पटना। दुर्गा पूजा के समापन के साथ ही बिहार में मां दुर्गा की विदाई का भावुक दृश्य देखने को मिला। पूजा पंडालों में श्रद्धालुओं ने पूरे भक्तिभाव के साथ मां को अंतिम प्रणाम किया और अगले वर्ष फिर से आने की प्रार्थना की। विदाई के मौके पर महिलाओं ने सिंदूर खेला की परंपरा निभाई। इस दौरान पूजा पंडालों में उत्साह, आस्था और भावुकता का मिला-जुला माहौल रहा। मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन की तैयारी के बीच श्रद्धालु एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं देते नजर आए। कई महिलाओं के लिए यह पल खास रहा, क्योंकि कई दिनों तक पूजा-अर्चना, भजन और उत्सव में शामिल रहने के बाद अब मां को विदा करने का समय आ गया था।
सिंदूर खेला दुर्गा पूजा के अंतिम दिन से जुड़ी एक पारंपरिक रस्म है। इसमें महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं। इस परंपरा के दौरान महिलाएं मां से अपने परिवार की रक्षा करने और जीवन में सुख-शांति बनाए रखने की प्रार्थना करती हैं। रस्म पूरी होने के बाद मां दुर्गा को विदाई दी जाती है। इस अवसर पर पूजा पंडालों में मौजूद महिलाओं के चेहरे पर जहां त्योहार पूरा होने की खुशी दिखाई देती है, वहीं मां की विदाई को लेकर भावुकता भी नजर आती है।
बक्सर में मां दुर्गा की प्रतिमा को भक्तों के कंधों पर लेकर विसर्जन के लिए निकाला गया। श्रद्धालु पूरे उत्साह और भक्ति के साथ शोभायात्रा में शामिल हुए। मां के जयकारों के बीच प्रतिमा को विदाई दी गई। इस दौरान भक्तों ने मां दुर्गा से अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना की। प्रतिमा विसर्जन की परंपरा में शामिल लोगों के लिए यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था और भावनाओं से जुड़ा अवसर भी रहा। पूजा के दिनों में मां के दर्शन करने और पंडालों में समय बिताने वाले श्रद्धालुओं के लिए विदाई का क्षण विशेष महत्व रखता है।
महिलाओं ने बताया कि मां दुर्गा की विदाई के समय मन भावुक हो जाता है। पूरे उत्साह से मनाए गए पर्व के बाद जब प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है, तो ऐसा लगता है जैसे परिवार का कोई अपना विदा हो रहा हो। इसी भावना के साथ महिलाएं मां को सिंदूर अर्पित करती हैं और अगले वर्ष दोबारा आगमन की कामना करती हैं। दुर्गा पूजा के दौरान घरों और पंडालों में स्थापित मां की प्रतिमा के सामने श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं रखते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। विदाई के समय वे मां से आशीर्वाद लेकर नए उत्साह के साथ अपने दैनिक जीवन में लौटने की तैयारी करते हैं।
दुर्गा पूजा का समापन बिहार के अनेक इलाकों में धार्मिक अनुष्ठानों, प्रतिमा विसर्जन और सामूहिक भागीदारी के साथ होता है। सिंदूर खेला जैसी परंपराएं इस पर्व की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती हैं। मां दुर्गा की विदाई के दौरान भक्तों की भागीदारी और महिलाओं की भावनाएं यह बताती हैं कि यह त्योहार केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार, समाज और परंपरा को जोड़ने वाला अवसर भी है। श्रद्धालु मां दुर्गा से सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हुए अगले वर्ष फिर से इसी उत्साह के साथ पूजा मनाने की उम्मीद रखते हैं।









