यूक्रेन में घायल सैनिक को युद्धक्षेत्र से निकालने के लिए भारी ड्रोन और रोबोटिक वाहन का इस्तेमाल किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, कोस्त्यांतिन व्लासेंको 491 दिनों से मोर्चे पर फंसे थे। गंभीर चोटों के बावजूद उन्हें सुरक्षित निकालकर अस्पताल पहुंचाया गया।
कीव: रूस-यूक्रेन युद्ध में ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल अब घायल सैनिकों को बचाने के लिए भी किया जा रहा है। यूक्रेन की सेना ने एक ऐसे घायल सैनिक को भारी ड्रोन की मदद से युद्धक्षेत्र से बाहर निकाला, जहां तक जमीन के रास्ते पहुंचना बेहद जोखिम भरा था। यूक्रेनी सैनिक कोस्त्यांतिन व्लासेंको करीब 491 दिनों तक अग्रिम मोर्चे पर फंसे रहे। बारूदी सुरंगों, रूसी ड्रोन की निगरानी और लगातार हमलों के खतरे के कारण उन्हें सुरक्षित निकालना मुश्किल हो गया था।
19 अक्टूबर 2026 को सामने आई जानकारी के मुताबिक, यूक्रेनी सेना ने इस अभियान को अपनी तरह का पहला ऑपरेशन बताया। इसमें छह रोटर वाले भारी ड्रोन, विशेष लिफ्टिंग उपकरण और जमीन पर चलने वाले रोबोटिक वाहन की मदद ली गई। बचाव के बाद सैनिक को अस्पताल पहुंचाया गया। यूक्रेनी सैन्य अधिकारियों के मुताबिक, उनकी जान को अब तत्काल खतरा नहीं है और उनका इलाज जारी है।
रूसी हमले में साथी की मौत, व्लासेंको भी हुए गंभीर रूप से घायल
व्लासेंको पूर्वी यूक्रेन के कुपियांस्क क्षेत्र में तैनात थे। इस इलाके में रूस और यूक्रेन की सेनाओं के बीच संघर्ष के दौरान ड्रोन हमलों और बारूदी सुरंगों का खतरा बना रहता है। रिपोर्टों के अनुसार, व्लासेंको और उनका एक साथी कंक्रीट के जलनिकासी पाइप में बनाए गए अस्थायी ठिकाने पर रहते थे।
14 फरवरी 2026 को रूसी ड्रोन हमले में व्लासेंको के दोनों पैर गंभीर रूप से घायल हो गए। उनके साथी की भी मौत हो गई। चोटों के कारण व्लासेंको की स्थिति लगातार बिगड़ती गई, लेकिन उनके ठिकाने तक चिकित्सा दल पहुंचाना संभव नहीं था।
इलाज के अभाव में उनके पैरों में गंभीर ऊतक क्षति हुई। प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, संक्रमण और हालत बिगड़ने के कारण उन्होंने जीवित रहने के लिए अपने पैरों के प्रभावित हिस्सों को खुद काटकर अलग किया। यह स्थिति युद्धक्षेत्र में चिकित्सा सहायता न पहुंच पाने के गंभीर मानवीय परिणामों को दर्शाती है।
ड्रोन से पहुंचाया जाता था खाना, पानी और दवाइयां
गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद व्लासेंको का अपने साथियों से संपर्क बना हुआ था। यूक्रेनी सैनिक ड्रोन के जरिए उनके पास खाना, पानी, दवाइयां और अन्य जरूरी सैन्य सामग्री पहुंचाते थे।
सामान को उनके ठिकाने के पास गिराया जाता था, ताकि वह उसे किसी तरह हासिल कर सकें। सीमित संसाधनों और गंभीर चोटों के बीच यह सहायता उनके जीवित रहने का अहम सहारा बनी।
हालांकि, रसद पहुंचाने और किसी घायल व्यक्ति को युद्धक्षेत्र से निकालने में बड़ा अंतर है। सामान ले जाने वाला ड्रोन किसी घायल सैनिक को सुरक्षित तरीके से उठाकर लंबी दूरी तक पहुंचाने के लिए जरूरी नहीं कि उपयुक्त हो। इसके लिए अतिरिक्त उपकरण, संतुलन बनाए रखने की तकनीक और सावधानीपूर्वक तैयार की गई योजना की जरूरत होती है।
जमीन से बचाव की कोशिश क्यों नाकाम हुई?
व्लासेंको को निकालने के लिए यूक्रेनी सेना ने पहले बिना चालक वाले जमीन पर चलने वाले रोबोटिक वाहन का इस्तेमाल करने की कोशिश की। लेकिन रिपोर्टों के मुताबिक, रूसी सेना ने वाहन को रास्ते में पहचान लिया और उसे नष्ट कर दिया।
दूसरी ओर, पैदल सैनिकों के लिए भी उस स्थान तक पहुंचना बेहद खतरनाक था। इलाके में बारूदी सुरंगें बिछी थीं और रूसी ड्रोन लगातार गतिविधियों पर नजर रख रहे थे। बचाव दल के सैनिकों को भेजने से उनके भी हमले की चपेट में आने का खतरा था।
ऐसी परिस्थितियों में सेना ने हवाई रास्ते से निकासी की योजना पर काम किया। इस अभियान में 30वीं मैकेनाइज्ड ब्रिगेड, 92वीं असॉल्ट ब्रिगेड और अन्य सैन्य इकाइयों के विशेषज्ञों ने भूमिका निभाई। ड्रोन निर्माता कंपनी गुरज़ुफ डिफेंस ने भी तकनीकी सहयोग दिया।
भारी ड्रोन में बदलाव कर तैयार किया गया बचाव अभियान
सैनिक को निकालने के लिए यूक्रेनी कंपनी गुरज़ुफ डिफेंस के हेवी शॉट अयुदाग-6 ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। यह छह रोटर वाला भारी ड्रोन है, जिसे मूल रूप से सैन्य सामग्री और भारी सामान ले जाने जैसे कार्यों के लिए विकसित किया गया था।
इस अभियान के लिए ड्रोन में विशेष लिफ्टिंग सिस्टम और व्यक्ति को सुरक्षित तरीके से जोड़ने वाले उपकरण लगाए गए। इसमें विंच यानी केबल के जरिए व्यक्ति को ऊपर उठाने की व्यवस्था शामिल थी। ड्रोन को इस तरह तैयार करना जरूरी था कि सैनिक को उठाते समय विमान का संतुलन न बिगड़े और वह हवा में अत्यधिक झूले नहीं।
कंपनी और सैन्य विशेषज्ञों ने उपकरणों में बदलाव करने तथा उनकी जांच करने के बाद अभियान की तैयारी की। शुरुआत में इस तरह के बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाला ड्रोन पूरी तरह तैयार नहीं था। इसके बाद तकनीकी सुधार और योजना बनाने में कई महीने लगे।
यह अभियान केवल ड्रोन उड़ाने तक सीमित नहीं था। इसमें सैनिक से संपर्क बनाए रखना, उसे लिफ्टिंग उपकरण इस्तेमाल करने के निर्देश देना, उड़ान के दौरान संतुलन कायम रखना और सुरक्षित स्थान पर पहुंचने के बाद चिकित्सा सहायता सुनिश्चित करना भी शामिल था।
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हवा में उठाकर सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया गया सैनिक
ऑपरेशन के दौरान व्लासेंको तक जरूरी उपकरण पहुंचाए गए। इसके बाद भारी ड्रोन को उनके ठिकाने तक भेजा गया। सैनिक ने निर्देशों के अनुसार खुद को लिफ्टिंग सिस्टम से जोड़ा और ड्रोन ने उन्हें जमीन से ऊपर उठाया।
इसके बाद ड्रोन उन्हें अग्रिम मोर्चे से दूर एक सुरक्षित स्थान तक ले गया, जहां दूसरे सैनिक मौजूद थे। वहां से उनकी आगे की निकासी का इंतजाम किया गया।
गुरज़ुफ डिफेंस और यूक्रेनी सैन्य इकाइयों से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, पूरी उड़ान में करीब 1 घंटा 14 मिनट लगे और लगभग 62 किलोमीटर की दूरी तय की गई। ऑपरेशन के दौरान ड्रोन की उड़ान, संचार और सुरक्षा पर लगातार नजर रखी गई।
इस मिशन की खास बात यह थी कि घायल सैनिक को निकालने के लिए बचाव दल को सीधे बारूदी सुरंगों वाले इलाके में नहीं जाना पड़ा। हालांकि, हवा में व्यक्ति को ले जाना भी जोखिम से मुक्त नहीं था। ड्रोन की तकनीकी खराबी, बैटरी, मौसम और दुश्मन के हमले जैसी परिस्थितियां पूरे अभियान को प्रभावित कर सकती थीं।
रोबोटिक वाहन से अस्पताल तक पहुंचाया गया
ड्रोन से सुरक्षित स्थान पर पहुंचने के बाद व्लासेंको को आगे अस्पताल ले जाने की व्यवस्था की गई। रिपोर्टों के मुताबिक, उन्हें मिरोतवोरेत्स नाम के रोबोटिक वाहन की मदद से आगे बढ़ाया गया। इसके बाद बचाव दल ने उन्हें वाहन से अस्पताल पहुंचाया।
इस तरह पूरे अभियान में दो तरह की मानवरहित तकनीक का इस्तेमाल हुआ। हवाई ड्रोन ने उन्हें उस स्थान से बाहर निकाला जहां जमीन के रास्ते पहुंचना मुश्किल था, जबकि रोबोटिक वाहन ने आगे की निकासी में सहायता की।
यूक्रेनी सेना के अनुसार, व्लासेंको का इलाज और पुनर्वास जारी है। गंभीर चोटों के कारण उन्हें लंबी चिकित्सा प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।
क्या घायल सैनिकों का रेस्क्यू करने में ड्रोन भविष्य बदलेंगे?
रूस-यूक्रेन युद्ध में ड्रोन पहले ही निगरानी, हमले, रसद पहुंचाने और सैन्य अभियानों में अहम भूमिका निभा रहे हैं। अब घायल सैनिकों को निकालने में उनका इस्तेमाल युद्धक्षेत्र की चिकित्सा व्यवस्था के लिए एक नया विकल्प प्रस्तुत करता है।
इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ उन क्षेत्रों में हो सकता है जहां एंबुलेंस, हेलीकॉप्टर या पैदल बचाव दल पहुंच नहीं सकते। मानवरहित प्रणाली का इस्तेमाल बचावकर्मियों को सीधे खतरे में जाने से बचा सकता है और गंभीर रूप से घायल लोगों तक पहुंचने के नए रास्ते खोल सकता है।
हालांकि, विशेषज्ञों ने चेताया है कि इस तरह की हवाई निकासी को नियमित या पूरी तरह सुरक्षित समाधान नहीं मानना चाहिए। भारी ड्रोन की क्षमता, उड़ान की दूरी, बैटरी, मौसम, दुश्मन की निगरानी और घायल व्यक्ति की शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है। हर मिशन के लिए अलग योजना बनानी पड़ सकती है।
यूक्रेन की सेना ने इस अभियान को ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है, लेकिन इसे दुनिया में पहली बार हुआ ऐसा बचाव अभियान मानने के दावे की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है। इस घटना का महत्व फिर भी स्पष्ट है: अत्यंत खतरनाक परिस्थितियों में ड्रोन और रोबोटिक तकनीक घायल सैनिकों को बचाने में उपयोगी साबित हो सकती है।
आने वाले समय में युद्धक्षेत्र में मानवरहित तकनीक का विकास केवल हमले और निगरानी तक सीमित नहीं रहेगा। चिकित्सा निकासी और मानवीय सहायता में इसका इस्तेमाल भी सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।









