जातिगत जनगणना पर स्टालिन की केंद्र को चेतावनी, बोले- खुले फॉर्मेट से आंकड़ों में बड़ी गड़बड़ी का खतरा

एमके स्टालिन ने जनगणना 2027 में जातिगत आंकड़ों के खुले फॉर्मेट पर सवाल उठाए। उन्होंने मानकीकृत सूची और तमिलनाडु विधानसभा में विशेष प्रस्ताव की मांग की।

डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने जनगणना 2027 में जातिगत आंकड़े दर्ज करने के प्रस्तावित खुले फॉर्मेट पर चिंता जताई है। उन्होंने केंद्र से मानकीकृत जाति सूची अपनाने और तमिलनाडु सरकार से विधानसभा में विशेष प्रस्ताव पारित करने की मांग की।

चेन्नई: डीएमके अध्यक्ष और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने जनगणना 2027 में जातिगत विवरण दर्ज करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तावित खुले फॉर्मेट को लेकर निराशा जताई है। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि यदि जनगणना में जाति के नाम दर्ज करने के लिए गणनाकर्मियों को स्वतंत्र रूप से मैनुअल एंट्री करने की अनुमति दी गई, तो आंकड़ों में बड़े पैमाने पर विसंगतियां पैदा हो सकती हैं। स्टालिन ने केंद्र सरकार से जातिगत आंकड़े एकत्र करने की प्रक्रिया में तत्काल सुधार करने की मांग की। उन्होंने कहा कि जाति आधारित जनगणना का उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है, जब आंकड़े व्यवस्थित, सटीक और एक समान तरीके से एकत्र किए जाएं।

डीएमके प्रमुख ने तमिलनाडु सरकार से भी अपील की कि विधानसभा के मौजूदा सत्र में इस मुद्दे पर एक विशेष प्रस्ताव पारित किया जाए। उनके मुताबिक, इससे राज्य की जनता की भावनाओं को सामने रखने के साथ केंद्र सरकार पर आवश्यक दबाव बनाया जा सकेगा।

खुले फॉर्मेट को लेकर क्या है स्टालिन की आपत्ति?

स्टालिन ने एक बयान में कहा कि यदि गणनाकर्मियों को पहले से निर्धारित मानकीकृत सूची या ड्रॉप-डाउन विकल्प के बजाय जातियों के नाम मैन्युअल रूप से दर्ज करने की अनुमति दी जाती है, तो एक ही जाति के नाम अलग-अलग तरीके से दर्ज हो सकते हैं।

उनके अनुसार, नामों की वर्तनी, स्थानीय नाम, उपनाम या अलग-अलग प्रशासनिक वर्गीकरण के कारण एक ही समुदाय के लिए कई अलग-अलग प्रविष्टियां बन सकती हैं। इससे अंतिम आंकड़ों में गंभीर असमानता पैदा होने का खतरा है।

स्टालिन ने केंद्र सरकार के उस तर्क को भी अस्वीकार्य बताया, जिसमें कहा गया है कि अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी की सूची व्यक्तिगत जातियों के बजाय वर्गों पर आधारित है।

डीएमके अध्यक्ष का कहना है कि इस तरह की व्यवस्था जातिगत जनगणना के मूल उद्देश्य को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने केंद्र से राज्यों के साथ व्यापक परामर्श करने की मांग की है।

राज्यों की आधिकारिक BC और MBC सूची शामिल करने की मांग

स्टालिन ने केंद्र सरकार से सभी राज्य सरकारों के साथ विचार-विमर्श करने और उनके पास उपलब्ध आधिकारिक पिछड़ा वर्ग (BC) तथा अति पिछड़ा वर्ग (MBC) की सूचियां हासिल करने की अपील की।

उन्होंने कहा कि इन सूचियों को जनगणना की प्रणाली में मानकीकृत श्रेणियों के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, नागरिकों को पहले से स्थापित और आधिकारिक सूची में से अपनी संबंधित श्रेणी चुनने का विकल्प दिया जाना चाहिए।

स्टालिन का तर्क है कि ऐसा करने से जातिगत आंकड़े अधिक व्यवस्थित और विश्वसनीय तरीके से जुटाए जा सकेंगे। इसके विपरीत, खुले फॉर्मेट में जवाब दर्ज करने से आंकड़ों में अव्यवस्था पैदा हो सकती है।

उन्होंने दावा किया कि इस तरह की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप देश में कथित तौर पर 46 लाख अलग-अलग जातियों के अस्तित्व का 'गलत' संकेत तक मिल सकता है।

जातिगत जनगणना का उद्देश्य क्या है?

स्टालिन ने कहा कि जातिगत जनगणना का प्रमुख उद्देश्य ओबीसी समुदायों की वास्तविक जनसंख्या का पता लगाना और उनकी सामाजिक-आर्थिक तथा शैक्षणिक स्थिति का आकलन करना है।

उन्होंने इसकी तुलना अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) से संबंधित एकत्र किए जाने वाले आंकड़ों से की। उनके अनुसार, पिछड़े समुदायों से जुड़ी सटीक जानकारी सरकारों को आरक्षण नीतियों और विकास योजनाओं को प्रभावी ढंग से तैयार करने में मदद कर सकती है।

डीएमके अध्यक्ष ने सामाजिक न्याय से जुड़े अधिकारों की रक्षा के लिए जातिगत आंकड़ों की सटीकता को महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना है कि यदि विभिन्न समुदायों की जनसंख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति से संबंधित विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध होंगे, तो सरकारें लक्षित नीतियां और कल्याणकारी कार्यक्रम तैयार करने में बेहतर स्थिति में होंगी।

'12 हजार करोड़ रुपये का खर्च बेकार हो सकता है'

स्टालिन ने प्रस्तावित प्रक्रिया में सुधार नहीं किए जाने पर सार्वजनिक धन और सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाया।

उन्होंने कहा कि मौजूदा कथित रूप से त्रुटिपूर्ण पद्धति के साथ आगे बढ़ने पर लगभग 12,000 करोड़ रुपये का सार्वजनिक खर्च बेकार हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस पूरी प्रक्रिया में लाखों सरकारी कर्मचारियों की व्यापक मेहनत शामिल होगी।

डीएमके प्रमुख के मुताबिक, यदि आंकड़े ही विश्वसनीय तरीके से एकत्र नहीं किए गए, तो इतने बड़े स्तर पर किए जाने वाले जनगणना अभियान का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है। उन्होंने ऐसी स्थिति में पूरी कवायद को केवल औपचारिक प्रक्रिया बन जाने की आशंका जताई।

हालांकि, यह आकलन और आरोप स्टालिन की ओर से प्रस्तावित गणना पद्धति को लेकर व्यक्त की गई उनकी चिंताओं पर आधारित हैं।

केंद्र से तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने की मांग

एमके स्टालिन ने केंद्र सरकार से जातिगत विवरण दर्ज करने की प्रक्रिया में तत्काल सुधार करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय के अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए देश के पिछड़े और अति पिछड़े समुदायों से जुड़े आंकड़ों का सही तरीके से संकलन जरूरी है।

उन्होंने केंद्र से राज्यों की आधिकारिक सूचियों को ध्यान में रखते हुए एक समान और त्रुटिरहित प्रणाली तैयार करने का आग्रह किया। उनके मुताबिक, राज्यों से परामर्श के बिना तैयार की गई प्रक्रिया जमीनी स्तर पर मौजूद जातिगत वर्गीकरण की विविधता को सही तरीके से प्रतिबिंबित नहीं कर पाएगी।

तमिलनाडु सरकार से विशेष प्रस्ताव पारित करने की अपील

स्टालिन ने तमिलनाडु सरकार से विधानसभा के मौजूदा सत्र में विशेष प्रस्ताव पारित करने को कहा है। उनका उद्देश्य राज्य के लोगों की भावनाओं को औपचारिक रूप से सामने रखना और केंद्र सरकार पर जातिगत जनगणना की प्रक्रिया में सुधार के लिए दबाव बनाना है।

उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय से जुड़े अधिकारों की रक्षा के लिए यह मुद्दा महत्वपूर्ण है। डीएमके अध्यक्ष ने केंद्र से मांग की कि जनगणना प्रक्रिया को अंतिम रूप देने से पहले राज्यों के सुझावों पर विचार किया जाए और जातिगत आंकड़ों के संकलन के लिए स्पष्ट, मानकीकृत तथा विश्वसनीय व्यवस्था तैयार की जाए।

जातिगत जनगणना को लेकर स्टालिन की यह मांग ऐसे समय सामने आई है, जब जनगणना 2027 की प्रक्रिया और उसमें जातिगत विवरण शामिल किए जाने को लेकर राजनीतिक और नीतिगत बहस जारी है। इस मुद्दे पर राज्यों की भूमिका, आंकड़ों की विश्वसनीयता और सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों के लिए इसके संभावित इस्तेमाल पर आगे भी चर्चा महत्वपूर्ण रहने की संभावना है।

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