तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने बुधवार को कर्नाटक के मैसूर दशहरा समारोह में हिस्सा लिया। उन्होंने परिवार के साथ देवी चामुंडेश्वरी की पूजा की और सजे हुए हाथी पर स्वर्ण हौदे में विराजमान उत्सव प्रतिमा के दर्शन किए।
हैदराबाद: तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने बुधवार, 21 अक्टूबर को कर्नाटक के मैसूर दशहरा समारोह में हिस्सा लिया। उन्होंने अपने परिवार के साथ देवी चामुंडेश्वरी के दर्शन किए और ऐतिहासिक जंबू सवारी जुलूस को देखा। यह समारोह कर्नाटक के सबसे प्रमुख सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों में से एक है। रेवंत रेड्डी को इस आयोजन में शामिल होने का निमंत्रण कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की ओर से मिला था।
दशहरा उत्सव के अंतिम दिन आयोजित जंबू सवारी में देवी चामुंडेश्वरी की उत्सव प्रतिमा को सजे हुए हाथी पर रखे स्वर्ण हौदे में विराजमान किया गया। शोभायात्रा में लोक कलाकारों, संगीत दलों, नृत्य मंडलियों और विभिन्न सांस्कृतिक समूहों ने हिस्सा लिया। इन प्रस्तुतियों के जरिए कर्नाटक की पारंपरिक कला, लोक संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत की झलक देखने को मिली।
रेवंत रेड्डी ने केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन और अन्य गणमान्य अतिथियों के साथ समारोह का आनंद लिया। उनकी मौजूदगी ने इस आयोजन को राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बना दिया।
जंबू सवारी में शामिल होने से पहले चामुंडेश्वरी मंदिर में पूजा
मैसूर पहुंचने के बाद रेवंत रेड्डी ने चामुंडी पहाड़ी पर स्थित प्रसिद्ध चामुंडेश्वरी मंदिर में पूजा-अर्चना की। उन्होंने देवी के दर्शन कर धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लिया। इस दौरान उनके परिवार के सदस्य भी मौजूद रहे।
चामुंडेश्वरी मंदिर मैसूर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। देवी चामुंडेश्वरी को मैसूर राजपरिवार की आराध्य देवी माना जाता है। दशहरा उत्सव के दौरान मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है और देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
रेवंत रेड्डी का मंदिर दौरा और उसके बाद जंबू सवारी में शामिल होना दशहरा समारोह के धार्मिक तथा सांस्कृतिक महत्व को दर्शाता है। यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कर्नाटक की ऐतिहासिक परंपराओं और सामुदायिक उत्सव का भी प्रतीक है।
क्या है मैसूर दशहरा और क्यों खास है जंबू सवारी?
मैसूर दशहरा को कर्नाटक में ‘नाडा हब्बा’ यानी राज्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह कई दिनों तक चलने वाला वार्षिक आयोजन है, जिसका समापन विजयादशमी के दिन भव्य जंबू सवारी के साथ होता है।
इस उत्सव का संबंध देवी चामुंडेश्वरी की पूजा और बुराई पर अच्छाई की जीत की परंपरा से है। मैसूर का दशहरा ऐतिहासिक रूप से वाडियार राजवंश से भी जुड़ा रहा है। समय के साथ यह आयोजन राज्य की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन गया है।
जंबू सवारी इस उत्सव का सबसे आकर्षक हिस्सा मानी जाती है। इसमें सजे हुए हाथियों, पारंपरिक वाद्ययंत्रों, लोक कलाकारों और विभिन्न सांस्कृतिक दलों की भागीदारी होती है। शोभायात्रा ऐतिहासिक मैसूर महल से शुरू होकर बन्नीमंटप मैदान की दिशा में आगे बढ़ती है।
इस दौरान बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और देश-विदेश से आए पर्यटक सड़कों के किनारे खड़े होकर जुलूस देखते हैं। पारंपरिक वेशभूषा, रंगीन सजावट, संगीत और नृत्य प्रस्तुतियां इस आयोजन को विशिष्ट बनाती हैं।
स्वर्ण हौदे में विराजमान होती हैं देवी चामुंडेश्वरी
जंबू सवारी की सबसे महत्वपूर्ण परंपरा देवी चामुंडेश्वरी की उत्सव प्रतिमा को स्वर्ण हौदे में विराजमान करके शोभायात्रा निकालना है। हौदे को विशेष रूप से सजाया जाता है और उसे एक प्रशिक्षित हाथी पर रखा जाता है।
मैसूर दशहरा के आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार, 21 अक्टूबर को दोपहर 1:36 बजे से 1:56 बजे के बीच शुभ मुहूर्त में नंदी ध्वज की पूजा निर्धारित थी। इसके बाद शाम 4:10 बजे से 4:35 बजे के बीच स्वर्ण हौदे में विराजमान देवी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करने का कार्यक्रम रखा गया। इसके बाद जंबू सवारी महल परिसर से रवाना हुई।
इस परंपरा में धार्मिक आस्था के साथ राजकीय इतिहास और सांस्कृतिक विरासत भी जुड़ी हुई है। समारोह के दौरान कर्नाटक की पारंपरिक कला और स्थानीय समुदायों की भागीदारी इसे व्यापक जनउत्सव का रूप देती है।
लोक कलाकारों और सांस्कृतिक दलों ने बढ़ाई समारोह की रौनक
जंबू सवारी में लोक कलाकारों, संगीत मंडलियों, नृत्य समूहों और विभिन्न सांस्कृतिक दलों ने प्रस्तुति दी। इन कार्यक्रमों में कर्नाटक की लोक परंपराओं, क्षेत्रीय संगीत और पारंपरिक नृत्य शैलियों को प्रदर्शित किया गया।
मैसूर दशहरा में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां उत्सव का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनके जरिए स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलता है और राज्य की पारंपरिक कलाओं को व्यापक पहचान मिलती है।
जुलूस के दौरान ऐतिहासिक मैसूर महल और उसके आसपास का क्षेत्र उत्सव के रंग में रंगा रहा। बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने आयोजन को भव्य रूप दिया। जंबू सवारी के बाद बन्नीमंटप मैदान में मशाल परेड सहित अन्य कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।
दक्षिण भारतीय राज्यों के नेताओं की मौजूदगी
रेवंत रेड्डी के अलावा केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन सहित कई गणमान्य अतिथि भी समारोह में मौजूद थे। अलग-अलग राज्यों के नेताओं की भागीदारी ने इस आयोजन को अंतरराज्यीय सांस्कृतिक संपर्क का अवसर बनाया। भारत में क्षेत्रीय उत्सव केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं। ऐसे आयोजन विभिन्न राज्यों की परंपराओं, कला और इतिहास को समझने का अवसर भी देते हैं। मैसूर दशहरा इसी व्यापक सांस्कृतिक विरासत का एक प्रमुख उदाहरण है।
रेवंत रेड्डी की भागीदारी को तेलंगाना और कर्नाटक के बीच सांस्कृतिक संपर्क के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। हालांकि, इस यात्रा के दौरान किसी विशेष राजनीतिक समझौते या आधिकारिक बैठक की जानकारी उपलब्ध रिपोर्टों में नहीं दी गई है।
पर्यटन और कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान के लिए महत्वपूर्ण आयोजन
मैसूर दशहरा हर साल बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करता है। महल की रोशनी, पारंपरिक शोभायात्रा, सांस्कृतिक कार्यक्रम और स्थानीय खानपान से जुड़ी गतिविधियां इस उत्सव को पर्यटन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण बनाती हैं। इस आयोजन के दौरान स्थानीय कारोबार, होटल, परिवहन और हस्तशिल्प से जुड़े व्यवसायों को भी लाभ मिलता है। पर्यटक मैसूर के ऐतिहासिक स्थलों, मंदिरों और सांस्कृतिक केंद्रों को देखने के लिए पहुंचते हैं।
दशहरा उत्सव की पहचान उसकी भव्यता के साथ-साथ सदियों पुरानी परंपराओं को बनाए रखने में भी है। आधुनिक व्यवस्थाओं के बावजूद जंबू सवारी में धार्मिक अनुष्ठानों, हाथियों की पारंपरिक भूमिका और लोक कलाओं को प्रमुख स्थान दिया जाता है।
रेवंत रेड्डी की मैसूर यात्रा इसी सांस्कृतिक आयोजन का हिस्सा रही। उन्होंने परिवार के साथ देवी चामुंडेश्वरी के दर्शन किए और जंबू सवारी में शामिल होकर कर्नाटक की ऐतिहासिक विरासत तथा लोक संस्कृति को करीब से देखा। मैसूर दशहरा का यह आयोजन एक बार फिर दर्शाता है कि भारत के क्षेत्रीय उत्सव धार्मिक परंपराओं, इतिहास, कला और पर्यटन को एक साथ जोड़ते हैं।









