अमेरिका में वोटर लिस्ट की जांच से भारतवंशी मतदाताओं पर असर की आशंका

ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिका में वोटर लिस्ट की जांच शुरू की है। राष्ट्रीय डेटाबेस बनने से करीब 10 लाख भारतवंशी मतदाताओं के नाम प्रभावित होने की आशंका है।

अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन ने वोटर लिस्ट की व्यापक जांच और राष्ट्रीय मतदाता डेटाबेस तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की है। रिपोर्ट के मुताबिक, इससे करीब 26 लाख भारतवंशी मतदाताओं में लगभग 10 लाख नाम जांच के दायरे में आ सकते हैं।

वाशिगंटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने देश की वोटर लिस्ट की व्यापक जांच और राष्ट्रीय स्तर पर मतदाता डेटाबेस तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रक्रिया के लिए करीब 125 करोड़ रुपए का फंड जारी किया गया है। इसका उद्देश्य अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड के साथ मतदाता सूचियों की जानकारी का मिलान कर रिकॉर्ड को अपडेट करना है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस प्रक्रिया से अमेरिका में रहने वाले करीब 26 लाख भारतवंशी मतदाताओं में से लगभग 10 लाख लोगों के नाम जांच के दायरे में आ सकते हैं और कुछ नाम हटाए जाने का खतरा हो सकता है। हालांकि, वास्तविक रूप से कितने मतदाताओं के नाम हटेंगे, यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।

ट्रम्प प्रशासन का लक्ष्य नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले इस प्रक्रिया को पूरा करने का बताया गया है। यह पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब अमेरिका में मतदाता पहचान, नागरिकता और चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस पहले से तेज है।

ICE को डेटाबेस की निगरानी की जिम्मेदारी

रिपोर्ट के अनुसार, ट्रम्प प्रशासन ने अपनी इमिग्रेशन एजेंसी इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) को राष्ट्रीय मतदाता डेटाबेस से जुड़ी प्रक्रिया की निगरानी की जिम्मेदारी दी है।

सभी 50 राज्यों में वोटर लिस्ट की जांच और डेटाबेस को अपडेट करने के लिए अलग-अलग कंपनियों को काम सौंपे जाने की बात कही गई है। इस प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं की जानकारी को विभिन्न सरकारी रिकॉर्ड के साथ मिलाया जाएगा।

इसमें मतदाता रजिस्ट्रेशन से जुड़ी जानकारी को इमिग्रेशन रिकॉर्ड समेत अन्य उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड से क्रॉस-चेक किया जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति की जानकारी अलग-अलग रिकॉर्ड में मेल नहीं खाती है, तो उस रिकॉर्ड की दोबारा जांच की संभावना रहेगी।

हालांकि, रिकॉर्ड में अंतर होना अपने आप में किसी व्यक्ति के अपात्र होने का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में आगे की जांच और संबंधित राज्य के नियम महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

भारत के SIR से अलग होगी प्रक्रिया

अमेरिका में चल रही प्रक्रिया की तुलना भारत के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR से की जा रही है, लेकिन दोनों देशों की चुनावी व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण अंतर है।

भारत में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के लिए निर्वाचन तंत्र के तहत व्यापक प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं। इसके विपरीत अमेरिका में चुनाव व्यवस्था काफी हद तक राज्य और स्थानीय प्रशासन के अधीन है।

अमेरिका में भारत की तरह घर-घर जाकर सभी मतदाताओं का एक समान राष्ट्रीय सर्वे कराने की बात नहीं है। इसके बजाय कंप्यूटर आधारित सिस्टम के जरिए विभिन्न सरकारी रिकॉर्ड का मिलान किए जाने की जानकारी सामने आई है।

इसका अर्थ है कि मतदाता रिकॉर्ड की समीक्षा मुख्य रूप से उपलब्ध डिजिटल और सरकारी डेटाबेस के आधार पर की जाएगी।

भारतवंशी वोटरों पर क्यों पड़ सकता है असर?

अमेरिका में करीब 26 लाख भारतवंशी मतदाता बताए गए हैं। न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, कैलिफोर्निया और टेक्सास जैसे राज्यों में भारतीय-अमेरिकी समुदाय की आबादी और राजनीतिक प्रभाव खासा महत्वपूर्ण माना जाता है।

इन राज्यों में चुनावी राजनीति में प्रवासी समुदायों की भूमिका कई क्षेत्रों में अहम रही है। भारतवंशी मतदाताओं के बीच भी अलग-अलग राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए समर्थन देखा जाता है।

नई वोटर लिस्ट जांच के दौरान जब मतदाता रिकॉर्ड को दूसरे सरकारी डेटाबेस से मिलाया जाएगा, तो भारतवंशी मतदाता भी इस प्रक्रिया के दायरे में आएंगे। खासकर उन मामलों में अतिरिक्त सत्यापन हो सकता है, जहां नागरिकता, पंजीकरण या व्यक्तिगत जानकारी से जुड़े रिकॉर्ड में अंतर पाया जाता है।

हालांकि, उपलब्ध जानकारी यह साबित नहीं करती कि केवल भारतवंशी होने के कारण किसी मतदाता का नाम हटाया जाएगा। संभावित असर रिकॉर्ड सत्यापन और संबंधित राज्य के चुनावी नियमों पर निर्भर करेगा।

करीब 10 लाख नाम हटने की आशंका का दावा

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका के करीब 26 लाख भारतवंशी वोटरों में से लगभग 10 लाख के नाम हटाए जाने का खतरा है। यह आंकड़ा संभावित प्रभाव को लेकर किया गया दावा है, न कि उन मतदाताओं की अंतिम संख्या जिनके नाम वास्तव में मतदाता सूची से हटाए जाएंगे।

वास्तविक संख्या तभी सामने आएगी जब सभी संबंधित रिकॉर्ड की जांच पूरी होगी और राज्य स्तर पर आवश्यक सत्यापन किया जाएगा।

इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि 10 लाख भारतवंशी मतदाताओं के नाम निश्चित रूप से वोटर लिस्ट से हट जाएंगे। यह संख्या संभावित जोखिम को दर्शाती है।

ट्रम्प वोटर आईडी व्यवस्था के समर्थक

डोनाल्ड ट्रम्प लंबे समय से मतदान के दौरान फोटो पहचान पत्र को अनिवार्य किए जाने के समर्थक रहे हैं। उनका तर्क है कि मतदाता पहचान की सख्त व्यवस्था चुनावी गड़बड़ियों को रोकने में मदद कर सकती है।

ट्रम्प प्रशासन चुनावी प्रक्रिया में नागरिकता की पुष्टि और मतदाता पहचान से जुड़े नियमों को मजबूत करने पर जोर देता रहा है। इसी संदर्भ में ‘सेव अमेरिका एक्ट’ का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है।

इस प्रस्तावित कानून के जरिए मतदाता पंजीकरण और मतदान के लिए अतिरिक्त दस्तावेजी आवश्यकताएं लागू करने की बात कही गई है।

अमेरिका में वोटर लिस्ट की जांच से भारतवंशी मतदाताओं पर असर की आशंका

क्या है ‘सेव अमेरिका एक्ट’?

‘सेव अमेरिका एक्ट’ अमेरिका में मतदाता पंजीकरण और मतदान से जुड़े नियमों को सख्त करने वाला प्रस्तावित कानून है। इसके तहत वोटर रजिस्ट्रेशन के समय नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण और मतदान के दौरान फोटो आईडी दिखाना जरूरी किए जाने का प्रस्ताव है।

इस प्रस्ताव में डाक के जरिए मतदान की प्रक्रिया को भी सीमित करने की बात कही गई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यह विधेयक अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पारित हो चुका है, लेकिन सीनेट की मंजूरी अभी बाकी है।

यदि इसे कानून का रूप मिलता है, तो अमेरिका में मतदाता पंजीकरण और पहचान से जुड़े मौजूदा नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं।

अमेरिका में भारत जैसी केंद्रीय चुनाव व्यवस्था नहीं

भारत और अमेरिका की चुनावी व्यवस्थाओं में बड़ा अंतर यह है कि अमेरिका में पूरे देश के चुनाव संचालित करने वाली भारत के निर्वाचन आयोग जैसी एक केंद्रीय संस्था नहीं है।

अमेरिका में चुनावों की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्यों और स्थानीय प्रशासन के पास होती है। इसलिए मतदाता पंजीकरण, पहचान और मतदान से जुड़े नियम एक राज्य से दूसरे राज्य में अलग हो सकते हैं।

कुछ राज्यों में मतदाता को अपनी पहचान की घोषणा करना पर्याप्त हो सकता है, जबकि दूसरे राज्यों में पहचान से जुड़े दस्तावेज मांगे जा सकते हैं।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 12 राज्यों में पासपोर्ट या जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेजों की आवश्यकता हो सकती है। कैलिफोर्निया में मतदाता के हस्ताक्षर का मिलान किए जाने की व्यवस्था का उल्लेख भी किया गया है।

टेक्सास में पहले भी वोटर लिस्ट को लेकर विवाद

टेक्सास में करीब 24 हजार लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने के बाद मामला अदालत तक पहुंचा था। रिपोर्ट के मुताबिक, फेडरल कोर्ट से इस मामले में राहत मिली और संबंधित कानूनी विवाद अभी लंबित है।

इस पृष्ठभूमि में ट्रम्प प्रशासन की देशव्यापी वोटर लिस्ट जांच को लेकर भी कानूनी चुनौती की संभावना जताई जा रही है।

मतदाता सूची से नाम हटाने का मुद्दा अमेरिका में संवेदनशील राजनीतिक और कानूनी विषय है। समर्थक इसे चुनावी रिकॉर्ड को अधिक सटीक बनाने की प्रक्रिया बताते हैं, जबकि आलोचक इस तरह की व्यापक जांच से पात्र मतदाताओं के अधिकार प्रभावित होने की आशंका जता सकते हैं।

नवंबर के मिडटर्म चुनाव से पहले पूरी करने का लक्ष्य

ट्रम्प प्रशासन के लिए इस प्रक्रिया की समयसीमा भी महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के अनुसार, सरकार नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले मतदाता सूची की जांच और राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने की प्रक्रिया पूरी करना चाहती है।

यदि राज्यों में रिकॉर्ड मिलान के दौरान बड़ी संख्या में विसंगतियां सामने आती हैं, तो संबंधित मतदाताओं के रिकॉर्ड की अतिरिक्त जांच की जा सकती है।

हालांकि, अंतिम प्रभाव राज्य-दर-राज्य अलग हो सकता है क्योंकि अमेरिका में मतदाता पंजीकरण और पहचान संबंधी नियम समान नहीं हैं।

कुल मिलाकर, प्रस्तावित राष्ट्रीय वोटर डेटाबेस और व्यापक रिकॉर्ड जांच अमेरिकी चुनाव व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव की दिशा में कदम मानी जा रही है। इसका वास्तविक असर भारतवंशी मतदाताओं समेत अन्य समुदायों पर कितना पड़ेगा, यह जांच पूरी होने और राज्यों की ओर से अंतिम रिकॉर्ड अपडेट किए जाने के बाद ही स्पष्ट होगा।

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