RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि सरसंघचालक बनने के लिए जाति कोई योग्यता नहीं है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या SC ST वर्ग से आने वाला कोई भी हिंदू संघ का नेतृत्व कर सकता है।
New Delhi: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने संघ की विचारधारा और नेतृत्व चयन को लेकर एक बार फिर स्पष्ट और बेबाक बात कही है। मुंबई में RSS के 100 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित व्याख्यानमाला के दौरान उन्होंने कहा कि सरसंघचालक बनने के लिए ब्राह्मण होना कोई अनिवार्य योग्यता नहीं है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या एससी एसटी वर्ग से आने वाला कोई भी हिंदू RSS का सरसंघचालक बन सकता है।
शताब्दी समारोह में खुलकर बोले भागवत
RSS के शताब्दी समारोह के मौके पर जब मोहन भागवत से संगठन में जाति को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने बिना किसी झिझक के जवाब दिया। उन्होंने कहा कि संघ में पद किसी जाति के आधार पर नहीं मिलते। संघ में वही आगे बढ़ता है जो काम करता है, जो जिम्मेदारी निभाता है और जो संगठन के लिए समर्पित रहता है।
उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब अक्सर RSS पर एक खास वर्ग या जाति के वर्चस्व को लेकर सवाल उठते रहे हैं। मोहन भागवत ने इन सभी धारणाओं को सिरे से खारिज करते हुए संगठन की कार्यप्रणाली को विस्तार से समझाया।
“केवल हिंदू होना ही योग्यता है”
मोहन भागवत ने कहा कि संघ में सरसंघचालक बनने की एकमात्र पहचान यह है कि वह व्यक्ति हिंदू हो। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र जैसे वर्गों में संघ नेतृत्व को बांटना संघ की सोच के खिलाफ है। उन्होंने साफ कहा कि SC ST वर्ग से आने वाला व्यक्ति भी पूरी योग्यता के साथ सरसंघचालक बन सकता है।
उनके शब्दों में, संघ में यह कभी नहीं देखा जाता कि व्यक्ति किस जाति से आता है। देखा जाता है कि उसने कितना काम किया है, कितनी निष्ठा से संगठन को आगे बढ़ाया है और समाज के लिए उसका योगदान क्या रहा है।
संघ की शुरुआत और ब्राह्मण नेतृत्व की सच्चाई
मोहन भागवत ने संघ के शुरुआती दौर की पृष्ठभूमि भी साझा की। उन्होंने बताया कि जब RSS की स्थापना हुई थी, तब संगठन बहुत छोटा था और एक सीमित क्षेत्र में काम कर रहा था। उस समय संघ का काम एक ब्राह्मण बस्ती से शुरू हुआ था, इसलिए स्वाभाविक रूप से शुरुआती पदाधिकारी ब्राह्मण समुदाय से ही थे।
उन्होंने कहा कि इसी वजह से लोगों के मन में यह धारणा बनी कि संघ सिर्फ ब्राह्मणों का संगठन है। आज भी कुछ लोग इसी नजरिए से संघ को देखते हैं और कहते हैं कि संघ ब्राह्मणों का ही है। लेकिन यह धारणा पूरी तरह गलत है।
समय के साथ बदला संघ का स्वरूप

RSS प्रमुख ने आगे कहा कि संघ अब उस शुरुआती दौर से बहुत आगे निकल चुका है। आज संघ एक व्यापक सामाजिक संगठन बन चुका है, जो पूरे देश में फैला हुआ है। अब संघ का विस्तार जाति के आधार पर नहीं, बल्कि भौगोलिक आधार पर किया जाता है।
उन्होंने बताया कि संघ का काम इस तरह फैलाया जाता है कि हर बस्ती, हर गांव और हर शहर तक उसकी पहुंच हो। शहरों में 10 हजार की आबादी वाले क्षेत्रों में काम होता है और गांवों में 10 से 12 गांवों के समूह बनाकर मंडल स्तर पर गतिविधियां चलाई जाती हैं।
भौगोलिक विस्तार से सभी जातियों की भागीदारी
मोहन भागवत ने समझाया कि जब संगठन भौगोलिक रूप से फैलता है, तो अपने आप सभी जातियों और वर्गों के लोग उससे जुड़ते हैं। किसी को विशेष रूप से बुलाया नहीं जाता और न ही किसी को बाहर रखा जाता है। हर बस्ती में काम होता है और वहां रहने वाले सभी समुदायों के लोग संघ से जुड़ते हैं।
उन्होंने कहा कि यही वजह है कि आज संघ में सभी जातियों का प्रतिनिधित्व देखने को मिलता है। यह कोई बनावटी व्यवस्था नहीं, बल्कि संगठन के स्वाभाविक विकास का परिणाम है।
अखिल भारतीय स्तर पर भी जातिगत विविधता
RSS प्रमुख ने यह भी कहा कि अगर आज संघ के अखिल भारतीय स्तर के पदाधिकारियों को देखा जाए, तो वहां किसी एक जाति का वर्चस्व नहीं है। अलग अलग सामाजिक पृष्ठभूमि से आए लोग अलग अलग जिम्मेदारियां निभा रहे हैं।
उन्होंने इसे संघ की सबसे बड़ी ताकत बताया और कहा कि यह विविधता संघ को मजबूत बनाती है। संघ किसी जाति विशेष का संगठन नहीं, बल्कि पूरे हिंदू समाज का संगठन है।
“SC ST होना अयोग्यता नहीं”
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में एक बेहद अहम बात कही। उन्होंने कहा कि SC ST वर्ग से आना किसी भी तरह की अयोग्यता नहीं है। उसी तरह ब्राह्मण होना कोई अतिरिक्त योग्यता नहीं देता।
उनके मुताबिक, संघ में हर व्यक्ति को समान अवसर मिलता है। जो जितना काम करता है, जो जितनी जिम्मेदारी निभाता है, वही आगे बढ़ता है। संघ में नेतृत्व सेवा और समर्पण से तय होता है, न कि जन्म से।
जाति आधारित राजनीति से अलग संघ की सोच
मोहन भागवत का यह बयान मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक माहौल में भी अहम माना जा रहा है। देश में अक्सर जाति आधारित राजनीति और पहचान की चर्चा होती रहती है। ऐसे में RSS प्रमुख का यह कहना कि संगठन में जाति नहीं, बल्कि काम देखा जाता है, संघ की विचारधारा को स्पष्ट करता है।
अपने बयान में मोहन भागवत ने बार बार संघ की कार्यसंस्कृति पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संघ में कोई नियुक्ति ऊपर से थोपकर नहीं की जाती। कार्यकर्ता अपने काम के जरिए आगे बढ़ता है और जिम्मेदारी संभालता है।









