जनगणना ड्यूटी से शिक्षक नहीं कर सकते इनकार, हाई कोर्ट ने कहा स्कूल की ड्यूटी ही मानेंगे 10 से 4 बजे तक पढ़ाने की दलील पर भी सुनवाई

हाई कोर्ट ने कहा कि शिक्षक जनगणना कार्य से इनकार नहीं कर सकते। कोर्ट ने इसे सरकारी ड्यूटी का हिस्सा माना और शिक्षकों की स्कूल ड्यूटी को लेकर भी अहम टिप्पणी की
जनगणना ड्यूटी से शिक्षक नहीं कर सकते इनकार, हाई कोर्ट ने कहा स्कूल की ड्यूटी ही मानेंगे 10 से 4 बजे तक पढ़ाने की दलील पर भी सुनवाई
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जनगणना कार्य में शिक्षकों की ड्यूटी को लेकर चल रही बहस के बीच हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ किया कि शिक्षक जनगणना जैसे राष्ट्रीय महत्व के कार्य से केवल इस आधार पर इनकार नहीं कर सकते कि वे स्कूल में पढ़ाने की ड्यूटी करते हैं। जनगणना के लिए शिक्षकों की सेवाएं ली जा सकती हैं और निर्धारित जिम्मेदारी का पालन करना होगा। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, मामले में कोर्ट के सामने यह सवाल भी आया कि यदि शिक्षक नियमित रूप से स्कूल में ड्यूटी करते हैं तो जनगणना का काम कब और कैसे पूरा करेंगे।

मामला पश्चिम बंगाल से जुड़ा है, जहां शिक्षकों की नियमित स्कूल ड्यूटी और जनगणना कार्य को लेकर सवाल उठाए गए थे। शिक्षकों की ओर से यह तर्क दिया गया कि उन्हें पहले से स्कूल में निर्धारित समय तक पढ़ाना होता है। इसके अलावा जनगणना के लिए घर-घर जाकर जानकारी जुटाने में अतिरिक्त समय और यात्रा भी करनी पड़ती है। ऐसे में दोनों जिम्मेदारियों को एक साथ पूरा करने में व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

कोर्ट के सामने यह दलील भी रखी गई कि शिक्षक सुबह से शाम तक स्कूल में रहते हैं और कई बार उन्हें अपने कार्यस्थल तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। ऐसे में जनगणना का फील्ड वर्क करने के लिए पर्याप्त समय निकालना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। लेकिन अदालत ने जनगणना के महत्व को देखते हुए यह स्पष्ट किया कि केवल प्रशासनिक या लॉजिस्टिक परेशानी को इस राष्ट्रीय कार्य से बचने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

जनगणना देश की आबादी से जुड़ा सबसे बड़ा प्रशासनिक अभ्यास है। इसमें घर-घर जाकर लोगों और परिवारों से संबंधित निर्धारित जानकारी जुटाई जाती है। इसके लिए बड़ी संख्या में कर्मचारियों की जरूरत होती है। शिक्षक लंबे समय से इस तरह के सरकारी कार्यों में लगाए जाते रहे हैं, क्योंकि उनके पास लोगों तक पहुंचने और निर्धारित प्रपत्रों के अनुसार जानकारी जुटाने का अनुभव होता है।

इसी वजह से सरकारी एजेंसियां जनगणना कार्य के लिए शिक्षकों और अन्य सरकारी कर्मचारियों की सेवाएं लेती हैं। जनगणना से जुड़ी जिम्मेदारी मिलने के बाद संबंधित कर्मचारी को निर्धारित प्रशिक्षण और निर्देशों के अनुसार काम करना होता है। प्रशासनिक स्तर पर ड्यूटी का शेड्यूल और काम पूरा करने की व्यवस्था तय की जाती है।

मामले में शिक्षकों की नियमित स्कूल ड्यूटी का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। शिक्षकों का कहना रहा है कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित नहीं होनी चाहिए। यदि शिक्षक लंबे समय तक जनगणना के काम में लगाए जाते हैं तो स्कूलों में पढ़ाई और विद्यार्थियों की उपस्थिति पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर प्रशासन के सामने जनगणना के लिए पर्याप्त कर्मचारियों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है।

हाई कोर्ट की टिप्पणी इसी संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने यह संकेत दिया कि जनगणना कोई सामान्य विभागीय काम नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसलिए इससे जुड़ी ड्यूटी को केवल अपनी नियमित जिम्मेदारियों का हवाला देकर टाला नहीं जा सकता।

इससे पहले भी अदालतों के सामने जनगणना ड्यूटी से जुड़े ऐसे मामले सामने आए हैं। कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी अप्रैल 2026 में एक मामले की सुनवाई के दौरान जनगणना को राष्ट्रीय दायित्व बताया था और एक निजी स्कूल को अपने शिक्षकों को जनगणना कार्य के लिए उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने यह भी माना था कि केवल व्यावहारिक या लॉजिस्टिक परेशानी के कारण जनगणना में सहयोग से इनकार नहीं किया जा सकता।

जनगणना कार्य के दौरान शिक्षकों की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि उन्हें अलग-अलग इलाकों में जाकर परिवारों से जानकारी जुटानी होती है। इसके लिए उन्हें निर्धारित क्षेत्रों का आवंटन किया जाता है और तय प्रक्रिया के तहत आंकड़े दर्ज किए जाते हैं। इस पूरे काम में सही जानकारी जुटाना और रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी होता है।

हालांकि शिक्षकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती नियमित स्कूल ड्यूटी और जनगणना के फील्ड वर्क के बीच समय का प्रबंधन है। यदि दोनों कामों का समय आपस में टकराता है तो प्रशासन को ड्यूटी की ऐसी व्यवस्था करनी होगी जिससे विद्यार्थियों की पढ़ाई भी प्रभावित न हो और जनगणना कार्य भी समय पर पूरा किया जा सके।

शिक्षकों का कहना है कि वे सरकारी जिम्मेदारियों से भागना नहीं चाहते, लेकिन काम का व्यावहारिक बंटवारा जरूरी है। उनका सवाल यह है कि यदि स्कूल में निर्धारित समय तक पढ़ाने के बाद जनगणना का काम करना होगा तो अतिरिक्त समय और यात्रा की व्यवस्था कैसे होगी। इसी तरह महिला शिक्षकों और दूरदराज के क्षेत्रों में तैनात शिक्षकों के लिए सुरक्षा और आवागमन जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

प्रशासन के सामने भी बड़ी चुनौती है कि जनगणना का काम निर्धारित समयसीमा में पूरा किया जाए। इसके लिए पर्याप्त कर्मचारियों की नियुक्ति, प्रशिक्षण, क्षेत्र का बंटवारा और निगरानी की व्यवस्था करनी पड़ती है। शिक्षकों के सहयोग के बिना इतने बड़े स्तर पर फील्ड सर्वे पूरा करना कठिन हो सकता है।

इस पूरे विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जनगणना ड्यूटी को सामान्य निजी काम की तरह नहीं देखा जा सकता। यदि किसी कर्मचारी को आधिकारिक रूप से जिम्मेदारी सौंपी गई है तो उसे संबंधित आदेश और नियमों के अनुसार उसका पालन करना होता है। हालांकि ड्यूटी की परिस्थितियों, समय और अन्य प्रशासनिक समस्याओं का समाधान संबंधित विभाग को करना होगा।

फिलहाल हाई कोर्ट की टिप्पणी के बाद शिक्षकों की जनगणना ड्यूटी को लेकर स्थिति काफी हद तक स्पष्ट होती दिखाई दे रही है। शिक्षक इस कार्य से केवल इसलिए इनकार नहीं कर सकते कि वे स्कूल में पढ़ाने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। वहीं प्रशासन की जिम्मेदारी होगी कि जनगणना और स्कूल शिक्षा, दोनों के बीच उचित समन्वय बनाया जाए।

यानी शिक्षकों के लिए जनगणना ड्यूटी से बचने का रास्ता केवल स्कूल की नियमित ड्यूटी का हवाला देना नहीं होगा। कोर्ट ने जनगणना को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्य माना है और शिक्षकों की सेवाओं को इससे अलग रखने की दलील को स्वीकार नहीं किया है।

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