जताई है कि यदि ईरान से जुड़ा संघर्ष और ऊर्जा संकट अप्रैल के अंत तक जारी रहता है, तो कच्चे तेल की कीमत 180 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती है। एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के कारण तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही है, जिससे बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है।
मध्य पूर्व क्षेत्र में बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। इस स्थिति ने तेल उत्पादक देशों के साथ-साथ आयात करने वाले देशों की चिंता भी बढ़ा दी है। हालांकि हाल के कारोबारी सत्र में तेल की कीमतों में हल्की गिरावट भी देखी गई। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने सप्लाई संकट को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए, जिसके बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 1 प्रतिशत से अधिक गिरकर लगभग 107 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई।









