राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में “100 वर्ष की संघ यात्रा– नए क्षितिज, नए आयाम” विषय पर आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी एवं संवाद कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने मार्गदर्शन से सभा को संबोधित किया।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित विशेष कार्यक्रम में संघ प्रमुख Mohan Bhagwat ने भारत की वैश्विक भूमिका, तकनीक के उपयोग, महिला भागीदारी और समाज निर्माण जैसे विषयों पर व्यापक विचार रखे। “100 वर्ष की संघ यात्रा—नए क्षितिज, नए आयाम” विषय पर आयोजित यह संवाद कार्यक्रम देहरादून स्थित Himalayan Cultural Center में हुआ, जहां सामाजिक, सांस्कृतिक और सार्वजनिक जीवन से जुड़े कई प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
संघ की किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं - मोहन भागवत
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ का उद्देश्य किसी से प्रतिस्पर्धा करना नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण है। उन्होंने कहा कि यदि राष्ट्र सशक्त होगा तो उसके नागरिक भी सशक्त होंगे। कमजोर राष्ट्र में व्यक्ति भी सुरक्षित नहीं रह सकता। इसलिए संघ व्यक्ति निर्माण पर बल देता है, क्योंकि मजबूत व्यक्तित्व से ही सुदृढ़ समाज और राष्ट्र का निर्माण संभव है।
उन्होंने कहा कि संघ का कार्य दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्तन से जुड़ा है, जहां पहचान या प्रसिद्धि से अधिक महत्व कर्तव्य और सेवा का है। कई स्वयंसेवक दशकों तक काम करते हैं, लेकिन व्यक्तिगत पहचान की अपेक्षा नहीं रखते।
भारत से वैश्विक नेतृत्व की अपेक्षा
भागवत ने कहा कि लंबे ऐतिहासिक कालखंड के बाद आज विश्व समुदाय भारत को फिर से नेतृत्वकारी भूमिका में देखने की आशा कर रहा है। उन्होंने इसे अवसर और जिम्मेदारी दोनों बताया। उनके अनुसार, भारत को अपनी सांस्कृतिक विरासत, नैतिक मूल्यों और सामाजिक समरसता के आधार पर वैश्विक मंच पर योगदान देना चाहिए।
उन्होंने “पंच परिवर्तन” जैसे सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए समाज से सकारात्मक बदलाव का आह्वान किया। उनका कहना था कि सामाजिक कुरीतियों और भेदभाव की जड़ व्यवस्था से अधिक मन में होती है। अंधकार को हटाने के लिए प्रकाश जलाना आवश्यक है—अर्थात व्यवहारिक परिवर्तन ही स्थायी समाधान है।
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तकनीक पर स्पष्ट संदेश: साधन है, साध्य नहीं
डिजिटल युग और तकनीकी प्रगति पर बोलते हुए भागवत ने कहा कि तकनीक मानव जीवन को सुगम बनाने का साधन है, लेकिन इसे अंतिम लक्ष्य नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि तकनीक के लिए मनुष्य की बलि नहीं दी जा सकती। उनके अनुसार, परिवार और समाज में आत्मीयता, संवाद और समय की भूमिका अहम है। यदि तकनीक इन मूल्यों को कमजोर करती है, तो उसका उपयोग संयम और अनुशासन के साथ पुनर्विचार योग्य है। उन्होंने कहा कि प्रगति का अर्थ मानवीय संवेदनाओं का ह्रास नहीं होना चाहिए।
संघ प्रमुख ने महिलाओं की भूमिका पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि महिलाएं पूर्णतः स्वतंत्र हैं और देश संचालन में उनकी भागीदारी 33 प्रतिशत ही नहीं, बल्कि 50 प्रतिशत तक होनी चाहिए। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि विभिन्न कठिन कालखंडों में महिलाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनका मानना है कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में महिलाओं की समान भागीदारी अनिवार्य है और सामाजिक संरचना को इस दिशा में सकारात्मक रूप से आगे बढ़ना चाहिए।
भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में शामिल नहीं है और उसका कार्य व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज उत्थान करना है। उन्होंने कहा कि जो समाज को जोड़ने का कार्य करे, वही व्यापक अर्थ में हिंदू है। मातृभूमि के प्रति समर्पण और सामाजिक समरसता को उन्होंने अनिवार्य बताया।









