पश्चिम बंगाल में सरकारी योजनाओं में कथित कट-मनी और अनियमितताओं को लेकर विवाद बढ़ गया है। कई जगह TMC नेताओं पर रिश्वत लेने के आरोप लगे हैं, जबकि कुछ नेताओं द्वारा ग्रामीणों को पैसे लौटाने के दावे भी सामने आए हैं।
कोलकाता: भारत के पूर्वी राज्य पश्चिम बंगाल में सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े कथित भ्रष्टाचार और ‘कट-मनी’ विवाद ने एक बार फिर राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है। राज्य के कई जिलों से ऐसी रिपोर्टें सामने आई हैं, जिनमें स्थानीय राजनीतिक नेताओं और पंचायत प्रतिनिधियों पर सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के बदले लोगों से पैसे वसूलने के आरोप लगाए गए हैं।
हाल के दिनों में कुछ स्थानों पर कथित रूप से वसूली गई रकम लाभार्थियों को लौटाए जाने की घटनाएं भी सामने आई हैं। इन घटनाओं ने राज्य में कल्याणकारी योजनाओं की पारदर्शिता, प्रशासनिक निगरानी और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
क्या है ‘कट-मनी’ विवाद?
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘कट-मनी’ शब्द लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। इसका उपयोग उन आरोपों के लिए किया जाता है, जिनमें कहा जाता है कि सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के बदले कुछ स्थानीय नेता या मध्यस्थ लाभार्थियों से कमीशन या रिश्वत की मांग करते हैं।
हालांकि सत्तारूढ़ दल लगातार ऐसे आरोपों से इनकार करता रहा है, लेकिन समय-समय पर विभिन्न जिलों से शिकायतें सामने आती रही हैं। अब हालिया घटनाओं ने इस मुद्दे को फिर से राजनीतिक केंद्र में ला खड़ा किया है।
कूचबिहार में कथित रूप से लौटाए गए पैसे
राज्य के कूचबिहार जिले में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जहां लाभार्थियों को कथित तौर पर पहले लिए गए पैसे वापस किए गए। स्थानीय स्तर पर यह दावा किया गया कि कुछ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से लोगों को बुलाकर राशि लौटाई और भविष्य में ऐसी घटनाएं न दोहराने का आश्वासन दिया।
स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, कुछ मामलों में सार्वजनिक घोषणाओं के जरिए ग्रामीणों को बुलाया गया और उनके द्वारा दिए गए पैसे वापस किए गए। सोशल मीडिया पर भी ऐसे वीडियो प्रसारित हुए हैं, जिनमें लोगों को नकद राशि लौटाते हुए दिखाया गया है। हालांकि इन वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है।
विश्लेषकों का मानना है कि इन घटनाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर लोगों की चिंताओं को उजागर किया है।
मुर्शिदाबाद में रिश्वत लेने के आरोप में कार्रवाई
राज्य के मुर्शिदाबाद जिले में एक ग्राम पंचायत प्रतिनिधि के खिलाफ आवास योजना से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों ने शिकायत दर्ज कराई कि लाभार्थियों से घर स्वीकृत कराने के नाम पर हजारों रुपये वसूले गए।
शिकायत के बाद पुलिस ने जांच शुरू की और संबंधित पंचायत पदाधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की गई। ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी सहायता प्राप्त करने के लिए उनसे अलग-अलग रकम मांगी जाती थी।
यह मामला राज्य में चल रही व्यापक जांच और निगरानी की प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है।
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दक्षिण 24 परगना में पंचायत सदस्य ने लौटाए पैसे
दक्षिण 24 परगना जिले के नामखाना क्षेत्र में भी एक पंचायत सदस्य द्वारा कथित रूप से लाभार्थियों को पैसे लौटाने का मामला सामने आया है।
स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, संबंधित पंचायत प्रतिनिधि ने कई ग्रामीणों को राशि वापस करने के बाद सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी। उन्होंने दावा किया कि धनराशि लेने के पीछे स्थानीय राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव था।
हालांकि इस मामले में अब तक कोई औपचारिक पुलिस शिकायत दर्ज नहीं हुई है, लेकिन घटना ने प्रशासनिक प्रक्रियाओं और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
लक्ष्मीर भंडार योजना में कथित अनियमितताएं
विवाद केवल आवास योजनाओं तक सीमित नहीं है। राज्य की लोकप्रिय सामाजिक सहायता योजना ‘लक्ष्मीर भंडार’ भी जांच के दायरे में आ गई है।
नादिया जिले में अधिकारियों को लाभार्थियों की सूची में बड़ी संख्या में पुरुषों के नाम मिलने का दावा किया गया है, जबकि यह योजना मुख्य रूप से महिलाओं को आर्थिक सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी।
प्रशासनिक जांच के दौरान कथित रूप से 173 ऐसे नाम चिन्हित किए गए, जिन्हें नियमों के अनुसार पात्र नहीं माना गया। अधिकारियों ने बताया कि सत्यापन प्रक्रिया के बाद इन नामों को सूची से हटाने की कार्रवाई की गई है।
इस घटना ने राज्य की लाभार्थी पहचान प्रणाली और डेटा सत्यापन तंत्र पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
फर्जी लाभार्थियों को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप
विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि राज्य की कई सामाजिक योजनाओं में बड़ी संख्या में फर्जी लाभार्थी शामिल हो सकते हैं। विपक्ष का दावा है कि सरकारी धन के वितरण में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
दूसरी ओर, राज्य सरकार का कहना है कि यदि कहीं गड़बड़ी पाई जाती है तो उसे सुधारने के लिए प्रशासनिक कार्रवाई की जा रही है। सरकार का दावा है कि अधिकांश लाभार्थी वास्तविक हैं और योजनाओं का लाभ लाखों जरूरतमंद परिवारों तक पहुंच रहा है।
जांच के लिए आयोग का गठन
बढ़ते विवादों के बीच राज्य सरकार ने वित्तीय अनियमितताओं, सरकारी धन के कथित दुरुपयोग और ‘कट-मनी’ संबंधी शिकायतों की जांच के लिए एक विशेष आयोग का गठन किया है।
इस आयोग का नेतृत्व एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को सौंपा गया है। आयोग का उद्देश्य नागरिकों को शिकायत दर्ज कराने का एक औपचारिक मंच उपलब्ध कराना और आरोपों की स्वतंत्र जांच सुनिश्चित करना है।
सरकार का मानना है कि इससे लोगों का भरोसा बढ़ेगा और यदि कहीं भ्रष्टाचार हुआ है तो उसकी पहचान कर उचित कार्रवाई की जा सकेगी।
भाजपा और तृणमूल कांग्रेस आमने-सामने
इस पूरे मुद्दे पर राज्य की राजनीति भी गरमा गई है। विपक्षी दल भाजपा ने आरोप लगाया है कि कई ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों पर सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए पैसे देने का दबाव बनाया जाता था।
वहीं सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि पार्टी का किसी भी प्रकार की अवैध वसूली से कोई संबंध नहीं है। पार्टी का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति व्यक्तिगत स्तर पर गलत कार्य करता है तो उसे कानून के अनुसार जवाब देना होगा।










