उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) की पीसीएस-2025 भर्ती प्रक्रिया के तहत आयोजित साक्षात्कार में अभ्यर्थियों से केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि देश और प्रदेश की आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं को समझने की क्षमता से जुड़े सवाल भी पूछे जा रहे हैं। इंटरव्यू बोर्ड यह जानने का प्रयास कर रहा है कि प्रशासनिक पद पर पहुंचने के बाद अभ्यर्थी जनता की समस्याओं को किस तरह समझेंगे और उनका समाधान निकालने के लिए क्या कदम उठाएंगे। महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की परेशानी, शिक्षा व्यवस्था, स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की समस्या और सरकारी कामकाज में सूचना प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल जैसे मुद्दे साक्षात्कार का हिस्सा बने हैं। अभ्यर्थियों से यह भी पूछा गया कि यदि वे उपजिलाधिकारी यानी एसडीएम बनते हैं, तो उनकी प्राथमिकताएं क्या होंगी और वे अपने क्षेत्र में सबसे पहले किन समस्याओं पर ध्यान देंगे।
पीसीएस साक्षात्कार में पूछे जा रहे इन सवालों का उद्देश्य अभ्यर्थियों की सामान्य जानकारी के साथ-साथ उनकी प्रशासनिक सोच, तार्किक क्षमता और निर्णय लेने के तरीके को समझना है। प्रशासनिक सेवाओं में चयनित होने वाले अधिकारियों को अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। कभी किसानों की समस्याएं सामने आती हैं, तो कभी बेरोजगार युवाओं, विद्यार्थियों, व्यापारियों और ग्रामीण परिवारों की शिकायतों पर कार्रवाई करनी होती है। ऐसी स्थिति में अधिकारी के लिए समस्या को समझना, संबंधित विभागों से जानकारी लेना, नियमों के अनुरूप निर्णय करना और जरूरतमंद लोगों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना जरूरी होता है। इसी व्यावहारिक समझ को परखने के लिए इंटरव्यू बोर्ड अभ्यर्थियों से परिस्थितियों पर आधारित सवाल पूछ रहा है।
साक्षात्कार के दौरान आर्थिक समस्याओं को लेकर बेरोजगारी पर विशेष ध्यान दिया गया। अभ्यर्थियों से पूछा गया कि बेरोजगारी बढ़ने के प्रमुख कारण क्या हैं और इस समस्या को दूर करने के लिए किस प्रकार के कदम उठाए जाने चाहिए। इस सवाल के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया कि अभ्यर्थी रोजगार की समस्या को केवल सरकारी नौकरियों की कमी के रूप में देखते हैं या इसके पीछे मौजूद व्यापक आर्थिक और सामाजिक कारणों को भी समझते हैं। बेरोजगारी का संबंध शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण, उद्योगों के विकास, निवेश, स्थानीय बाजार और युवाओं की रोजगार संबंधी अपेक्षाओं से भी होता है। इसलिए इस तरह के सवाल का जवाब देते समय समस्या के अलग-अलग पहलुओं को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है।
बेरोजगारी पर चर्चा करते समय अभ्यर्थियों के सामने यह चुनौती भी रहती है कि वे समाधान को व्यावहारिक रूप में कैसे प्रस्तुत करें। रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए उद्योगों और छोटे कारोबारों को प्रोत्साहन देना, युवाओं को बाजार की मांग के अनुरूप कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध कराना, स्वरोजगार को बढ़ावा देना और स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार विकसित करना जैसे उपायों पर विचार किया जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, हस्तशिल्प और छोटे उद्यम रोजगार के अवसर पैदा कर सकते हैं। वहीं शहरी क्षेत्रों में सेवा क्षेत्र, विनिर्माण, तकनीकी प्रशिक्षण और कारोबार के विस्तार की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि, किसी भी योजना की सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन, वित्तीय संसाधनों और स्थानीय जरूरतों के सही आकलन पर निर्भर करती है।
महंगाई भी साक्षात्कार में उठाए गए प्रमुख आर्थिक मुद्दों में शामिल रही। महंगाई का सीधा प्रभाव आम परिवारों के बजट पर पड़ता है। खाद्य पदार्थों, ईंधन, परिवहन, किराये और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों में बढ़ोतरी से विशेष रूप से कम आय वाले परिवार प्रभावित हो सकते हैं। प्रशासनिक अधिकारी के लिए जरूरी है कि वह महंगाई से जुड़ी शिकायतों और बाजार की परिस्थितियों को समझे, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता पर नजर रखे तथा जमाखोरी और कालाबाजारी जैसी शिकायतों पर कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित करे। इस तरह के प्रश्नों के जरिए अभ्यर्थियों की आर्थिक समझ और जनता की परेशानियों के प्रति संवेदनशीलता को परखने का प्रयास किया जा सकता है।
किसानों की समस्याओं से जुड़ा सवाल भी इंटरव्यू में महत्वपूर्ण रहा। अभ्यर्थियों से पूछा गया कि यदि वे एसडीएम बनते हैं, तो किसानों के हित में क्या काम करेंगे। यह प्रश्न सीधे तौर पर प्रशासनिक जिम्मेदारी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की समझ से जुड़ा है। उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों में खेती बड़ी संख्या में परिवारों की आजीविका का आधार है। किसानों को सिंचाई, बिजली, खाद-बीज की उपलब्धता, फसल के उचित मूल्य, सरकारी खरीद, फसल नुकसान के मुआवजे और कृषि योजनाओं का लाभ मिलने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में एसडीएम की भूमिका केवल शिकायत सुनने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि संबंधित विभागों के बीच समन्वय बनाकर समस्याओं का समय पर समाधान कराने में भी होती है।
यदि किसी अधिकारी को किसानों की शिकायत मिलती है, तो उसे सबसे पहले शिकायत की प्रकृति और वास्तविक स्थिति की जानकारी जुटानी होगी। उदाहरण के लिए, यदि किसी गांव में सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल रहा है, तो संबंधित विभाग से स्थिति की रिपोर्ट लेकर समस्या के कारणों का पता लगाया जा सकता है। यदि किसानों को सरकारी खरीद केंद्र पर परेशानी हो रही है, तो व्यवस्था की जांच कर नियमों के अनुसार सुधार कराया जा सकता है। फसल नुकसान की स्थिति में संबंधित विभागों के साथ मिलकर सर्वेक्षण और पात्र किसानों को राहत उपलब्ध कराने की प्रक्रिया पर नजर रखी जा सकती है। इस प्रकार प्रशासनिक अधिकारी की जिम्मेदारी समस्याओं की पहचान करने, समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने और सरकारी व्यवस्था को जवाबदेह बनाने की होती है।
शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा सवाल भी साक्षात्कार में पूछा गया। एक अभ्यर्थी से यह जानना चाहा गया कि स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए वह क्या कदम उठाएगा। किसी बच्चे का पढ़ाई बीच में छोड़ देना केवल शिक्षा विभाग की समस्या नहीं है, बल्कि इसका संबंध परिवार की आर्थिक स्थिति, स्कूल तक पहुंच, पढ़ाई की गुणवत्ता, घरेलू जिम्मेदारियों और सामाजिक परिस्थितियों से भी हो सकता है। कुछ बच्चों को परिवार की आय में योगदान देना पड़ता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में स्कूल की दूरी, परिवहन की कमी या शिक्षा के प्रति जागरूकता का अभाव भी पढ़ाई प्रभावित कर सकता है। ऐसे में प्रशासनिक अधिकारी को समस्या के मूल कारणों की पहचान करके संबंधित विभागों के साथ मिलकर काम करना होगा।
स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या कम करने के लिए नियमित उपस्थिति पर नजर रखना, लंबे समय तक अनुपस्थित रहने वाले विद्यार्थियों के परिवारों से संपर्क करना, जरूरतमंद बच्चों को उपलब्ध सरकारी सुविधाओं की जानकारी देना और विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति की समीक्षा करना उपयोगी कदम हो सकते हैं। यदि किसी बच्चे के पढ़ाई छोड़ने का कारण आर्थिक कठिनाई है, तो पात्रता के अनुसार छात्रवृत्ति या अन्य सहायता योजनाओं से जोड़ने की कोशिश की जा सकती है। वहीं, यदि समस्या विद्यालय में शिक्षकों की कमी, बुनियादी सुविधाओं या पढ़ाई के वातावरण से जुड़ी है, तो संबंधित शिक्षा अधिकारियों के साथ समन्वय कर सुधार की दिशा में कार्रवाई की जा सकती है। इस तरह का सवाल अभ्यर्थियों की सामाजिक समझ और प्रशासनिक जिम्मेदारी के प्रति दृष्टिकोण को सामने लाता है।
प्रशासन में सूचना प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल पूछे गए। अभ्यर्थियों से यह जानना चाहा गया कि सरकारी कामकाज में आईटी का किस तरह उपयोग किया जा सकता है। आज सरकारी योजनाओं, प्रमाणपत्रों, शिकायतों, राजस्व संबंधी सेवाओं और विभागीय रिकॉर्ड के प्रबंधन में डिजिटल प्रणालियों की भूमिका बढ़ रही है। तकनीक के माध्यम से आवेदन की स्थिति पर नजर रखना, शिकायतों को संबंधित विभाग तक पहुंचाना, योजनाओं के लाभार्थियों का रिकॉर्ड व्यवस्थित करना और कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाना संभव हो सकता है। लेकिन डिजिटल व्यवस्था का लाभ तभी व्यापक होगा, जब आम नागरिकों को इसका उपयोग करने में परेशानी न हो और तकनीकी समस्याओं के समाधान की भी व्यवस्था मौजूद हो।
यदि कोई अभ्यर्थी एसडीएम बनने के बाद प्रशासन में तकनीक के इस्तेमाल की बात करता है, तो उसे यह भी समझना होगा कि डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य केवल ऑनलाइन पोर्टल शुरू करना नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की उपलब्धता, डिजिटल साक्षरता, स्थानीय भाषा में जानकारी और नागरिकों की सहायता जैसी जरूरतों को भी ध्यान में रखना होगा। बुजुर्गों, दिव्यांग व्यक्तियों और डिजिटल साधनों तक सीमित पहुंच रखने वाले लोगों के लिए वैकल्पिक सहायता उपलब्ध होना जरूरी है। इसके साथ ही नागरिकों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता भी महत्वपूर्ण है। तकनीक प्रशासन को अधिक प्रभावी बना सकती है, लेकिन अंतिम जिम्मेदारी अधिकारी और संबंधित विभागों की ही रहती है।
साक्षात्कार में सरकारी और निजी नौकरी के बीच प्राथमिकता को लेकर भी सवाल पूछा गया। अभ्यर्थियों से यह बताने को कहा गया कि वे सरकारी नौकरी और निजी नौकरी में से किसे चुनेंगे और इसके पीछे उनका तर्क क्या होगा। इस तरह के प्रश्न का उद्देश्य केवल यह जानना नहीं होता कि कोई अभ्यर्थी किस क्षेत्र में काम करना चाहता है, बल्कि उसके करियर संबंधी दृष्टिकोण, प्रेरणा और जिम्मेदारी की समझ को भी परखना होता है। सरकारी सेवा में कानून के अनुसार काम करना, निष्पक्षता बनाए रखना और सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देना जरूरी है। वहीं निजी क्षेत्र में भी अलग-अलग प्रकार की जिम्मेदारियां और पेशेवर अवसर होते हैं। अभ्यर्थी से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने चुनाव के पीछे स्पष्ट और तार्किक कारण प्रस्तुत करे।
एक अन्य सवाल में अभ्यर्थियों से पूछा गया कि यदि वे प्रशासनिक पद पर नियुक्त होते हैं, तो सबसे पहले किन समस्याओं के समाधान पर ध्यान देंगे। यह प्रश्न एसडीएम की प्राथमिकताओं को समझने से जुड़ा है। किसी उपखंड में कानून-व्यवस्था, राजस्व संबंधी मामले, भूमि विवाद, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, सार्वजनिक शिकायतों और आपदा प्रबंधन जैसी अनेक जिम्मेदारियां हो सकती हैं। अधिकारी के सामने एक साथ कई समस्याएं आ सकती हैं, लेकिन हर मामले को समान समय और संसाधन देना संभव नहीं होता। ऐसे में उसे समस्या की गंभीरता, उससे प्रभावित लोगों की संख्या, कानूनी दायित्व और तात्कालिक जरूरतों के आधार पर प्राथमिकताएं तय करनी पड़ती हैं।
यदि किसी क्षेत्र में अचानक बाढ़, आग या अन्य आपदा जैसी स्थिति पैदा होती है, तो लोगों की सुरक्षा और राहत को प्राथमिकता देना आवश्यक होगा। वहीं, यदि किसी गांव में पेयजल की गंभीर समस्या है, तो संबंधित विभागों के साथ समन्वय कर त्वरित व्यवस्था करनी पड़ सकती है। भूमि विवाद या राजस्व संबंधी मामलों में रिकॉर्ड की जांच, संबंधित पक्षों की सुनवाई और नियमों के अनुसार निर्णय जरूरी होता है। इसी प्रकार सरकारी योजनाओं में अनियमितता की शिकायत मिलने पर तथ्यों की जांच करके आवश्यक कार्रवाई करनी होगी। ऐसे सवालों के माध्यम से बोर्ड यह देख सकता है कि अभ्यर्थी दबाव की स्थिति में संतुलित निर्णय लेने और सीमित संसाधनों का प्रभावी इस्तेमाल करने के बारे में कितना सोचता है।
पीसीएस साक्षात्कार में प्रशासनिक पद के लिए केवल कानून और नियमों का ज्ञान पर्याप्त नहीं माना जाता। अधिकारी को आम लोगों की समस्याओं को ध्यान से सुनना, अलग-अलग पक्षों की बात समझना और निष्पक्ष निर्णय लेना भी आना चाहिए। कई बार एक ही मामले में दो पक्षों के दावे अलग-अलग होते हैं। ऐसे में बिना जांच किए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होता। अधिकारी को उपलब्ध दस्तावेजों, नियमों और तथ्यों के आधार पर निर्णय लेना पड़ता है। इसी कारण परिस्थितियों पर आधारित प्रश्न अभ्यर्थियों को अपनी सोच और निर्णय लेने की प्रक्रिया स्पष्ट करने का अवसर देते हैं।
इन सवालों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि प्रशासनिक सेवा में चुने जाने वाले अधिकारी को सरकारी योजनाओं और आम जनता के बीच संपर्क का काम करना पड़ता है। किसी योजना का लाभ तभी प्रभावी माना जा सकता है, जब वह पात्र लोगों तक समय पर पहुंचे। यदि लाभार्थियों को आवेदन प्रक्रिया समझ में नहीं आती, दस्तावेजों की समस्या है या विभागीय स्तर पर देरी हो रही है, तो अधिकारी को इन बाधाओं को पहचानना होगा। शिकायत निवारण व्यवस्था को सक्रिय रखना, विभागीय समीक्षा करना और नागरिकों को सही जानकारी उपलब्ध कराना प्रशासनिक कार्यों का अहम हिस्सा है।
पीसीएस-2025 के साक्षात्कार में आर्थिक और सामाजिक विषयों पर पूछे गए सवाल यह संकेत देते हैं कि अभ्यर्थियों से समसामयिक परिस्थितियों को समझने के साथ-साथ उनके व्यावहारिक समाधान पर भी विचार मांगा जा रहा है। महंगाई, बेरोजगारी और किसानों की समस्याओं जैसे मुद्दों पर उत्तर देते समय केवल समस्या गिनाना पर्याप्त नहीं होगा। अभ्यर्थी को कारणों की पहचान, संबंधित विभागों की भूमिका, उपलब्ध संसाधनों और लागू नियमों को ध्यान में रखकर समाधान प्रस्तुत करना होगा। इसी तरह शिक्षा और डिजिटल प्रशासन पर सवालों का जवाब देते समय सामाजिक परिस्थितियों, नागरिकों की जरूरतों और व्यवस्था की सीमाओं को समझना जरूरी है।
कुल मिलाकर, प्रयागराज में चल रहे पीसीएस साक्षात्कार में अभ्यर्थियों की तैयारी को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखा जा रहा है। उनसे यह समझने का प्रयास किया जा रहा है कि वे प्रशासनिक पद पर पहुंचकर आम लोगों की समस्याओं को कैसे देखेंगे, प्राथमिकताएं किस आधार पर तय करेंगे और कानून के दायरे में रहकर समाधान कैसे निकालेंगे। एसडीएम बनने पर किसानों के लिए काम करने, स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की समस्या दूर करने, बेरोजगारी और महंगाई से जुड़े प्रश्नों का जवाब देने तथा प्रशासन में तकनीक का इस्तेमाल करने जैसे सवालों के जरिए अभ्यर्थियों की व्यावहारिक सोच को परखने की कोशिश की जा रही है। अंतिम चयन में साक्षात्कार के प्रदर्शन की भूमिका होगी, लेकिन किसी भी अभ्यर्थी के लिए प्रभावी उत्तर वही होगा जिसमें तथ्य, तार्किकता, संवेदनशीलता और प्रशासनिक जिम्मेदारी का संतुलन दिखाई दे।










