अमेरिकी चुनाव के दौरान राजनीतिक समर्थन वाले वीडियो सोशल मीडिया पर फैलाने के लिए भारत में लोगों को भुगतान किए जाने का मामला सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई के आयुष जैन को हर पोस्ट के करीब 15 डॉलर मिले।
वॉशिंगटन: अमेरिका में चुनाव के दौरान मतदाताओं की राय प्रभावित करने के लिए सोशल मीडिया पर राजनीतिक वीडियो फैलाने का मामला सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, मिशिगन में डेमोक्रेटिक पार्टी के सीनेट उम्मीदवार हेली स्टीवंस के समर्थन में बनाए गए वीडियो को सोशल मीडिया पर फैलाने के लिए भारत में कई अकाउंट संचालकों को भुगतान किया गया। मुंबई में रहने वाले आयुष जैन ने बताया कि उन्हें हर पोस्ट के लिए करीब 15 डॉलर मिले। ये वीडियो ऐसे प्रस्तुत किए गए, जैसे आम अमेरिकी नागरिक अपनी मर्जी से उम्मीदवार का समर्थन कर रहे हों। हालांकि, इन्हें सोशल मीडिया पर फैलाने के लिए भुगतान किया जा रहा था। दो रिसर्च समूहों ने इस गतिविधि से जुड़े अकाउंट की पहचान की है।
अमेरिकी चुनाव से पहले सोशल मीडिया पर फैलाए गए 36 से ज्यादा वीडियो
यह मामला मिशिगन में 4 अगस्त को हुए डेमोक्रेटिक पार्टी के सीनेट प्राइमरी चुनाव से जुड़ा है। चुनाव से पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स, फेसबुक, इंस्टाग्राम और थ्रेड्स पर कम से कम 36 वीडियो पोस्ट किए गए। इन वीडियो को लाखों बार देखा गया।
वीडियो में लोग सड़कों पर खड़े होकर अमेरिकी राजनीति, महंगाई, रोजगार और रोजमर्रा के खर्च जैसे मुद्दों पर अपनी राय देते दिखाई दिए। इनमें से कई लोगों ने डेमोक्रेट उम्मीदवार और सांसद हेली स्टीवंस के समर्थन में बातें कहीं। वीडियो का अंदाज सामान्य जनमत या सड़क पर लोगों की राय जानने वाले इंटरव्यू जैसा था। इससे देखने वालों को यह आभास हो सकता था कि संबंधित नागरिक स्वतः उम्मीदवार के समर्थन में अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं।
हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक, इन वीडियो को सोशल मीडिया पर फैलाने वाले कई अकाउंट भारत से संचालित किए जा रहे थे। वीडियो के मूल निर्माता कौन थे और पूरे अभियान के पीछे किसने पैसा लगाया था, इसकी पुष्टि नहीं हो सकी।
मुंबई के आयुष जैन को हर पोस्ट के मिले 15 डॉलर
इस मामले में मुंबई में रहने वाले आयुष जैन का नाम सामने आया है। वह ‘एनर्जेटिक ह्यूमर’ नाम का इंस्टाग्राम अकाउंट चलाते हैं। जैन के मुताबिक, उन्होंने अपने नियंत्रण वाले अलग-अलग सोशल मीडिया अकाउंट से करीब 40 पोस्ट प्रकाशित किए और प्रत्येक पोस्ट के लिए लगभग 15 डॉलर प्राप्त किए।
रिपोर्ट के अनुसार, उनके समझौते में वीडियो को कम से कम 30 दिनों तक ऑनलाइन बनाए रखने की शर्त थी। बाद में संबंधित वीडियो हटा दिए गए। इस भुगतान व्यवस्था में पोस्ट की संख्या के साथ-साथ व्यूज के आधार पर भी रकम दी जाती थी। रिपोर्ट में बताया गया कि वीडियो फैलाने वाले अकाउंट संचालकों को प्रति 1,000 व्यूज के लिए लगभग 1 से 5 डॉलर तक दिए जाते थे।
इस तरह पोस्ट को जितने अधिक लोग देखते, भुगतान की राशि भी उतनी बढ़ सकती थी। सोशल मीडिया पर वीडियो देखने वाले लोगों को यह जानकारी नहीं दी गई थी कि इन पोस्ट को फैलाने के लिए अकाउंट संचालकों को पैसे दिए जा रहे हैं।
पेंसिल्वेनिया की कंपनी ने दिया था काम
रिपोर्ट के अनुसार, आयुष जैन को अमेरिका के पेंसिल्वेनिया में पंजीकृत कंपनी ‘लुमिना क्लिपर्स’ ने काम पर रखा था। यह कंपनी सोशल मीडिया पर अकाउंट के नेटवर्क के माध्यम से पोस्ट की पहुंच बढ़ाने का काम करती है।
कंपनी का संचालन पुर्तगाल में रहने वाले आयरिश नागरिक राइस मैके करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, मैके ने इस बात को स्वीकार किया कि उनकी कंपनी ने मिशिगन चुनाव से जुड़े वीडियो फैलाने में भूमिका निभाई थी।
उन्होंने बताया कि इस काम के लिए आयुष जैन समेत कई अन्य लोगों को भी नियुक्त किया गया था। हालांकि, मैके ने यह बताने से इनकार कर दिया कि कंपनी को यह काम किसने सौंपा था और पूरे अभियान पर कितना पैसा खर्च किया गया।
इस वजह से वीडियो के पीछे मौजूद वास्तविक फंडिंग स्रोत और अभियान की पूरी योजना अब भी स्पष्ट नहीं है। किसी राजनीतिक उम्मीदवार या उसके आधिकारिक चुनाव अभियान की इसमें भूमिका होने का भी कोई प्रमाण सामने नहीं आया।
28 सोशल मीडिया अकाउंट की पहचान
इस गतिविधि का पता सबसे पहले ‘एंटीबॉट4नवालनी’ नाम के रिसर्च समूह ने लगाया। समूह ने एक्स पर ऐसे 28 अकाउंट की पहचान की, जो कथित तौर पर भुगतान लेकर वीडियो पोस्ट कर रहे थे। इन अकाउंट से प्रकाशित सामग्री को 70 लाख से अधिक बार देखा गया। इसके बाद क्लेमसन यूनिवर्सिटी के मीडिया फॉरेंसिक्स हब के शोधकर्ताओं ने फेसबुक, इंस्टाग्राम और थ्रेड्स पर भी ऐसे अकाउंट खोजे।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, इनमें से कुछ अकाउंट पहले चीन से जुड़े बॉट नेटवर्क के माध्यम से संचालित अभियानों में भी दिखाई दिए थे। इन अकाउंट का सामान्य कंटेंट अक्सर कार्टून और मनोरंजन से संबंधित होता था, लेकिन चुनाव के दौरान इन पर अचानक अमेरिकी राजनीति से जुड़े वीडियो प्रकाशित होने लगे।
इस बदलाव ने शोधकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर पोस्ट की गतिविधियों और अकाउंट के व्यवहार का विश्लेषण किया, जिसके बाद इस अभियान से जुड़े नेटवर्क की पहचान करने में मदद मिली।
हेली स्टीवंस के समर्थन में अभियान, लेकिन फंडिंग का स्रोत अज्ञात
रिपोर्ट के अनुसार, यह अभियान संभवतः उन राजनीतिक समूहों या संगठनों से जुड़ा हो सकता है, जो डेमोक्रेटिक प्राइमरी में हेली स्टीवंस को उनके प्रतिद्वंद्वी डॉ. अब्दुल एल-सैयद के मुकाबले बढ़त दिलाना चाहते थे।
हालांकि, इस संभावित संबंध की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। हेली स्टीवंस के आधिकारिक चुनाव अभियान या उनके समर्थक संगठनों के इसमें शामिल होने का कोई प्रमाण सामने नहीं आया।
4 अगस्त को हुए डेमोक्रेटिक प्राइमरी चुनाव में अब्दुल एल-सैयद ने जीत हासिल की। इस परिणाम के बाद भी कुछ संबंधित सोशल मीडिया अकाउंट राजनीतिक सामग्री प्रकाशित करते रहे।
रिपोर्ट में कैलिफोर्निया के गवर्नर पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार स्टीव हिल्टन के समर्थन में प्रकाशित पोस्ट का भी उल्लेख है। इससे संकेत मिलता है कि संबंधित अकाउंट नेटवर्क का इस्तेमाल अलग-अलग राजनीतिक संदेशों के प्रसार के लिए किया जा रहा था। हालांकि, प्रत्येक पोस्ट के पीछे मौजूद भुगतानकर्ता की पहचान स्पष्ट नहीं है।
सोशल मीडिया पर राजनीतिक पारदर्शिता का सवाल
यह मामला चुनावी राजनीति में सोशल मीडिया की भूमिका और ऑनलाइन सामग्री की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाता है। सोशल मीडिया पर आम नागरिकों की राय के रूप में प्रस्तुत वीडियो मतदाताओं के बीच किसी उम्मीदवार के समर्थन का आभास पैदा कर सकते हैं।
जब ऐसी सामग्री को भुगतान के जरिए अधिक लोगों तक पहुंचाया जाता है और दर्शकों को इसकी जानकारी नहीं दी जाती, तो उनके लिए वास्तविक जनमत और प्रचार के बीच अंतर करना कठिन हो सकता है।
इस मामले में वीडियो के मूल निर्माता, फंडिंग के स्रोत और अभियान के वास्तविक प्रभाव का पता लगना बाकी है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि इन वीडियो ने मतदाताओं के फैसले को किस हद तक प्रभावित किया।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी एक ऐसे नेटवर्क की ओर संकेत करती है, जिसमें सोशल मीडिया अकाउंट संचालकों को राजनीतिक वीडियो फैलाने के लिए भुगतान किया गया। लेकिन किसी खास उम्मीदवार या आधिकारिक चुनाव अभियान को इसका जिम्मेदार ठहराने के लिए पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं आए हैं।









