तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी संकट गहराता दिख रहा है। वरिष्ठ नेता सुदीप बंद्योपाध्याय के बागी खेमे में शामिल होने और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात के बाद पार्टी में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। बागी सांसद अलग गुट की मान्यता मांग रहे हैं।
कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर उभरते असंतोष ने एक नया मोड़ ले लिया है। पार्टी के वरिष्ठ सांसद और लंबे समय से ममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले सुदीप बंद्योपाध्याय के कथित तौर पर बागी खेमे में शामिल होने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। इस घटनाक्रम को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के लिए एक बड़े राजनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है।
राजनीतिक चर्चाओं को और हवा तब मिली जब सुदीप बंद्योपाध्याय की केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता भूपेंद्र यादव से मुलाकात की खबर सामने आई। सूत्रों के अनुसार, इस दौरान टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय भी दिल्ली में मौजूद थीं और उन्होंने भी भूपेंद्र यादव से मुलाकात की। हालांकि इन बैठकों को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषक इसे पश्चिम बंगाल की राजनीति में संभावित बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देख रहे हैं।
टीएमसी में बढ़ता असंतोष बना चर्चा का विषय
हाल के महीनों में तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन और संगठनात्मक फैसलों को लेकर कई नेताओं ने अप्रत्यक्ष रूप से नाराजगी जताई थी। अब सांसदों के एक समूह द्वारा अलग गुट बनाने की चर्चा ने इस असंतोष को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया है।
बागी खेमे से जुड़े सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने दावा किया है कि लोकसभा अध्यक्ष को एक ज्ञापन सौंपा गया है और जल्द ही अलग संसदीय समूह को मान्यता देने की मांग की जाएगी। उनके अनुसार, कई सांसद इस पहल का समर्थन कर रहे हैं और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर औपचारिक कदम उठाए जा सकते हैं।
यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह तृणमूल कांग्रेस के संसदीय ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
19 सांसदों के समर्थन का दावा
बागी नेताओं का कहना है कि उनके प्रस्ताव को 19 सांसदों का समर्थन प्राप्त है। यह संख्या इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि लोकसभा में टीएमसी का प्रतिनिधित्व पश्चिम बंगाल की राजनीति में उसकी ताकत का प्रमुख आधार है।
बताया जा रहा है कि जिन सांसदों के नाम इस सूची में शामिल बताए जा रहे हैं, उनमें कई चर्चित चेहरे भी हैं। हालांकि पार्टी की ओर से इन दावों को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं और कहा जा रहा है कि वास्तविक स्थिति की पुष्टि अभी बाकी है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि इतनी बड़ी संख्या में सांसद वास्तव में अलग रुख अपनाते हैं, तो इसका असर केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
सुदीप बंद्योपाध्याय की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
सुदीप बंद्योपाध्याय तृणमूल कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं। वह कई वर्षों से पार्टी का प्रमुख चेहरा रहे हैं और संसद में भी पार्टी की ओर से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।
उनकी राजनीतिक यात्रा और संगठन के भीतर उनकी पकड़ को देखते हुए यदि वे किसी अलग गुट के साथ दिखाई देते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं बल्कि एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुदीप बंद्योपाध्याय जैसे वरिष्ठ नेता का किसी भी प्रकार की राजनीतिक पुनर्संरचना से जुड़ना पार्टी के भीतर अन्य नेताओं को भी प्रभावित कर सकता है।
भूपेंद्र यादव से मुलाकात ने बढ़ाई अटकलें
दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से हुई मुलाकात ने इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक राजनीतिक महत्व दे दिया है।
भूपेंद्र यादव भाजपा के प्रमुख रणनीतिकारों में माने जाते हैं और संगठनात्मक मामलों में उनकी भूमिका काफी प्रभावशाली रही है। ऐसे में टीएमसी नेताओं की उनसे मुलाकात को लेकर विभिन्न तरह के राजनीतिक कयास लगाए जा रहे हैं।

हालांकि अब तक न तो भाजपा और न ही संबंधित नेताओं ने इस मुलाकात के उद्देश्य पर विस्तार से टिप्पणी की है। इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस मुलाकात ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में संभावित नए समीकरणों की चर्चा को तेज कर दिया है।
महुआ मोइत्रा ने बागी दावों को बताया निराधार
टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने बागी गुट के दावों को खारिज करते हुए कहा है कि भारतीय संविधान में हुए 91वें संशोधन के बाद किसी संसदीय दल के भीतर इस प्रकार के विभाजन को कानूनी मान्यता मिलना आसान नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल अलग समूह बनाने की घोषणा कर देने से उसे संसदीय मान्यता नहीं मिल जाती। इसके लिए संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक होता है।
महुआ मोइत्रा का कहना है कि पार्टी एकजुट है और कुछ दावों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।
हस्ताक्षरों की जांच की मांग
टीएमसी नेता कुणाल घोष ने भी इस पूरे विवाद पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने मांग की है कि जिन दस्तावेजों और हस्ताक्षरों का हवाला देकर सांसदों के समर्थन का दावा किया जा रहा है, उनकी सत्यता की जांच की जानी चाहिए।
घोष का कहना है कि सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों पर प्रसारित दस्तावेजों को लोकसभा सचिवालय के आधिकारिक रिकॉर्ड से मिलाकर देखा जाना चाहिए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि वास्तव में कितने सांसद किसी प्रस्ताव के समर्थन में हैं।
उनके अनुसार, राजनीतिक अफवाहों और वास्तविक तथ्यों के बीच अंतर करना आवश्यक है।
भाजपा पर लगा ‘ऑपरेशन लोटस’ का आरोप
इस पूरे विवाद के बीच टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद ने भाजपा पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि भाजपा विपक्षी दलों के नेताओं और जनप्रतिनिधियों को अपने पक्ष में लाने के लिए प्रयास कर रही है।
उन्होंने कहा कि यह एक व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जिसे अक्सर ‘ऑपरेशन लोटस’ के नाम से जाना जाता है। हालांकि भाजपा ने ऐसे आरोपों को पहले भी खारिज किया है और कहा है कि विपक्ष अपनी आंतरिक समस्याओं के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश करता है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति पर क्या होगा असर?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि टीएमसी के भीतर असंतोष की यह स्थिति आगे बढ़ती है, तो इसका असर राज्य और राष्ट्रीय राजनीति दोनों पर पड़ सकता है।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से प्रमुख राजनीतिक शक्ति रही है। ऐसे में पार्टी के भीतर किसी भी प्रकार का विभाजन विपक्षी दलों के लिए अवसर पैदा कर सकता है।
दूसरी ओर, यदि पार्टी नेतृत्व इस संकट को नियंत्रित करने में सफल रहता है, तो यह तृणमूल कांग्रेस की संगठनात्मक मजबूती का भी संकेत होगा










