UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने नियमों की भाषा को अस्पष्ट बताते हुए दुरुपयोग की आशंका जताई। कोर्ट ने कहा कि फिलहाल 2012 के UGC नियम ही लागू रहेंगे।
UGC Regulations: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी UGC के नए नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी। यह रोक Chief Justice of India सूर्यकांत और Justice Joymalya Bagchi की पीठ ने लगाई। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नए नियमों की भाषा स्पष्ट नहीं है और इनके गलत इस्तेमाल की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि अगर समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया गया तो इसके समाज पर गंभीर और खतरनाक प्रभाव पड़ सकते हैं। इसी वजह से फिलहाल UGC Regulations 2012 लागू रहेंगे और 2026 के नए नियम स्थगित रहेंगे।
कोर्ट की शुरुआती टिप्पणी से साफ हुई चिंता
सुनवाई की शुरुआत में ही Supreme Court ने UGC के नए नियमों को लेकर गंभीर चिंता जताई। Chief Justice सूर्यकांत ने कहा कि नियमों के कुछ प्रावधान इतने अस्पष्ट हैं कि उनका दुरुपयोग किया जा सकता है। अदालत के अनुसार शिक्षा संस्थानों में लागू होने वाले नियम अगर स्पष्ट नहीं होंगे तो वे छात्रों के बीच अनावश्यक विभाजन और टकराव को जन्म दे सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि शिक्षा का उद्देश्य समाज को जोड़ना है न कि अलगाव पैदा करना।
याचिकाकर्ता के वकील का तर्क क्या था
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील विष्णु जैन ने कोर्ट को बताया कि वे UGC Regulations की धारा 3C को चुनौती दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस धारा में जाति आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के खिलाफ भेदभाव के रूप में परिभाषित किया गया है। उनका तर्क था कि इससे सामान्य वर्ग को पूरी तरह बाहर कर दिया गया है, जबकि संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार सभी नागरिकों को देता है।
विष्णु जैन ने कहा कि यह मान लेना गलत है कि भेदभाव केवल एक ही वर्ग के खिलाफ हो सकता है। भेदभाव किसी के साथ भी हो सकता है और कानून को सभी के लिए समान सुरक्षा देनी चाहिए।
CJI का सवाल और व्यावहारिक उदाहरण
Chief Justice सूर्यकांत ने वकील के तर्क पर सवाल उठाते हुए एक व्यावहारिक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि मान लीजिए कोई छात्र दक्षिण भारत से उत्तर भारत में पढ़ने आता है या उत्तर से दक्षिण जाता है। अगर उस छात्र के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की जाती है और दोनों की जाति ज्ञात नहीं है, तो उस स्थिति में कौन सा प्रावधान लागू होगा। इस पर वकील विष्णु जैन ने कहा कि ऐसी स्थिति में धारा 3E लागू होगी।
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Chief Justice ने इस जवाब से असंतोष जताते हुए कहा कि जब पहले से ही एक व्यापक प्रावधान मौजूद है, तो अलग से संकीर्ण परिभाषा लाने की जरूरत क्या है।
समाज के भीतर बढ़ते विभाजन पर कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान Chief Justice सूर्यकांत ने कहा कि पिछले 75 वर्षों में देश ने एक वर्गहीन समाज बनने की दिशा में काफी प्रगति की है। लेकिन इस तरह के नियम उस प्रगति को पीछे ले जा सकते हैं। उन्होंने पंजाब का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां अनुसूचित जाति के भीतर भी समूह ए और समूह बी बनाए गए हैं, जिनमें आर्थिक और सामाजिक अंतर है।
कोर्ट ने कहा कि रैगिंग के मामलों में सबसे ज्यादा नुकसान उन छात्रों को होता है जो दूसरे राज्यों या संस्कृतियों से आते हैं। अगर नियमों के जरिए छात्रों को अलग-अलग खांचों में बांटा गया, तो हॉस्टलों और कैंपस में दरार पैदा होगी और एकता की जगह अलगाव बढ़ेगा।
Justice Joymalya Bagchi की अहम टिप्पणी
Justice Joymalya Bagchi ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 15(4) राज्य को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष प्रावधान बनाने का अधिकार देता है। लेकिन उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि प्रगतिशील कानून में प्रतिगामी सोच क्यों लाई जा रही है। उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां एक समय अश्वेत और श्वेत छात्रों के लिए अलग-अलग स्कूल होते थे और भारत को उस रास्ते पर नहीं जाना चाहिए।
सरकार और Attorney General से कोर्ट की अपेक्षा
Chief Justice ने Attorney General से कहा कि सरकार को इस पूरे मामले की गंभीरता से समीक्षा करनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि कुछ प्रतिष्ठित और निष्पक्ष व्यक्तियों की एक समिति बनाई जाए, जो यह सुनिश्चित करे कि समाज बिना किसी भेदभाव के साथ आगे बढ़े। कोर्ट ने साफ कहा कि कानून ऐसा होना चाहिए जो सभी को जोड़ने वाला हो, न कि तोड़ने वाला।
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह की दलील
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कोर्ट को बताया कि 2019 से ही एक याचिका लंबित है, जिसमें 2012 के UGC Regulations को चुनौती दी गई है। इसके बावजूद 2026 के नए नियम लागू कर दिए गए। उन्होंने कहा कि छात्रों को हॉस्टलों और अन्य जगहों पर अलग-अलग रखने के उदाहरण पहले भी सामने आए हैं और इस मामले को पुरानी याचिकाओं से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
कोर्ट का अंतिम अंतरिम आदेश
लंबी सुनवाई के बाद Supreme Court ने स्पष्ट आदेश दिया कि UGC Regulations 2026 अगले आदेश तक स्थगित रहेंगे। कोर्ट ने कहा कि 2012 के नियम ही फिलहाल लागू रहेंगे। इसके साथ ही 19 मार्च को अगली सुनवाई की तारीख तय की गई है और सरकार से जवाब मांगा गया है।
Chief Justice ने यह भी स्पष्ट किया कि हाशिए पर पड़े वर्गों के लिए शिकायत निवारण की व्यवस्था बनी रहेगी। कोर्ट ने कहा कि सामान्य श्रेणी की शिकायतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन कमजोर वर्गों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। अनुच्छेद 142 के तहत कोर्ट ने यह अंतरिम व्यवस्था लागू की।









