पोलैंड की राजनेता मरिआना श्राइबर ने सोशल मीडिया पर यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की तस्वीर कूड़ेदान में फेंकते हुए द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलिश नागरिकों के नरसंहार से जुड़े विवादित राष्ट्रवादी संगठनों का महिमामंडन करने का आरोप लगाया।
वारसा: पोलैंड और यूक्रेन के बीच द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़े ऐतिहासिक विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं। पोलैंड की राजनेता और क्राकोव के मेयर पद की उम्मीदवार मरिआना श्राइबर ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की तस्वीर कूड़ेदान में फेंक दी। वीडियो में तस्वीर पर हिटलर जैसी मूंछ बनाई गई थी, जिसके बाद उन्होंने कहा कि "अपराधियों का महिमामंडन करने वालों की जगह इतिहास के कूड़ेदान में है।"
इस वीडियो ने पोलैंड और यूक्रेन के बीच पहले से मौजूद ऐतिहासिक मतभेदों को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। हालांकि, यह श्राइबर का राजनीतिक बयान है और इस पर यूक्रेनी सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
वीडियो में लगाए गंभीर आरोप
मरिआना श्राइबर ने अपने वीडियो संदेश में आरोप लगाया कि यूक्रेन अब भी उन राष्ट्रवादी संगठनों और नेताओं का सम्मान करता है, जिन्हें पोलैंड द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलिश नागरिकों के नरसंहार के लिए जिम्मेदार मानता है।
उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों का महिमामंडन स्वीकार्य नहीं है और इतिहास में हुए अत्याचारों को भुलाया नहीं जा सकता। वीडियो में उन्होंने जेलेंस्की की तस्वीर को मोड़कर कूड़ेदान में डालते हुए कहा कि जो लोग अपराधियों का सम्मान करते हैं, उन्हें इतिहास में सम्मान नहीं मिलना चाहिए।
बांदेरा और UPA को लेकर पुराना विवाद
श्राइबर की टिप्पणी का केंद्र यूक्रेनी राष्ट्रवादी नेता स्टेपन बांदेरा और यूक्रेनी विद्रोही सेना (UPA) रहे। पोलैंड का आरोप है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान UPA ने वोल्हीनिया और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पोलिश नागरिकों की हत्या की थी।
पोलैंड इन घटनाओं को नरसंहार मानता है, जबकि यूक्रेन में कुछ वर्ग बांदेरा और UPA को सोवियत और नाजी कब्जे के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतीक के रूप में देखते हैं। यही ऐतिहासिक मतभेद दोनों देशों के बीच लंबे समय से विवाद का कारण रहे हैं।
'ब्लडी संडे' की बरसी पर दिया बयान
श्राइबर का यह बयान 11 जुलाई 1943 की घटना, जिसे पोलैंड में 'ब्लडी संडे' कहा जाता है, की बरसी पर आया।
पोलिश इतिहासकारों के अनुसार उस दिन UPA ने वोल्हीनिया क्षेत्र के कई पोलिश गांवों पर एक साथ हमले किए थे। पोलैंड का दावा है कि 1943 और 1944 के दौरान इन हमलों में लगभग एक लाख पोलिश नागरिक मारे गए।
दूसरी ओर, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उस दौर में दोनों समुदायों के बीच हिंसा हुई थी और घटनाओं की ऐतिहासिक व्याख्या को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं।
यूक्रेन से माफी की मांग
मरिआना श्राइबर ने अपने बयान में कहा कि यूक्रेन ने अब तक इन घटनाओं के लिए पोलैंड से औपचारिक माफी नहीं मांगी है। उनका कहना है कि जब तक ऐतिहासिक घटनाओं को स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक दोनों देशों के बीच वास्तविक मेल-मिलाप संभव नहीं होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि युद्धकालीन अत्याचारों के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों को राष्ट्रीय नायक के रूप में प्रस्तुत करना पीड़ित परिवारों के प्रति अन्याय है।
इतिहास और वर्तमान संबंधों के बीच संतुलन
पोलैंड और यूक्रेन हाल के वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान सुरक्षा और मानवीय सहयोग के मुद्दों पर करीब आए हैं। पोलैंड ने यूक्रेन को शरणार्थियों, सैन्य सहायता और कूटनीतिक समर्थन प्रदान किया है।
इसके बावजूद द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़े ऐतिहासिक विवाद समय-समय पर दोनों देशों के राजनीतिक और सामाजिक संबंधों में तनाव पैदा करते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान रणनीतिक सहयोग और ऐतिहासिक मतभेद दोनों समानांतर रूप से मौजूद हैं।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
श्राइबर का वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने उनके बयान का समर्थन करते हुए ऐतिहासिक न्याय की मांग दोहराई, जबकि कई लोगों ने इसे वर्तमान राजनीतिक माहौल में अनावश्यक रूप से तनाव बढ़ाने वाला कदम बताया।
वीडियो के कारण पोलैंड और यूक्रेन के संबंधों पर नई बहस शुरू हो गई है, हालांकि दोनों देशों की सरकारों ने इस विषय पर आधिकारिक स्तर पर कोई संयुक्त प्रतिक्रिया जारी नहीं की है।
राजनीतिक बयान और चुनावी संदर्भ
मरिआना श्राइबर पोलैंड की राजनीति में अपनी मुखर शैली के लिए जानी जाती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनका यह बयान घरेलू राजनीतिक संदर्भ और ऐतिहासिक मुद्दों को लेकर मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचाने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे संवेदनशील ऐतिहासिक मुद्दों पर दिए गए बयान दोनों देशों के बीच चल रहे कूटनीतिक प्रयासों को प्रभावित कर सकते हैं।










