पासपोर्ट विवाद: असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र सरकार पर उठाए सवाल, कहा- ‘नागरिकता साबित करने के नियम स्पष्ट हों’

Passport विवाद पर असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि नागरिकता साबित करने के नियम स्पष्ट होने चाहिए। जानें पूरा मामला और राजनीतिक

विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी द्वारा पासपोर्ट को “केवल यात्रा दस्तावेज” बताए जाने वाले बयान ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए Asaduddin Owaisi ने गुरुवार को हैदराबाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर केंद्र सरकार पर निशाना साधा और नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों को लेकर कई सवाल उठाए।

हैदराबाद: भारत में पासपोर्ट और नागरिकता को लेकर नई बहस छिड़ गई है। विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी द्वारा हाल ही में दिए गए उस बयान के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है, जिसमें कहा गया था कि पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज (Travel Document) है और इसे अकेले नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र सरकार से नागरिकता संबंधी नियमों को स्पष्ट करने की मांग की है।

हैदराबाद में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ओवैसी ने कहा कि यदि पासपोर्ट, आधार कार्ड, वोटर आईडी और जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज भी नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माने जाते, तो सरकार को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि नागरिकता के प्रमाण के लिए कौन-से दस्तावेज मान्य होंगे।

पासपोर्ट विवाद कैसे शुरू हुआ?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि पासपोर्ट का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय यात्रा को सुगम बनाना है। अधिकारी के अनुसार, पासपोर्ट नागरिकता से जुड़ा महत्वपूर्ण दस्तावेज जरूर है, लेकिन कानूनी दृष्टि से इसे अकेले नागरिकता का अंतिम और पूर्ण प्रमाण नहीं माना जा सकता।

इस बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में बहस शुरू हो गई। कई लोगों ने सवाल उठाया कि यदि भारतीय पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को जारी किया जाता है, तो फिर इसे नागरिकता का प्रमाण क्यों नहीं माना जाए।

ओवैसी ने क्या कहा?

पासपोर्ट विवाद: असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र सरकार पर उठाए सवाल, कहा- ‘नागरिकता साबित करने के नियम स्पष्ट हों’

प्रेस कॉन्फ्रेंस में ओवैसी ने कहा कि नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों को लेकर लोगों में भ्रम पैदा नहीं होना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि पासपोर्ट, जन्म प्रमाणपत्र, आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र भी पर्याप्त नहीं हैं, तो नागरिकों को अपनी पहचान साबित करने के लिए और क्या प्रस्तुत करना होगा।उन्होंने यह भी कहा कि नागरिकता जैसे संवेदनशील विषय पर सरकार को स्पष्ट और पारदर्शी नीति अपनानी चाहिए ताकि आम लोगों में किसी प्रकार की असमंजस की स्थिति न बने।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय पासपोर्ट आमतौर पर भारतीय नागरिकों को जारी किया जाता है। हालांकि, कानूनी प्रावधानों के तहत कुछ विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी सीमित प्रकार के यात्रा दस्तावेज जारी किए जा सकते हैं। पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और संबंधित नियमों के अनुसार कुछ मामलों में पहचान प्रमाणपत्र (Identity Certificate) या विशेष यात्रा दस्तावेज जारी किए जा सकते हैं। इसी कानूनी आधार पर अदालतों ने अतीत में यह टिप्पणी की है कि केवल पासपोर्ट का होना नागरिकता का अंतिम और निर्विवाद प्रमाण नहीं माना जा सकता।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम और उससे जुड़े दस्तावेजों के आधार पर किया जाता है। अलग-अलग सरकारी प्रक्रियाओं में विभिन्न दस्तावेजों का उपयोग किया जाता है और किसी एक दस्तावेज को हर परिस्थिति में अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और व्यापक बहस

इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने सरकार से नागरिकता संबंधी प्रक्रियाओं को और स्पष्ट बनाने की मांग की है। वहीं, सरकार समर्थक पक्ष का कहना है कि अधिकारी का बयान केवल कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए था और इसे राजनीतिक विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।

विश्लेषकों का मानना है कि नागरिकता और पहचान से जुड़े मुद्दे हमेशा संवेदनशील रहे हैं। ऐसे मामलों में स्पष्ट सरकारी संचार और जन-जागरूकता बेहद महत्वपूर्ण होती है ताकि किसी प्रकार की गलतफहमी न फैले।

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