तेलंगाना के कृषि मंत्री तुम्मला नागेश्वर राव ने राज्य के 621 में से 315 मंडलों में सूखे जैसी स्थिति के बीच केंद्र से राहत उपायों की मांग की है। उन्होंने ग्रामीण रोजगार और जल संरक्षण कार्यों को बढ़ाने का आग्रह किया।
हैदराबाद: तेलंगाना में कम बारिश और अल नीनो के संभावित प्रभाव के बीच कृषि क्षेत्र पर दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। राज्य के कृषि मंत्री तुम्मला नागेश्वर राव ने बताया कि प्रदेश के 621 मंडलों में से 315 मंडलों में सूखे जैसी स्थिति बनी हुई है। उन्होंने केंद्र सरकार से प्रभावित किसानों और कृषि मजदूरों को राहत देने के लिए तत्काल कदम उठाने का आग्रह किया है। हैदराबाद से सामने आई जानकारी के अनुसार, मंत्री ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में आयोजित वीडियो कॉन्फ्रेंस में राज्य की कृषि परिस्थितियों और किसानों की जरूरतों को उठाया। उन्होंने कहा कि केवल जागरूकता अभियान चलाना और किसानों को सलाह देना पर्याप्त नहीं है। संकट के समय उन्हें आर्थिक सहायता, फसल की खरीद का भरोसा और खेती जारी रखने के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है।
तेलंगाना की कृषि अर्थव्यवस्था में बारिश की भूमिका महत्वपूर्ण है। कम वर्षा का असर फसलों, सिंचाई, ग्रामीण रोजगार और किसानों की आय पर पड़ सकता है। ऐसे में राज्य सरकार केंद्र से राहत उपायों के लिए वित्तीय सहायता और कृषि संबंधी योजनाओं में अधिक संसाधन उपलब्ध कराने की मांग कर रही है।
‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत गांवों तक पहुंचेगी मदद
कृषि मंत्री ने बताया कि तेलंगाना में ‘खेत बचाओ अभियान’ 22 अक्टूबर से 30 नवंबर तक चलाया जाएगा। इस अभियान में राष्ट्रीय कृषि संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, सरकारी विभागों और जिला प्रशासन के सहयोग से गांवों के स्तर पर काम करने की योजना है। इसका उद्देश्य खेती से जुड़ी समस्याओं का आकलन करना और किसानों को जरूरी सहायता उपलब्ध कराने के उपायों पर ध्यान देना है।
अभियान के दौरान फसलों की मौजूदा स्थिति, पानी की उपलब्धता और किसानों की जरूरतों का आकलन महत्वपूर्ण होगा। कृषि विशेषज्ञों और संबंधित संस्थानों की भागीदारी से किसानों को मौसम और उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप खेती के विकल्पों के बारे में जानकारी दी जा सकती है।
हालांकि, सूखे जैसी परिस्थितियों में केवल सलाह देना पर्याप्त नहीं होता। किसानों को वैकल्पिक फसलों के बीज, सिंचाई सुविधाएं और बाजार में उपज बेचने का भरोसा भी चाहिए। इसी वजह से राज्य सरकार ने केंद्र से वित्तीय सहायता और फसल खरीद की व्यवस्था को मजबूत करने का आग्रह किया है।
सिंचाई और बिजली की आपूर्ति बनाए रखने के निर्देश
राज्य सरकार ने अधिकारियों को खड़ी फसलों की स्थिति का आकलन करने और उपलब्ध जल संसाधनों का सावधानीपूर्वक उपयोग सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, फसल कटाई तक सिंचाई के लिए पानी और कृषि कार्यों के लिए बिजली की आपूर्ति बनाए रखने पर जोर दिया गया है।
कम बारिश के दौरान जल प्रबंधन का महत्व बढ़ जाता है। यदि खेतों में पर्याप्त नमी नहीं रहती, तो फसलों की बढ़वार और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऐसे में सिंचाई के उपलब्ध साधनों का बेहतर उपयोग, पानी की बर्बादी रोकना और जरूरत के अनुसार फसलों का चयन करना किसानों के लिए उपयोगी हो सकता है।
माइक्रो इरिगेशन यानी सूक्ष्म सिंचाई व्यवस्था भी राहत के उपायों में शामिल है। ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकें पानी का अधिक कुशल इस्तेमाल करने में मदद कर सकती हैं। हालांकि, इन सुविधाओं को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए शुरुआती निवेश, तकनीकी सहायता और सरकारी सहयोग की जरूरत होती है। मंत्री ने केंद्र से सूक्ष्म सिंचाई और वैकल्पिक फसलों के बीजों के लिए सहायता मांगी है।
कृषि मजदूरों के लिए रोजगार की मांग
सूखे का असर केवल खेतों के मालिक किसानों तक सीमित नहीं रहता। कृषि गतिविधियां कम होने पर खेतों में काम करने वाले मजदूरों की आय भी प्रभावित हो सकती है। बुवाई, निराई, सिंचाई और कटाई जैसे कामों की उपलब्धता मौसम तथा फसल की स्थिति पर निर्भर करती है।
इसी चिंता को देखते हुए तुम्मला नागेश्वर राव ने केंद्र से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने और कृषि मजदूरों को आर्थिक सुरक्षा देने की मांग की है। उन्होंने VB-G RAM G कार्यक्रम के तहत रोजगार उपलब्ध कराने तथा जल संरक्षण से जुड़े कार्यों को प्राथमिकता देने का आग्रह किया।
जल संरक्षण के अंतर्गत खेतों में तालाब बनाना, वर्षा जल को सहेजना और भूमि विकास जैसे काम किए जा सकते हैं। ऐसे कार्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने के साथ भविष्य में पानी की उपलब्धता बेहतर बनाने में भी मदद कर सकते हैं। सूखे की स्थिति में इस तरह की योजनाएं किसानों और मजदूरों दोनों के लिए उपयोगी हो सकती हैं।
न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसल खरीद की मांग
कृषि मंत्री ने केंद्र से मक्का, ज्वार, दालों, तिलहन और अन्य प्रमुख फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद सुनिश्चित करने का आग्रह किया है। उन्होंने मूल्य समर्थन योजना के तहत कुछ फसलों की खरीद पर लागू 25 प्रतिशत की सीमा हटाने की भी मांग की।
MSP किसानों को उनकी उपज के लिए घोषित न्यूनतम मूल्य उपलब्ध कराने की सरकारी व्यवस्था है। हालांकि, घोषित समर्थन मूल्य और वास्तविक खरीद के बीच अंतर हो सकता है। किसानों को इसका पूरा लाभ तभी मिल पाता है, जब खरीद केंद्रों, आवश्यक प्रक्रियाओं और बाजार तक पहुंच की पर्याप्त व्यवस्था हो।
सूखे की आशंका के बीच फसल खरीद की गारंटी किसानों के लिए खास महत्व रखती है। इससे उन्हें यह तय करने में मदद मिल सकती है कि सीमित पानी और संसाधनों के बीच कौन-सी फसल उगाना व्यावहारिक होगा। राज्य सरकार का कहना है कि फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के साथ उपज की खरीद का भरोसा देना भी जरूरी है।
फसल विविधीकरण और वैकल्पिक बीजों पर जोर
कम बारिश के समय पानी की अधिक जरूरत वाली फसलों के बजाय परिस्थितियों के अनुरूप वैकल्पिक फसलों पर विचार करना उपयोगी हो सकता है। हालांकि, फसल बदलने का फैसला स्थानीय मिट्टी, उपलब्ध पानी, मौसम, बीजों की उपलब्धता और बाजार की मांग को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।
तुम्मला नागेश्वर राव ने केंद्र से अंतरिम फसलों के बीज और सूक्ष्म सिंचाई के लिए सहायता मांगी है। इसके साथ ही, उन्होंने प्रमुख फसलों की खरीद पर भरोसा देने की जरूरत बताई है, ताकि किसानों को वैकल्पिक फसलें अपनाने में आर्थिक जोखिम कम महसूस हो।
किसानों के लिए फसल विविधीकरण तभी व्यावहारिक होगा, जब उन्हें बीज, तकनीकी मार्गदर्शन, सिंचाई और बाजार तक पहुंच एक साथ मिले। केवल फसल बदलने की सलाह से अपेक्षित लाभ नहीं मिल सकता, यदि उत्पाद की बिक्री और उचित कीमत को लेकर अनिश्चितता बनी रहे।
उर्वरक सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने की मांग
कृषि मंत्री ने उर्वरकों की कीमतों और सब्सिडी की मौजूदा व्यवस्था को तर्कसंगत बनाने की जरूरत भी उठाई। उनका कहना है कि यूरिया पर अधिक सब्सिडी के कारण उसका इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा हो सकता है। उन्होंने ऐसी व्यवस्था की वकालत की, जिससे किसानों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डाले बिना उर्वरकों का संतुलित उपयोग प्रोत्साहित हो।
उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल मिट्टी की गुणवत्ता और खेती की लागत दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालांकि, सब्सिडी में किसी भी बदलाव के दौरान किसानों की आर्थिक स्थिति और फसलों की जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी होगा। सूखे जैसी परिस्थितियों में किसानों की लागत बढ़ने और उत्पादन घटने की आशंका रहती है, इसलिए राहत नीतियों का उद्देश्य उनकी आर्थिक कठिनाइयों को और बढ़ने से रोकना होना चाहिए।
आगे क्या होगा?
तेलंगाना सरकार की मांगों में तत्काल वित्तीय सहायता, कृषि मजदूरों के लिए रोजगार, जल संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई, वैकल्पिक बीज और फसलों की MSP पर खरीद शामिल हैं। ‘खेत बचाओ अभियान’ के जरिए राज्य में कृषि समस्याओं का आकलन करने और गांवों तक सहायता पहुंचाने पर जोर रहेगा।
अब केंद्र सरकार की ओर से इन मांगों पर क्या कदम उठाए जाते हैं, यह महत्वपूर्ण होगा। सूखे जैसी स्थिति से निपटने के लिए राज्य और केंद्र के बीच समन्वय, समय पर आर्थिक सहायता और प्रभावी जल प्रबंधन अहम भूमिका निभा सकते हैं। किसानों के लिए राहत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि योजनाओं का लाभ जरूरतमंद लोगों तक कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से पहुंचता है।








