तृणमूल कांग्रेस में बगावत तेज हो गई है। 20 बागी सांसद सोमवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिलकर ‘असली TMC’ की मान्यता मांगेंगे। ममता बनर्जी ने सायोनी घोष और माला रॉय को पार्टी पदों से हटा दिया है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी All India Trinamool Congress एक बड़े राजनीतिक संकट से गुजर रही है। पार्टी के भीतर चल रही बगावत अब खुलकर सामने आ चुकी है। लोकसभा के 20 सांसदों ने अलग गुट बनाकर खुद को “असली टीएमसी” के रूप में मान्यता देने की मांग की है। यह गुट सोमवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात करेगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने दिल्ली से लेकर कोलकाता तक राजनीतिक हलचल तेज कर दी है और पार्टी संगठन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बागी गुट का दावा: असली टीएमसी हम हैं
बागी सांसदों का दावा है कि उनके पास पार्टी के भीतर वास्तविक बहुमत का समर्थन है। उनका कहना है कि दल-बदल कानून के तहत उन्हें अलग राजनीतिक गुट के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। इसी मांग को लेकर यह समूह लोकसभा स्पीकर से औपचारिक मुलाकात करेगा।
संगठनात्मक बदलाव के बीच सायोनी घोष और माला रॉय दिल्ली रवाना
इस राजनीतिक संकट के बीच पार्टी के भीतर संगठनात्मक स्तर पर भी बड़े बदलाव हुए हैं। टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने यूथ विंग अध्यक्ष सायोनी घोष और महिला मोर्चा प्रमुख माला रॉय को उनके पदों से हटा दिया है।
सायोनी घोष की जगह अर्णब बनर्जी को युवा विंग की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि महिला मोर्चा में भी नया नेतृत्व नियुक्त किया गया है। इन बदलावों के बाद दोनों नेताओं का दिल्ली रवाना होना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
लोकसभा और राज्यसभा में टीएमसी की ताकत कमजोर
रिपोर्ट्स के अनुसार, टीएमसी के कुल 28 लोकसभा सांसदों में से 20 बागी गुट में शामिल हो चुके हैं, जिससे पार्टी के पास अब केवल 8 सांसद बचे हैं। राज्यसभा में भी स्थिति कमजोर हुई है, जहां 13 में से 4 सांसद इस्तीफा देकर पार्टी छोड़ चुके हैं। यह घटनाक्रम संसद में पार्टी की उपस्थिति और प्रभाव दोनों को प्रभावित कर रहा है।
विधानसभा में भी बड़ा बदलाव, 80 में से 58 विधायक अलग गुट में
टीएमसी की चुनौती केवल संसद तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी बड़ा विभाजन देखा जा रहा है। पार्टी के 80 विधायकों में से 58 विधायक अलग गुट में शामिल हो चुके हैं, जिससे बागी खेमे को दो-तिहाई से अधिक समर्थन मिल गया है।

दल-बदल कानून के तहत मान्यता की लड़ाई
भारत में 10वीं अनुसूची के तहत किसी भी दल के विभाजन को तभी मान्यता मिलती है जब उसके कम से कम दो-तिहाई सांसद या विधायक अलग गुट के साथ हों। टीएमसी के मामले में बागी गुट यह दावा कर रहा है कि उनके पास यह आवश्यक बहुमत मौजूद है।
अंतिम निर्णय लोकसभा स्पीकर, राज्यसभा सभापति या विधानसभा अध्यक्ष द्वारा लिया जाएगा। इस कारण यह मामला अब कानूनी और संवैधानिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण बन गया है।
महाराष्ट्र राजनीतिक संकट से तुलना, बढ़ी चर्चाएं
राजनीतिक विश्लेषक इस घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र में 2022 में हुए शिवसेना विभाजन से कर रहे हैं। उस समय भी पार्टी के बड़े हिस्से ने अलग गुट बनाकर सरकार बदल दी थी और मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था।
टीएमसी में चल रही मौजूदा स्थिति को भी उसी दिशा में एक बड़े राजनीतिक संकट के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि अभी अंतिम स्थिति स्पष्ट नहीं है।
ममता बनर्जी के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती
Mamata Banerjee के नेतृत्व वाली टीएमसी के लिए यह समय बेहद चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। लगातार हो रही टूट और संगठनात्मक बदलावों ने पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हालांकि पार्टी नेतृत्व का दावा है कि यह बगावत अस्थायी है और जल्द ही स्थिति पर नियंत्रण पा लिया जाएगा।
आगे की दिशा और संभावित कानूनी टकराव
लोकसभा स्पीकर से मुलाकात के बाद इस पूरे मामले की दिशा तय होने की संभावना है। यदि बागी गुट को मान्यता मिलती है तो यह टीएमसी के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है। वहीं, पार्टी की ओर से इस फैसले को अदालत में चुनौती दिए जाने की भी संभावना जताई जा रही है।
अब सभी की निगाहें सोमवार की बैठक और उसके बाद आने वाले राजनीतिक फैसलों पर टिकी हैं, जो पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।











